पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६९८

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तुलसी कवि-कुलसीदास नाय श्रीधप पीयि पद्मनाभाय दामोदराय उपेनाय वश त्याग न सके तो कम-से-कम पाठ व सक अनिकतार अच्युताय अनन्ताय गदिने चक्रिण विष्कक सेनाय उसका मुंहतो देखना हो नहीं चाहिए। यह ज्योतिष 4ण्ठाग जनार्दनाय मुकुन्दाय अधोक्षजाय स्वाहा" इस कापादेश है। मन्बसे होम करना चाहिये। बाद यजमानको at तुलसोदामका जन्म भी उपभुखमूम मचवमें इमा पोर सगोत्र बन्धुषोंके साथ मिलकर इसका प्रदक्षिष था। सम्भवतः इसीलिए उनके पिताने उन्हें त्याग दिया करते हैं। वैदिक पर तुलसोक पारिग्रहणमें सूता था । उम समय ऐसे बच्चों को पालने के लिए अन्य गहस्य शान्तिकाध्याय. जप पोर पवमहिलाका पाठ भो भी तैयार नहीं होते थे। मौभाग्यवश तुलसीदास एक करना पड़ता है। साधुके हाथ पड़ गये थे । कविवरने पपनो विनयपत्रिका पोहे तरह तरसक मालवाद्य कर पूर्णाहुति देते में लिखा है- और तब पभिषे कविधि समान कर ऋत्विकोंको दक्षिणा 'जननी जनक तमो जनमि करम बिनु विधिहू' विरज्यो अण्डेरे। दे विदा करते है। इस प्रकार विष्णु के साथ माय पर्थात् जनम के बाद मातापिताने मुझे छोड़ दिया देवो तुलसोको पर्चना करनी पड़ती है। जो इस विधान. या विधिने भी मेरा भाग्य प नहीं किया, इसीलिए में तुलसी-प्रतिष्ठा, तुलमो-रोपण पोर तुलसोको सेवा मुझे छोड़ दिया है। करते. विपुल भोग प्राप्त कर मोक्ष पात है। साथ ही तुलसीदास गुरु थे, उन्हींको सङ्गत में (भिक्तिवि. १. विला. ) तुलसीदासने भारत भ्रमण किया था और उनसे उन्हें प्रत्येक मनुषको अपने घर कमसे-कम एक बाध्यामिक शिक्षा मिलो हो । तुखसोहर्ष पख लगाना चाहिये। . इनके कवित्त रामायण के पढ़ने से मालूम होता है तुलसी कवि-हिन्दोके एक कवि। इनके पिताका नाम कि इनका यथार्थ नाम रामबोला था पिताका नाम .यदुराय था। रहोंने १५५५ में कविमाला नामक प्रामाराम सक, माताका दुलमी, पत्नोका रत्वावलो. एका हिन्दो अन्य रचा था। इस प्रन्यम पूर्ववर्ती ७५ ससुरका दीनबन्धु प ठक पोर पुत्र का नाम तारक था। कविमेकी कविताएं उधत वो गई। शवावस्था में ही पुत्रको मृत्यु हो गई थी। जैसा कि तुलसीदल (म. पु. ) तुलसोपत्र । कविवर स्वयं लिखा है- हालसोदामा (हि.पु.) एक पाभूषण । "दुवे आतमाम है, पिता नाम जगजान । तुलसोदास-हिन्दुस्तान सर्व प्रधानमहाकादि । किसोका माता हुलसो कहत सब, तुलसी है सुन कान ॥ मत है कि ये कनौत्रिया बायब थे, और कोई कसर प्रहमद उधारन नाम करि, गुरुको सुनिए साथ । परीषमा बतलाते है । कनौजिया प्राण भिचा प्रगट नाम नहि करत जग, कहे होत अपराध। छत्तिसे बड़ो नफरत रखते हैं, पर तुलसोदासने अपनो दीनबन्धु पाठक कहत, ससुर नाम सब कोइ । कविता में लिखा-"जायो दुल-मगन" अर्थात 'जिस रत्नावलि तिय नाम है, सुत तारक गत सोई ॥" पुलगे मांगनेको प्रथा है. इस साल में मेरा जब एषा'। बातों का विश्वास है, कि तलसोदासका यह नाम इससे उन बमोजिया न समझ सरयूपारोप समझ तो उनके गुरुका दिया हुचा है। इनके जन्मस्थान के विषय में कोई पापत्ति नहीं। नको दुबै उपाधि भी पोर गोत्र भी नामा मत।कोई कहते है कि दोपावके अन्तगत परामर । वि०म० १५५ मे रमका जन्म एमाधा। पहले सरो नामक खानमें इनका जसपा था तो कोई हस्ति. बत हिन्दुओंको ऐसी हा यो, किजो बेहाके नापुरमें बतलाते है, कोई चिवकटो निकटवर्ती हाजि. पन्त पौर मूलाके प्रारम्भमें प्रभुतमूल (गण्ड) में जन्म- पुरका रनको जन्मभूमि मानते रे तो कोई बांदा जिले में पण करता है, वह पिता और प्रस्थन्त नौरादय यमुनाके किनारे राजपुर नामक स्थानमें इनका जन्म होता है। इसे पुनको स्वाग देना हो अपित है, बदि एषा बतलात है। परन्तु मानुप्रिया प्रमाण वारा यहो