पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/७०१

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प्रयासमार बेलायतोतका नाम रघुनाथपुर प्रसिद्ध : "का भाव का महत, प्रेम चाहिये सोच । पा। यहां जिस चौराये पर वे बैठा करते थे, उसको बामदु भावहि डामरीका लतिक कुमार" पा भी लोग भतिको निगारसे देखते हैं। रघुनाथपुर- किसो समय कुछ डकैत तुलसीदासको मारने पाये के निकटवर्ती कायद्य-प्राममे जोरावरसिंह नामक एक घे! समाने. पपनो रचाके लिए प्रयबनकर कहा था - अवियने इनसे दोक्षा ग्रहण को यो। METARATनिकेतका रजनी बहुविवि चोर । तुलसोदास पहले पयोध्या में पा कर कुछ दिन दसत दयानिधि देखिये कपो किशोरि किशोर ।" स्मात वणवक रूपम रहे थे। उस समय भगवान तुलसोदासके कायनानुसार सन्मानने दर्शन दिये। रामचन्ने उनको खामें दर्शन दिये और भाषा रामा. हम इस मोम-पाकारको देखबर डकैत लोग मूर्शित यण लिखनेका पादेश दिया । १६३१ मवम रन्होंने होकर गिर पड़े। गमायण लिखना प्रारम्भ किया। परण्यकाण्ड समान पकबर बादशाह के राजख-सचिव टोडरमल तुलमो. होने पहले हो वैगगो वैषणवोंमे उनका मतभेद हो दासके एक परम मित्र थे। १५४५म में टोडरमलको गया। वे वाध्य हो कर कायो चले पाये। लोलार्कः मृत्यु होने पर, उनके सरणावं तुलसोदामने मिना. लिसित दोहरचे थे- कुण्डो पाम असोघाटमें इनका डेग था। यहों मे १६८० "महतो चारोगांवको मनकामहीप। संवत्म रन्होंने स्वर्ग लाभ किया। जहां ये रहते थे, तुलसी या कालिकाको अषये टोडरदीप उसके पासका घाट पब भी 'तुलसोघाट" कमाता है। तुलसी राम सनेहकों सिर पर भारी भार।.. उसके पास ही उस कवि द्वारा प्रतिष्ठित एक हनुमान- टोर धरेन कोपरग कर रहे उतार.. का मन्दिर तुलसी र थाका विमक टोटर पुगमन बाग। कायोमें रनके विषयमे बहतमी किम्बदन्तियां समुझि सुलोचन सीविहें उमवि उमगि अनुराग प्रमि:- रामधाप टीशर गये तुलसी भयेउ निसोच। . सुभा जाता है, कि रामायण ममाल होने के बाद, एक जियनो मीत पुनीत बिनु यही बडो संकोय।". दिन तुलसीदास मणिकर्णिका घाटमें खान कर रहे थे। . पम्बर-राज मानसिंह और जमत्सिापादि हिन्दू इतने में एक संस्कृत के जानकार पण्डिसने पा कर उनसे राजमारगण अक्सर इनसे मिला करते थे। एक दिन कहा,-"साधु पापतो संस्कत जानते हैं, फिर भाषामें किसोमे तुलमोदासमे पूछा-"बड़े पादमो पापके पास रामायण क्यों लिखो।" तुलसोदासने इस कर उत्सर क्यों पात?" तुलसोदासने इसका उत्तर दिया- दिया-"मेरो भाषा नितान्त तुच्छ या मैं मानता, "लहै न फूटी कौड़िह को बाहै किहि काला पर वह भापके 'नायिकावर्णन को अपेक्षा पनेक सो तुलसी महंगो कियो राम गरीब निवास। गोमें उत्तम है।' पण्डितने का-"कैसे ?" घर पर मांगे एक पुनि भूपति पूजे पाहा: तुलसीदामने उत्तर दिया- ते तुलसी तब गम बिनु वे अबराम सहा . "भनिभाजन पिंख पारई पुरम अमी निहारि। इस प्रकार तुलसोदासके सम्बन्ध और भो बहुतमी का छोगिय का संग्रहिय का विवेक बिचारि।' किम्बदन्तियाँ प्रसिद्ध है। 'बनारसी विलास' नामक घनश्याम शक एक पच्छे कवि थे, हिन्दीषी कविता हिन्दो जनयन्वकविवर बनारमोदासको • जोननो में इनकी बहुत अच्छो होतो थो । एक दिन कुछ पण्डितोंने लिखा है कि "० १६८ में जिस समय तुम्नसोदासका उनसे संस्खाल भाषामें कविता बनाने के लिए कहा। स शरीरपात हुआ था, उस समय जैनकवि बनारसोदास- पर वे बोले-"मैं तुलसीदासमे पूछ बार उत्तर दूंगा.।" को पाधु १७ वर्ष की थी। पागरम तुलसीदासके साथ तुलसीदासने पूछने पर उनाने उत्तर दिया बनारसीदासको मेंट तुलसीदासने रामायणको Vol. Ix.173 .