पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/७११

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तुधान्य-तुपरकये तुषधान्य ( स० को०) तुषान' धान्य मनुषधान्य, है। जिन सब वस्तुपोको विरिणति प्रवन रहता है, छिलका सहित धान। . वेरातको कुछ बोतल हो जातो है। यही कारण तुषसार ( स० पु. ) तुष सरति अनुसरति समव । है कि उन सब वस्तयों के जपर कुछ तुषार जम जाता भाग भूमोके बीच बहुत धोरे धोरे फैलतो है, इसोसे है। सभी धातु द्रयों को विकिरणति बहुत कम है, तुषका नाम तुषसार रक्खा गया है । इसोसे उनके अपर उतना तुषार नहीं जमता, किन्तु महो, तुषानल (सं० पु.) तुषस्य पनलः । १ तुषजातपग्नि, कांच, बाल, बचपन, पाम पादि द्रवों में विकिरण- भूमोको पाग, करमोको आंच । २ तुषाग्निमें पात्मदाह । शति पधिक है, इस कारण उनके अपर तुवार भी अधिक रूप प्रायश्चित्तविशेष, भूसो वा घास-फसको भागमे । जम जाता है, उससे पृथ्वोपष्टमे तेज. विकिरणको भस्म होने की क्रिया जो प्रायश्चित्त के लिए की जातो है। तथा तुषार उत्पत्तिको प्रतिबन्धकता सेतो। नब कुमारिलमा तुषाम्निमें हो भस्म हो कर मरे थे। पाकाशमहल मेघाच्छा रहता है, तब वह तुषाम्ब ( स० को.) तुषस्य अम्ब: ६.तत्। तुषोदक, भूपृष्ठ तेज-विकिरण द्वारा उतमा ठंढा नहीं एक प्रकारको कांजो जो भूमोसहित कुटे हुए जौको सकता, क्योंकि मेघावनी तेत्र विकता सड़ा कर बमाय जाती है। गुण-अग्निदोनिकारक, हुपा उसके अपर गिरता है। यही कारण उदयग्राहो, तोक्षण, उष्णवार्य, पाचक, सावित्तजनक कि मेघाच्छा रात्रिमें उतना तबार नौ | एवं पाण्ड, कृत्रिम और वस्तिगत शूम्नविनाशक है। विस्वत शाखाविषिष्ट के तले भो तुषार नहीं जमने- तुषार ( म० पु०) तुथत्यनन शस्यात् तग-भारन् । तुषरा का यहो कारण है। जब बाबु धोमो चालसे बातो, दयश्च । उण् १९३८) १हिम, बरफ। २ हिमकण, तब सब वस्तए अधिक ठंडी हो जाती है पोर तुवारोत्पत्ति बहुत कुछ ज्यादा हो जाती है। क्योंकि उतनी ही कम विकिरणशक्ति हो तुषारको उत्पत्तिका प्रधान शीतल होनेसे वायु वाष्पकातक परिविजाती कारण है। रातको पृथ्वो परको सभी वस्तु जब पपमा तेज नदोमे समुद्र तक सभो जलाशयका पन्तवर्ती रोज संयोम- विकोण कर वायुराशिको अपेक्षा पधिक ठणी हो से धुप के अवयवसथ वायाकारमें अपर जाकर जो जातो है, तब चागे ओरको वायु के अन्तर्गत जलोय जल गिरता है, उसे तुषारज जय माता पारण वाष्य धनोभूत हो कर तुषारकै बिन्दु के रूपमें उनके अपर जल पापियाँके लिये तो पहितकर है, पर हमके लिये जम जाती है। विशेष उपकारक है। भावप्रकाशके मतसे इसके गुण- उष्णताका जितना हो हास होता है, वायुराशिमें शोतान, रूक्ष, वायुवईक, पित्तनाशक, एवं कफ, सबसल, उतनो हो कम वाष्प रहती हैअर्थात् उसनो हो कम कण्ठरोग, मन्दाग्नि, भेद और गलगडादि रोगनांसक। वाप्प हारा वायुराशि परिषिक्त होता है। सुतरा दिनके (भावप्रकाश० ) ३ पोतलस्पर्य । ४ वारमै समयमें जो वाप्प रहती है, रातमें कुछ कुछ बोतल हो प्रकारका कपूर, चोनिया कपूर। ५ देशभेद मि . कर यदि वर उससे परिषितं हो जाय तो शोसलद्रवाके लयके उत्तरका एक देश । योक लोगोंके प्रयास कर स्पर्श से ही उनके अन्तर्गत कुछ वाष्प धनी हो कर देश तोखार' . नामसे प्रसिद्ध है। तुषारगोन तुषारके रूपमें परिणत हो जाती है। वायुमें जाति, तुषारदेशमें बसनेवाखो जातिप्रनतत्वविदोके जितनी हो अधिक वाष्प रहती है, उतना ही कम मतानुमार या जाति पकजातिको एक पाखा। यदि वह ठण्डो हो जाय तो तुषार बनता है। इस देशमें लो शताब्दो में इन लोगोंने भारतवर्ष में प्रबंध कर बनेक गोषकालमें दिनको वायुराशि बहुत गरम रहता है, किन्तु स्थानों पर पाक्रमण किया था। (वि.) शोतल. रातको उतनो ठण्डो नहीं रहतो; इसी कारण हवा म्पर्थ युक्त, छूने में बरफको तरस रहा। मिली हुई है। वाष्प भी तुषाररूपमें परिषत नहीं होतो तुषारकण (पु.) तुवारा बना रिमा पाला।