पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/७३६

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७२४ तेगबहादुर (तेजबहादुर) गये। इनकी पेचकको बीमारोने मौत हो गई । मरते 'तेगबहादुरने पाप साध शव को करने लिए दुर्ग धन- समय वे अपने पियोंसे कह गये" कि 'जात्रो, तुम्हारे गुरु वाया है, शोध हो उनका दमन करना चाहिये " दिलोके विपाशाहों के किनारे बकाला ग्राम में है। दरबारसे तेगबहादुरको पकड़ लाने के लिए परवाना . . तेगबहादुर बहुत दिनों तक पटनेमें थे, उसके बाद निकला । तेगबहादुर अपने परिवार सहित दिखी पड़ने नाना स्थानों में घूमते हुए गोविन्दकाम पाम बकाला और वह जयपुरगजके प्रामादमें ठहरे। जयपुररामने ग्राममें पहुंचे और वहीं रहने लगे । हरकिसनको मृत्यु के उनको तरफसे बादशाहको खबर 'दो, कि "तेगबहादुर बाट उनके पातुंगमगियोंने तेगबहादुरको अपना गुरु एक शान्त एवं शिष्ट फकीर है, उच्चपद पाना वा राज्यका बना लिया। किन्तु मोधियोंने हरकिमनकै भ्राता राम पनिष्ट करना उनका उद्देश्य नहों है। नामा सो में रायको गुरु बनामिका निश्चय कर लिया था। उनके भ्रमण करना हो उनका उद्देश्य है।" कुछ भी हो, इस प्रयनले रामराय दिलोमे गुरुपट पर अभिषित हुए । उम बार जयपुरराजके प्रयत्न मे तेगबहादुर बाल बाल बच समय हरगोबिन्दके एक प्रधान शिथ मकव नशाह दिनमें गये। फिर वे जयपुर के राजा के साथ बङ्गालमें चले पाये। थे, इनका सिख-मम्प्रदाय पर अच्छा प्रभाव था । पक्ष पोछे ये पटने में ही परिवार सहित रहने मगे। यहां 'मसनणा भी गुरुवावको सुमिड करनेको इच्छामे इनको पत्रो गुजरोने भावी सिख-गुरु प्रसिह गोविन्द बकाला पहने और तेगबहादुरको गुरु मान कर उन्हें सिंहका प्रमद किया । पटनामें तेगबहादुर करीब पांच-छ मजरामा में लिया। परन्तु तेगबहादुरने उसे प्रहण वर्ष थे, उनका अधिकांश समय पूजा और ध्यानमें व्यतोत नहीं किया, कहा-"मुझे क्यों देते ११जो राजा उन्हें होता था। यहां उन्होंने मिखों को धर्म मोति सिम्बनिक मजरामा दोजिए।" अन्तमें माता पोर मक्तमशाहको लिए एक विद्यालय स्थापित किया। जोगिने तेगबहादुर गहो पर बैठे। माताने उन्हें वह पनन्तर ये अपने देश लोट पाये । कहल र राज देवो. कवच पोर हरगोविन्दको तलवार ला कर दो। तेग माधवसे, ५०० रु० दे कर, इन्होंने पानन्दपुरम थोड़ोस बहादुरमे कहा-"इनको लेने लायक मैं नहीं। पाप जमोम खरीदो, जिसमें मखेरवाल नामक नगर बसाया। लोग मुझे तेगबहादुर (महायोगा) समझते हैं, मगर मेर। अब भी यह नगर मौज ट है, सिख लोग उसे पवित्र माम हे देव बहादुर (पर्थात् पाकखलोका रक्षक)।". मानते हैं। तेगबहादुरके पन्तिम वाक्य पर तमाम मिख. बङ्गालमें एक उदासीनसे इन्होंने कुछ उपदेश ग्रहण . समाज उन्हें भतिको दृष्टिले देखने लगी और उन्हींको किया था। सम उपदेशके प्रभावमे ये पक्षाब पहुंचते हो सिख धर्म का रथल मानने लगी। थोड़े ही दिनों में एक डकैत बन गये। हाँसो पोर शतद्र, नदोके मध्यवर्ती उनके सैकड़ों शिष बन गये। पब तेगबहादुर पितासे समस्त भूभाग रनके उपद्रवोंमे तंग हो गया। बहुतसे भी अधिक प्रसिद्ध हो गये। गृहस्व घर छोड़ कर भगने लगे। इसो समय पादम पहले इन्होंने सोधियों के सदका विचार किया हाफिज नामक एक धर्म ध्वजो भी तेगबहादुरके माथ हो था, किन्तु मक्खनमारके कहनेसे शान्त हो गये ! अब ये लिया। मुगल बादशाहक पंजेसे बचने के लिए बहुतसे महा पाड़म्बरसे ममय विताने लगे। हजागे घुड़सवार भागे वा छुपे हुए व्यक्तियों ने भो इनका साथ दिया । रनको पाता पालने के लिए मयस्त्र तैयार रहते थे। धोरे भोरे तेगबहादुरका दल शस्त्रधा हो गया। बाद. शियोंके उपहारोंसे इनके पास यथेष्ट धम भो सञ्चित शाहने इनके दमनके लिए फौज भेजो। उसके साथ हो गया था, जिससे कर्तारपुरम इन्होंने एक सुदृढ़ इनका एक छोटा-मोटा युद्ध भी हो गया। पाविर लेग- दुर्ग बनवाया । वहां उनकी धर्मसभा संस्थापित बहादुर केद कर लिये गये। दिलो जानेसे पहले वे । रामराय अब तक कोई बहाना रहे थे। गोबिन्दको अपने पद पर अभिषित कर गये। भविंचने एकोने मौका जान दिनोखर पोरगजबको खबर दी कि ये गुरु गोविन्दसिंहनामसे प्रसिदइए हैं। तेगबहा-