पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/७००

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तुलसीदास तुलसीदासने इसका उत्तर दिया- सङ्गको प्रार्थना को। परन्तु तु ससोदास विमो प्रकार "कटे एक रघुनाथ मंग, बांधि जटा सिर केस । भो राजो न हुए। रत्नावलीने बड़े दुःखके साथ हा तो चाया प्रेमाम, पत्नीके उपदेश ।" कहा- केसी मधुर घास है। पतिका उत्तर पा कर रत्ना. "खरिया खरी कपूरलों उचित न पिय तिय त्याग। बन्नो निश्चिन्त हो गई। जी भरके पतिको प्रसा * खरिया मोहि मलिक अचल करी अनुराग !" करने लगी। अर्थात् जब तम्हारो झोलोमें खड़ो ले कर कपूर वर्षों बोत गये। तुम्लसोदाम इम समय वाक्यमें तकको स्थान मिल गया, सब प्रियतम! स्त्रोको त्याग पदार्पण कर चुके थे। उन्हें घर-द्वार कुछ भो स्मरण देना उचित नहीं। या तो मुझे भी झोली में रख लोजिए, म था। मामा म्यानमें पर्यटन करते हुए दैववश वे अथवा ( सर्व त्यागी हो कर ) उस भगवान में पनुराग अपनो सुसराल पहले और अतिथि बन कर एक दिन कोजिए।' वही रहे। मुम्हें याद हो न श्रो. कि यह उनको स्त्रोको बात सुन कर साधु तुलमोदासको चानोदय सुमरान है। उौंको डायनो उनका अतिथिसत्कार हुा। उन्होंने मान लिया कि उनको अपेक्षा उनको करने पाई। उन्होंने भी अपने पतिको न परवाना। स्वाने अधिक ज्ञान प्राप्त किया है। फिर क्या था, तुलसो. सम्होंने तालमोटा के लिए प्रासारादिको व्यवस्था कर दास सर्व त्यागो हो गये-झोली एक बागको दे दो। दो। तुलसोदाम स्मात व पाव थे, वे अपने हाथमे तुलसीदास, बलिया जिले के पन्तर्गत भृगु के पाश्रम, रमोई बनाने लगे। दो एक बात सुन कर रक्षाबलोने सनगर, पाराशिया (पाराशरोय) प्रादि पुण्यस्थानों के अपने पतिको पहचान लिया। उन्होंने अपने मन का दर्शन करते हुए गायघाटके राजा गम्भोरदेवकी पाति- भाव छिपा कर कहा-'पापको मिला हूँ।' त लसो थेयता पर मुग्ध हो कुछ दिन वहीं रहे। वहांमे ब्रा- बोले-'जरूरत नहीं, मेरी झोलोमें है। रत्मावलो खरनाथ नामक महादेवके दर्शन करनेके लिये पारा बोनी-तो क्या जरासा कपर लात लसोने जिले के ब्रह्मापुरमें गये। वहांसे वे काण्ट-बामपुर गये; कहा-'वह भो मेरो झोसोम ।' यहांके अधिवासियों को राक्षमो नोतिको देख कर उन्हें इसके बाद साध्वी, पतिसे कुछ न कह कर उनके बड़ा दुःख हुपा। यहां मजाक नामके एक पोरने चरण प्रक्षालन के आगे बढ़ी। परन्तु तुलसोदामने तलसदासको बहुत सेवा को थो। पहोरको सेवासे निषेध कर दिया, जिससे उनको मनस्कामना मिन खुश होकर इन्होंने उसमे कुछ माँगने के लिए कहा। हुई । उम दिन गपको उन्हें नीन्द भो न पाई। सिर्फ दरिद्र प्रहारने प्रार्थना को-"भगवान् पर मेरो पूर्ण यही चिन्ता थी-"किस तरह मैं दयेवरको पादसेवा भक्ति रहे और मेरा वंश दोघं जोवो हो, इतनो हो मेरो कर मकू गो? बड़ौ मोचा-विचारोवे बाट निश्चय किया प्रार्थना है।" तुलसोदामने कहा, "यदि तुमने (था कि जो पभो जरा जरामो चोजोंको भो त्याग नहीं कर तुम्हारे परिवार से पौर किसोने ) चोरो न की हो, सके हैं, वे क्या अपनो धर्म पत्नोको मथा त्याग मकते अथवा किमौके मनको कष्ट न दिया हो, तो तुम्हाग .! दूसरे दिन प्रात:काल पा कर उन्होंने पतिसे पूछा- अभिप्राय सिद्ध होगा। बलिया और शाहाबाद जिले के 'देव ! पापने क्या मुझे पहवामा। तुलसोदामने उत्तर लोग पब भो रस किम्बदन्तिको कर करते तुलसो. दिया, 'नहौं।' गमावलीने फिर पूछा, 'पापको क्या यह दासकी बात सच्ची निकली। भी नहीं मान म कि पाप किमके घर ठहरे हुए है? काहसे तुल सोदास बेसापतौत नामक खाममें चले उत्तर मिता. 'नहौं।' फिर पूछा, 'म स्थानका नाम गये। यहां पण्डित गोविन्दमित्र नामक एक शाक- जानते है इसका भो उत्तर मिला, 'नहीं'। फिर होपो ब्राण और रघुनाथसिंह नामक एक नवियने रत्नावसोने धो धो पपना पूरा परिचय दे कर उनसे बड़े पादरसे इनको अपना पतिथि ब गया था। उनके