पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/७३४

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२५ चयनका समय-समय तणा उत्पन होती पाद्रं बचको गया पर सोनसे तथा उनके शरीर ..देव हवा कहताय बलारोग रोगो हवनेने टप्पा मोर उब दा दूर हो जाता है। प्राचा, दिनरात सभी समय जल पीकर मोमिताभ नहीं कर परम, दुग्ध, यष्ठिमधु, मधु और भोलोत्पल इन सब सकता तथा रमञ्चयके सभी कर दियमाई हैं। इन्चोको पीस कर जली साथ इसे नाकारा पीसे कोई कोई से माविपातिकमा भी कहते है। बठिन कठिन तणा नट हो जाती। . रसषयका सार-सचय होने पर दयमें वेदना, पनार, सेव, सोध. कोष और वहा (नीव) सब- सम्प, मुखयोकादयशून, पौष और शून्यता होतो है। को एक साथ पोस कर मस्तक पर शिप देनसे प्या पामणवा . सच-पामन तृष्णा माविपातिक जाती रहती है। सच्चाको माई ती है। इसमें हदयमें वेदमा, ठण्डा जल भर पेट पी कर पान पोर पल मधु खा मिहोबन बोर शरीरमं प्रवसन्नता होतो । बर वमन करने वाला प्रथमित हो जाती है। धनिये: अवनवा सम-स्मिन्धद्रव्य, प्रमा, लवण पौर बट के काढ़े को चोमोके साथ प्रति दिन सर्वर पोमे वृणा सवुन द्रव्य तथा गुरुद्रव्य मेवन करनेसे योन हो तृणा और दास जाता रहता है। प्रविला, पप्रमुख, कुट, उत्पपोतो. सणाको अबज पृणा करते है। खावा, बटरोहक रन सबको पूर्ण कर मधुने साथ गोली .. उपसमें तलाका सक्षण-जिस तृष्णा रोगोका खर बनाते ।। बाद उस गोलोको मुखमें रखनसे प्यास और चोरको जाता है, मूळ पोर तान्ति पाने लगती है दारुण मुखणेष नष्ट हो जाता है। क्षयज हृष्णा बरा. माया मुखयोष दय-योष भोर तालुपोष हो जाता है बर भाग जलमिश्रित दूध वा मांस रस पथवा उस पात-पोषणकारी तृष्णाको बाटसाप समझना घमम परिमापका मधुमिश्रित जल हितकर है। चाहिये। पामजखाम विल और वचका साथ सेवन करना वृष्णारोगका उपसर्ग और परिष्ट-पर, मोर चाहिए। अधिक खाने पर यदि तृष्णा पखित हो जाय जय कास पोर खासादियुत पस्यन्त मुखयोषादि कठिन तो वमि करनेसे रसका प्रतिकार होता है। इस प्रक्रिया उपद्रवय रोगोंसे मय और बमिवेगले कातर ये सब द्वारा चयज तृष्णाके सिवा अन्य प्रकार तृष्णारोग भो समारोगोको मृत्यु के कारण कृष्णाची विकिरसा-वातज हजारोग बाय नाशक मर्जी, वमि. पनास. स पित्त और महास्थय रोगी- प्रथम चोमल, शापोर शोतल इबारे चिकिता बरानो को एवं रमन पोर मयाकर्षित व्यक्षिको मोतल जल पापिये। वातावचारोगगुमिश्रित बीमामा पिलाना चाहिए। हितकर मन और भौषधहारा तषित प्रयत। पित्तत्र तारोनमें मार पोर तिहारसयुत व्यक्षिको क्षणी दूर करना वर्तव्य है, क्योंकि बाकी द्रव्य तथा तरल पोर बोतल द्रब्य तिबर।। मोवा, पान्ति होनेके बाद पन्ध रोगको चिकित्सा की जा सकती 'विपापड़, बाला, धनिया, ससको जहपोर येतचन्दन । चातुर मनुष्यको यदि जल न मिले तो वह उत्बाट सभी मिश्रित परिमाण दो तीलको दो और पानौमि व्याधियुत वा मरणापन हो जाता है। वृणासे मौत उवासति । जब पानी जसबर एक मेरबचता तो और मोहसे जीवनगाच तासोकारवर हालत- मे उतार लेते हैं। उता परके सेवन करने पिपासा में जल देना उचित । भोजन न करनेसे भी जीवन हाइकोर पर घट जाता है। तो साईका पूर्व धारण हो सकता है, किन्तु बचातर मनुष्यको जलन को तोले सय जल डालकर एकरात रसशेते मिले तो योनही उसको नवजातो।। है। इसी दिन उसमें मा ४ माया, गुन ४ माशा, (भाप्र० तृष्णाधिकार) माझारोणार ४ माया पोर चौगो मागा मिला एखादव (स.पु.) थायाः पयो यन। १शान्ति । , कर सेवन करने वत्तिय या बातो तो बचायती राने पर पादमी उसी राता बचाव: