पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६९७

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तुलसी

  • पावे। शाखाके टूट जानेसे महापाप होता है। तोड़ने करना निषित है। इसके उत्तरमै शव कां-

पहले मतिपूर्वक निनलिखित मन्त्रका पाठ कर सोन तुलसोकाठको मालाके मिया पोर दूसरे काठको माला चार तानो बजानी चाहिये और तब धोरे धोरे तोड़ना मिषित। तुलसीमाला धारबका निषेध है, यह चाहिये । तोड़नेका मन्त्र- . इम वचनसे महौं झलकता । "मातस्तुलसि ! गोविन्दादयानन्दनकारिणि ! स्मा परिणतोका कहना है कि यह विमों के लिये 'नारायणस्य पूषार्थ चिनोमि त्वां नमोऽस्तु ते॥ निषित है। इसके प्रमाण के ये वचन देते.- कुसुमैः पारिवातायैः सुगन्धैरपि केशवः । "तुलसीपत्रआतेन मारून भव भूषितः । स्वया विना नै तति चिनोमि त्वामतःशुमे । विप्रत्व न च तत् काठमाला गलगता " स्वयाविना महामागे समस्तं कर्म निकले। (पामोत्तर.) अतस्तुलसि देवि स्वो चिनोमि वरदा भव॥ इसके मिवा दूमरोंके मतम-विष्णुदीचाविहीन चयनोद्भवदुः यद्देवि ते दि वर्तते। विनोंको रसका धारण करना उचित नहीं । तत्चमस्व जगन्मातस्तुरूसि स्थानमाम्यहं ।' तुलसीका स्तव- (क्रियायोगसार) "वृन्दा वृन्दावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी। "तुलस्यमतजम्मासि सदा एवं केशवप्रिया । पुष्पसार नन्दिनीच तुलसी कृष्णजीवनी।" केसका चिनोमि त्वा वरदा भव शोभने । एतन्नामाष्टक चैतत् स्त्रोत्र नानार्थ संयुत्त । स्वदंगसम्भवैः पौः पूजयामि यथा हरिम् । य: पठेताच संपूग्य सोऽश्वमेष फल लमित् । तथा कुरु पवित्रागि कलौ मलविनाशिनि ।" (ब्रह्मवैवर्तपु.) (स्कन्दपु०) जो यह स्तव प्रति दिन पाठ करते, उन्हें पहा. इन सब मन्त्रीका पाठ कर तुलसदिल तोड़े और मेधयनका फल मिलता है । तुलसोपवसे गणेश- विष्णु की पूजा करें, तो लक्षकोटि फल मिलता है। पूजा नहीं करनी चाहिये । “न तुलस्या: विनायक" (स्मृति) बादशी भादि तिथियों में तुलसी चयनका विविध है। विष्णु तुलसीविवाह और तुलसीप्रतिष्ठा विधि--पहले तुलसोडव पूजाके लिये एक हादशी तिथिको छोड़ कर और सम घरमें पथवा किमी दूमरी जगह रोपते । पोहे निविद दिनों में तुलसीदल तोड़ सकते हैं। तोन वर्ष पूरे होने पर वहां एक वैदिका बनात (विष्णुधर्मोत्तर) है। इसके पनन्तर विशवकालमें वा कार्तिकमासके तुलसीकाष्ठ मालाका माहात्म्य - प्रत्येक विष्ण भक्ति- वैवाहिक नक्षत्र में यहां मण्डप पौर कुगरपदो निर्माण . परायण वणवको तुलमोकाठको माला अवश्य धारण करते है। यह प्रतिष्ठा पूणि मामें भी विशेष पाप्रद ! • करनी चाहिये। जो तुलसोको माला धारण करते है, बाद शान्तिकर्म, माटस्थापन, विवाह पाहि . उन्हें पद पद पर अश्वमेध यजका फल प्राप्त होता है। विवाहविधिके अनुसार सब काम करने पड़ते है। वेदः तुलसीमाला वैष्णवों के चिवरूप है। अन्य वचनानुसार, वेदाङ्गपारग बाधणों को ऋत्विक नियुक्त करना चाहिये ब्राह्मणको काठको माला पहने, यतिको किसी सवारो और वणवविधान के अनुसार वनोकलम स्थापन . पर चढ़े पोर विधवाको चारपाई पर सोये हुए देखें करना चाहिये। यहां मण्डपमें लक्ष्मी-नारायणको तो सचेल बाम करना चाहिये। मूर्ति स्थापन करनी पड़ती है। सूर्य के पस्त होने पर ___ "काष्ठमालावर वित्र यतिन यानरोहिण। शुभलग्नमें मन्नपूर्वक विवाह कर्मवत् सब कार्य करके 'संहास्यां विधवां दृष्टा सचेल अलमाविशेत् ।" होम करना होता है। मन्त्र- (पद्मपु.) "ओं नमो केशवाय नमः स्वाहा, नारायणाय स्वाहा, रस.वचमक पनुसार बामणको तलसीमाला धारण कापवाय गोविन्दाय विष्णवे मधुसूदनाय त्रिविक्रमाय पाम. Vol. Ix. 173 .