पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/७०२

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तुलसीदास-तुलसीपुर एक प्रतिलिपि करा कर उन्हें उपहारस्वरुप दो। इमक वा गोतावली, १० जणाक्लो वा जप-गीतावली, २५ २१३ वर्ष बाद दोनोंका पुन: समागम, हमा. तो तुम्लमो- विनयपत्रिका, १२ गमचरितमानस । अन्त ग्रन्थ दासने रामायण के मोन्दर्य विषयमें उनसे प्रश्न किया। बड़े बड़े हैं। रामचरितमामम सबसे बड़ा ग्रन्थ है और बनारमोदामने उमो ममय यह कविता रच कर सुनाई वर्तमानमें वह 'तुल मोरामायण' के मामले प्रमिह । "विराजै रामायण घट पाहि ॥ तुलसोदुङ्गारि-विशाखपत्तन जिलान्तर्गत वस्तार मरमी होय मरम सो जाने, मुख जानै नहिं: विरा०॥ राज्यको एक विस्टन गिरिमाला । यह पक्षा० १६४५ आतमरामानगुन लछमन सीता सुमति समेत । उ. और देशा०८१३० मे ८२४. पूर्व में पवस्थित शुभपयोग बागरदल-मंडित, वर विवेक रणखेत; विगंजे है। रमको ऊंची चोटोका नाम तुलसो है। जो समुद्र ध्यान धनुष टंकार शोर सुनि, गई विषयदिति (9) भाग। पृष्ठसे ३८२८ फुट जचो है। भई भस्म मिथ्यामत लङ्का, उठो धारणा आग; विगने। तुलसोईषा (म० स्त्रो० ) तुलसों हेष्टि तुख्यगन्धत्वात् जरे अहान भाव राक्षस कुल, लरे निकांछित सूर। हिष:पण तत-ष्टाप । वयं गे, बन तुलमी। जूझे रागद्वेष सेनापति संसै गढ चकचून, विराज ॥ तुल मोपत्र ( स० को०) तलस्याः पत्र-तत् । तुलमीको बिलखत कुम्मकरण भवविभ्रम, पुलकित मन दरयाव । पत्तो। थकित उदार वीर महिरावण, सेतुबन्ध समभाव, विराज॥ तुन मोपुर-१ अयोध्याके गोण्डा जिलेके अन्तर्गत मूर्छित मन्दोदरी दुराशा, सजग चरन हनुमान । एक परगना । इसके उत्तर हिमालय, दक्षिण में बलराम- घटी चतुर्गत पर णति सेना, छुटे उपक गुण बान; विराजै॥ और पुर परगना, पूर्व में प्रारनाला नदो और बरगरच जिन्ना निरखि मकति गुण चकसुदर्शन, उदय विभीषण दीन । है। इस स्थानका प्राकृतिक दृश्य अत्यन्त मनोरम है। फिर कवध महीगवणकी, प्राणभाव शिरहीन विराज॥ उत्तरभागमें पहाड़के ऊपर गवमें टका रक्षित विस्तोत्र इह विधि सकल माधुघट अन्ता होय सहज सग्राम । वनविभाग है और उसके बाद हो छोटे छोटे पहाड़ोस यह विवहारदृष्टि रामायण, केवल निश्चय गम॥ घिरे हुए जंचे नोचे भूमिखगड है। यहांके जमीन विराजे समायण. उत्तम होने पर भी जलवायु बहुत अम्वास्थ्य कर है। सो कारण यहां बहुत कम मनुष्य बसते और उतना पच्छा तुलमोदाम यथाथ में हिन्दों के महाकवि थे । उनको रचनाका माधुर्य , लिपिचातुय और माध्यमिकभाष सत्र क्लषि कार्य भी नहीं होता है। वैश प्रत्यक्ष प्रशसनीय है। हिन्दोभाषा-भाषो पति उच्च परगनेका प्रधान श जलोय है किन्तु यहां राजा महाराजापाम ले कर दान दरिद्र भिक्षुक तक धानको फसल अच्छी होती है। इसके सिवा जौ, गह तुलमोदास के दोहोंका पादर करते हैं। इनके माममे और उरद भी कम नहीं उपजते। यहां हिन्दुओं को बहुमसे अन्य प्रचलित है, किन्तु वे सभो इन्हींको खनो- मख्या हो सबसे अधिक है जिनमेंसे थारु नातिका नाम हो उल्लेश्वयोग्य है । थारुलोग तूराणी जातिके जैसा होने से निकले हुए हैं या नहीं, इममें मन्द । पर भो ये अपनेको चितौरके राजपूत कुलोद्भव बतलाते हैं । निम्नलिखित ग्रन्य खाम उन्हों के ग्चे हुए समझे अधिक दिनकी बात नहीं है, कि तुलसीपुर पर.. जाते हैं,- गनका अधिकांश हो शालवनमे ढका हुपा था। बोध .१ रामलोला नहछ , २ वैराग्यसन्दीपनो, ३ वरवे बीच में दो एक घर थार अपने अपने सरके अधीन रामायण, ४ पाय तोमङ्गन, ५ जानकीमङ्गल, ६ रामाज्ञा वहां स्वाधीन-भावसे रहने लगे। ये सब थारु-मर्दार दो (ये छ गन्ध छोटे छोटे हैं ), ७ दोहावलो वा ससमई, प्रकारके कर देते थे। एक कर 'दखिनाहा' वा दक्षिणशमें कवित्त रामायण वा कवितावली, ८ गोतरामायण बलरामपुर के राजाको और दूसरे 'उत्सग' वा उत्तरांश (१) सूर्पनका राक्षसी। में दा राजाको मिला करता था। . .