पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/७२

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ट्रपरली जाने पाने में बहुत प्रसुविधा होती थी और माथहो कत्ता,कानपुर, मध्यप्रदेश विagn, बीचिन, चीखपुर, थ बहुत खर्च भी करने पड़ते थे; किन्तु जबसे रमका धोराजी, काठियावान, जयपुर, जोधपुर, वारांची, पाविष्कार हो गया है, तबसे बहुत थोड़े खर्च में कानाडा इत्यादि । अर्थात छह सात पैसेमें हो क्या गरीब क्या प्रमौर सभो ट्रेडमाक ( पु०) बने या भजे हुए मास पर लगाये टोचार कोम तक आसानासे घने जाते है। रेलगाडीको र आनेका चिड, छाप। नाई एसमें कोई निश्चित समय नहीं रहता, वग्न हर ट्रेडिल मबोल ( स्त्रो०) एक प्रकारको छोटो कल । एक मड़क और गलो में जब और जिस स्थान पर पच्छा इसको एकही पादमो परसे चलाता और हायसे उस. में कागज रखता जाता है। इसमें फोटोको तस्वीरें होतो. उमी जगह इस पर चढ़ कर ग्रानन्द लटते है। ___ बहुत स्पष्ट और उत्सम छपतो हैं और काम बहुत जल्दो. आजकल यह भारतवर्ष के बड़े बड़े देशों में चलने लगो से होता जाता है। है, यथा-मन्द्राज राजपूताना, बरकल, चटयाम, ट्रेन (अ. स्त्रो०) १ रेलगाड़ी में लगी हुई गाड़ियोंकी पजाब, बम्बई प्रदेश, बम्बई शहर, बरमा, कल-पति। २ रेलगाड़ी। 8-मस्कृत और हिन्दी वर्णमालाका तैरहवा अक्षर, यह मोक्षरूपिणा कुण्डलो, पोतविद्युमताकार, त्रिगुणयुक्त, टवर्ग का द्वितीय वर्ण । रसका उच्चारणस्थान मानि पञ्चदेवात्मक, पञ्चप्राणमय, त्रिविन्दु और विशक्तियुक्ता । अमात्रा समयमै रस वर्णका उच्चारण होता है । इसके इसके ३१ वाचक शब्द हैं-शून्य मञ्जरी, वौज, उच्चारणमे पाभ्यन्तरप्रयत्न. जिन्ना-मध्य हारा मईस्थान पणिनी, लागलो क्षया, वनज, नन्दन, जिज्ञा, सुनन्द, म्पर्श और वाहाप्रयत्न, विवार, श्वास, अघोष पोर महा धूणक, सुधा. वक्तल, कुन्तल, वकि, अमृत, चन्द्रमण्डल, प्राण है। माननाम्यासमें दक्षिण जानम न्यास करना दक्षजा, अन नभाव, देवमन, हानि, एकपाद, विभूति, होता है । इसको लिखन-प्रणाली इस प्रकार है-""। ललाट, सर्व मित्रक, वषन, नलिनी, विष्णु, महेश, इस ठकारम सूर्य, चन्द्र और पनि सर्वदा अवस्थान ग्रामणी भोर भयो । ( नानातन्त्र ) काव्य के प्रारम्भम इसका करते हैं। प्रयोग करनेसे दुःख होता है । पद्यको प्रादिमें दम शब्द- इस वर्ण की अधिष्ठात्री देवीका ध्यान करके इम __का विन्यास करनेसे शोभा होती है। (वृत्त. १० टी.) वण का दश बार जप करने से साधक शीघ्र ही पोष्ट 8 (म पु. ) ठ-पृषोदरादि० साधुः वा व्यने ठो बाहुल. नाम कर सकता है। इसका ध्यान- कात्। १ शिव, महादेव । २ महाध्वनि । ३ चन्द्र "ध्यानमस्य प्रवक्ष्यामि शृणुष्य कमलानने। मण्डल। ४ मण्डल । ५ शन्य । लोकगोचर, इन्द्रिय- ग्राध वस्तु। पूर्णचन्द्रप्रभा देवा विकसत्पंजेक्षणाम् ॥ (हि. वि. ) जिसको डाल पोर पत्तियाँ सूख कर सुन्दरी षोडशभुजा धर्मकामार्थमोजदाम्। या और किसी प्रकारसे गिर गई हो, ग, सूखा। एवं घ्यावा ब्रह्मरूपां तन्मन्त्रं दशधा जपेत् ॥” (वर्णोदारतन्त्र) ठनाना (हि क्रि०) उनठनाना देखो! • या देवो पूर्णचन्द्रको भौति प्रभासे युक्त, प्रस्फुटित ठार ( वि.) रित. खालो, शा पनको तरह नयनोवाली, सुन्दरा, षोड़शहसा और धर्म ठी (हि.स्त्री) १ दाना पीटनेके बाद बाल में लगा कामाय मोक्षदायिनी है। हुपा धमाल। (वि.)२ जिससे बचा मोर दूध पनि ' कामधेनुसनबमें इनका स्वरूप इस प्रकार लिया है. ही सम्भावनाम।