पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६९४

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६८२ तुल-तुलसी तुल (हि. वि. ) तुरूप देको । पर्याय-सुभगा, तोवा, पावनी, विण वसभा, सुरज्या, तुलछराय -मारवाड़के एक राजात कवि। ये गोत सुरसा, कायस्था, मुरादुन्दुभि, सुरभि, बहुपत्रो, मञ्जगे. कवित्तके कईएक अन्य बना गये हैं। हरिप्रिया, अपेतराक्षसी, श्यामा, गौरो, विदशमचारी, तुलना ( क्रि० ) १ तोला जाना। २ उद्यत होना, भूतनो, भूतपनो, पर्णास. वृन्दा, कहिअर, कुठेरक, उतारू होना । ३ गाड़ों के परियेका मोगा जाना । ४ पृरित वणवो, पुण्या, पवित्रा, माधवी, प्रमता, पत्रपुष्पा, सुगन्धा, होना, भरना। ५ नियमित होना, अंदाज होना। गन्धहारिणी, मुरबानो, प्रेतराक्षसो, सुषहा, ग्राम्या, ठोक अन्दाजके माय टिकना। ५ तन्य होना, तौलमें सुलभा, बहुमञ्जरी, देवदुन्दुभि ।। बराबर उतरना । खुद्रपत्र तुलमोके पर्याय-वरपत्र, जम्बोर, पत्रपुष्प. सुलमा (सं.सी.) १ मादृश्य, ममता, बराबरो। २ फणिज्मक, अल्पपत्र, ममोकारण. मरुवक प्रस्थपुष्य । तारतम्य, मिलान । गन्धनमोके पर्याय-सुगन्धक, गन्धनामा, तोरणगन्ध, तुलनी (हि.सी.) वह लोहा जो तराजू वा काटेको गन्धफमिझ, सुगन्ध, देवदुन्दुभि । विश्वगन्धके पर्याय- डाँडोमें के दोनों ताफ लगा रहता है। वैकुण्ठक, विल्वगन्ध, अल्पमानक । खेत तुलसोके तुलबुलो (हि.सी. ) जम्दबाजो : पर्याय-पज क, खेतपर्णाश, गन्धपत्र, कुठेरक, अना सुलभ (सं० पु.) तुरेगा वेगेन भाति भा-उस्य लः जक, तीक्ष्ण, तीक्ष्णगन्ध और सितार्जक। पायुधजोवि महमंद। जण तलसोके पर्याय-जणाक, कषणषणों, सुरभि, तुलव-महाराष्ट्र मम्प्रदायो बाण जातिका एक भेद। कालमान, करालक, कालपर्णो, मानका, कालमानक दक्षिण कनाड़ाके पास पास इस जातिका वाम है। वह और वर्ष री। इनको स्थिति पोर जातपद साधारण है। ये लोग कम वर्वरी तुलमोके पर्याय -सुरभि, सरभिषा, सुरसा, पढ़े लिखे होते है। अपेतराक्षसी, वर्वरी, करवी. तङ्ग", खरपुष्या और प्रज- तुलवाई (हि खो०) १ तोलने को मजदूगे । २ पहिये गन्धिका। को पौधन को मजदूगे। ___ गुण-कट, सिक्तरस, उदयग्राहो, उष्णवोर्य, दाह. तुलवाना (हिं० कि० ) १ तोल करना, बजन करना । २ जना, पित्तकारक, अग्निप्रदीपक एवं कुष्ठ, मुत्रमच्छ, गाड़ों के पहियेको धूगेम घो तेल आदि दिलाना, प्रोगरक्तदोष, पावशूल, कफ मोर वायुनाशक । शुक्ल तुलसी वाना। और माण तुलमो दोनोंके गुण एकमे हैं। तुलमारिणी ( म स्त्री. ) तुरेण वेगेन मरति मणिनि- वर्वरो तुलमो के गुण-यह रुक्ष, गोतवीर्य, कटग्स, डोप । तृण, घास। विदाही, सोच्य, रुचिकारक, हृदयग्राहो, अग्निप्रदीपक, तुलमी ( स. स्त्रो.) तुला मादृश्य स्थति नाशयति सो- लघु पाकी, पित्तवर्धक एवं कफ. वायु, रक्षा, कण्डु, कमि क-गौरादित्वात् डोष शान्ध्वाः । स्वनामख्यात वृक्ष। पौर विषनाशक है । ( भावप्र.) ( Ocymum Sanctum ) "तुम्नमें " को मामोत्पत्तिके रसको उत्पत्तिका विवरण ब्रह्मवैवर्त पुराणमें इम विषयमें इस प्रकार लिखा है। इस प्रखिल माग्में प्रकार लिखा है-तुलसो नामको एक गोपिका गोलोकमें जिस देवोको तुलना नहीं है, वहो तुम्लसो नामसे प्रसिद्ध राधाको सखो थो। एक दिन राधाने इसे कष्णके साथ है। (शब्दार्थचि०) विहार करते देख शाप दिया कि 'तू मनुष्य अरोर धारणा बहरमपुराण के मतसे-तकारसे मरण पोर उकार । कर।' तुम्लसो यह शाप सुन कर बहुत दु:खित हुई युक्त होनेसे मत ममझा जाता है अर्थात् मतव्यक्ति जिसके और माणके शरणमें पहुंचो। हणने उसे कहा, 'तू प्रभावसे "लसति" अर्थात् दोलि पाता. उसोका नाम ममुथयोनिमें जन्म ले कर तपस्याके द्वारा मेरा अंश तुलसो। (बद्धर्मपु० ६) ... पायेगो।' सापक भडसार तुलसो धर्समा राजाके