पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/७२४

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७१२ सभ्य जातियोंकी पादिम अवस्थामा विवरण अनुसन्धान , पावाब पहिनीका अनुमान, विमारत तमिल, पारनेस हो जाना जाता है। यह जाति कभी कभी दल तेलगू, धादि द्राविड़ जाति तथा कोल, भोल, सन्यास बाँध कर एशिया और यूरोप के उर्वर देशों में जातो भोर असभ्य जाति भो रमो तूरानो जाति के अन्तर्गत वहां लूटपाट मचासो थो। म साह लटका शब्द जहाँ लोग प्रमाण देते हैं, कि पार्य लोग जब भारतवर्ष में सक पाया गया है, उममेसे नोन देगको मोमाम शियन- पाये, तर यहा नोंने शक जातिको चारों भोर पना द्वारा उत्पात मोर चीनके प्रबल पराकान्त चोम राजाओं देखा । यह पक जाति उत्तुरानो जातिको तातार वा हारा उनका दमम-विवरणही सबसे प्राचीन प्रतीत होता तुर्की शाखाके पन्तर्गत भार्याने शक लोगोको उत्तर है। जब र पूर्व की पोर चोन सोमा वाधा पहुंची (भारतमे) दास, दस्यु, कोकवादि नामोंसे पमिहित तो इन्होंने पचिमको चोर हारमनरिच नामक प्राचीन कर विन्ध्य प्रभृति पर्व साबलों में भगा दिया था। येशो पथिक-राज्यमें उत्पात मचाया पोर पोछे एजेल वा द्रविड़, मलय और सिसमें बसे हुए है। तेलगू, तामिल, पहिलाके अधीन फ्रान्सके बोच जा कर वास किया। कर्णाटो, मलय पाटि भाषामों को धनिष्ठ माहण्य भो रसी जातिके लोगोंने कभी कभी तु धरिल बैग, मेलुजुग इस अनुमानका एक विशिष्ट प्रमाण । भोल, गोड़, महबद, पाजाखाँ, तैमूग, भोममान पादिक अधीन तोड़ा प्रभृति पार्वमोय जातिको भाषा भो हम सब दाधि चोन, बोगदाद, वैजेन्टियम और भारतवर्ष में उपद्रव पात्य भाषायों के साथ बहुत कुछ मिलतो शुलतो,रममे मचाया । इमो जाति के लोगोंको एक शाखा तु भएको अनुमान किया जाता है, कि ये लोग भो थक जातिक राज्य करतो है और मुगल नामक एक दूसरी शाखा वंशधर पाषष्ट्रलिया होपवासोको भाषा भो दाक्षिणात्यको भारतवर्ष में बहत काल तक राज्य कर गई। इस भनेक भाषापों सो रस कारण यह स्पष्ट कि जाति के लोगोंने कभी मध्य तर जातिको अधीनता तूरानो जातिके पभो मध्य एशिया पौर उत्तर एशिया में स्वीकार नहीं को। इन्होंने सपनो पायवर्ती सभ्य मानि रहते भो तूरानो भाषा पनेक तरहसे विकत हो कर पांनिसे ही पीक विषयों में शिक्षा प्रान की मही, किन्तु उत्तर पोर मध्य एशिया, उत्तर यूरोप और दक्षिण भारत बहन तो उनके बन्धुभावसे और न प्रजाभावसे, वर फैली हुई है। लपलेड, फिन लेण्डारी, तुरुक, उनके अपर प्रभुत्व और राजत्व करके हो मोखो है। क्रिमिया पादि देशों की भाषा भो रस. तूरानो भावाके वर्तमान वाममें तरानो जातिको ती भारतीय अन्तर्गत है, पार्य पौर समितिक भाषाको शेड़कर पयाम्प जाति कहने भो उन्हींका बोध हो सकता है। प्राचीन यूरोपीय और पासियिक भाषायें पसंतरानो भाषाके कालमें पायगय मामाजिक पोर राजनीतिक बन्धनमें अन्तर्गत नहीं है । चीनको भाषा इसके अन्तर्गत नहीं है। वह हो वार रहना चाहते थे। वे एक खोसे विवाह तूरानो भाषा विक्षत हो कर पभो उत्तर दयोय ( Ural-. चौर खरकी उपासना कर जाति और समाज-बन्धनको Altaic वा Ugro Tartaric ) एवं दक्षिण देशो देखा करतो लोग होकविन भाषामें विभत हो गई। उत्तर-तूगनीय भाषा फिर चलते थे। इनमें भी धर्म समाज है, किन्तु उनमें पाध्या मङ्गोलोय, मनोसोय, तुर्को, विनोय पोर सामयद्रीयन मिक भाव अधिक नहीं था। पाचाव पगिड़तीका मत पांच भागों में तथा दक्षिणदेशीय भाषा तामिलोय, ., पसमिधादिको (पने बधमूलक यज्ञादि) कि पार्यो गाह, वहिहिमालय पोर पाहिमालयप्रदेशोष, न.पत्यन्त प्राचीन कालमें रस तूरानो सघर्ष में भी पाया लौषिस्य, तेलापौर मलयप्रदेयोय न पांच भागों था। बादरम नामक प्राचीन पारस्य राजाकै महोत्सव विभत है। में शत पखको वलि एक प्रधान पंग समझा जाता था। चीनके उत्तरसे ले कर मारविरिया मध्यवर्ती तस्मान सारविरियाके दक्षिण में भी इस तरहकी पत्रावलि नदी किनार तक मासीय भाषा प्रचलित है। पीना- प्रचलित . ... । के अन्तर्गत मात्र.पातिके सोग वा भाषा बोलत ।