पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/७४१

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तेजावणसिंह तत्रम ( लो) जयति नज्यतेऽनेन वा तिन-पसन। उसका नाम तेजाबालेज, सन्दौर समान दोलि, कान्ति, चक दम । २ प्रभाव, रोब दाब। साध रूप तयावसे उत्पब एमा। सो कारण तेजमें पराकाम, जोर, बस। ४ रेतस , शुक, वीर्य। ५ हज सोन गुण है, अब्द, स्वयं पौरपा (मापद.) कान्ति, शरीरको चमक दमक । ६ नवनीत, मक्खन, न्याय पोर वैशेषिक दर्शनक मत या दो प्रकारका लोनी। ७ वहि, अग्नि, भाग । ८ सुवर्ण, सोना । ८ -निब और अनित्य ! परमाणक्य नित्व है पोर कार्य- मना। १० पित्त । १९ पविक्षेप और अपमानाटि सप पनित्य । यह पनिस्य पर्थात् कार्यरूप तेज गरोर, पसहनरूपं नायकका गुणभेद। पर प्रयुगा पषिक्षेप इन्द्रिय पोर विषयक मेदसे तोन प्रकारका शरीर पोर पपमानादि प्राणनाश पोर सध नहीं करनेका तेज पादित्यलोकमें प्रति न्द्रिय स्मारक माम तेज। १२ मार रसादि शक्रान्तः धातुका तेज चक्षु है पौर विषयतेज चार प्रकारका -भीमः दिव्य, पदाथ। पोदर्य तथा पाकरज। भौम, पनि प्रभृति दिव्य गर्भोत्यत्तिक ममय तेजधात जब अधिकांश जल विद्यु दादि है, भुलद्रव्योंके परिपाकका कारण बौदयं धातुके माथ मिलता है. तब गर्भ गौरवण पोर जब , और उदरमें जो तेज, उससे मुखद्रव्य परि. पार्थिव धातुके माथ मिलतो है। तब वणवण हो जाता पक्ष हो कर शरीर पुष्ट होतो है। पाकरज सुवर्णादि है। पधिकांप पृथ्वो और प्राकाश धातु के माथ मिलने- है। इसका धर्म, रूप, द्रवस्व प्रत्यक्षयोगित्व है। इसका से जाणश्याम और अधिकांश जलोय तया पाकाश धातु- गुण-स्पर्श, संस्था, परिमाण, पृथक त्व, संयोग, के साथ मिलनसे गौरश्याम हो जाता है। तेजधातु अन्धा विभाग, परव, अपरत्व, रूप, द्रष्य, वेग, तेजका द्रवत पौर दृष्टिगति के माध जब नही मिन्नतो, तब जात बालक नैमित्तिक, किन्तु यह सासिदिक द्रव पदार्थ नहीं है, शोणितके माथ मिलने म रुचाक्ष, वित्त के साथ मिलनसे निमित्त के लिए ही द्रव्य एषा करता है। चतु पोतवर्ण, अपार्क माथ मिलनसे शुक्लाक्ष और वायु रूप, दर्शनेन्द्रिय, पाक, मन्ताप. तोता, वर्ग के साथ मिलनेमे विक्वताच होता है। (सुश्रुत शरीरस्थान) (गौरादि), भाजिणुता, अमर्ष, शौर्य और माहम ये सब १३ प्रागल्भ्य. माहस । १४ पराभिभव सामर्थ्य । तेज तेजके गुण पर्थात् तेजसे ये सब उत्पन होते । रहनेमे दूमरेको परास्त करने की सामर्थ्य रखती है। शरीरमें तेज पदार्थ मोसे प्राणी रूपवान् दर्शनेन्द्रिय- १५ शव का अभिभाव्यत्व वह गुण जिमसे शत्रु विजय सम्पत्र प्रभृति गुणविशिष्ठ होते है और उसीमे भुत नहीं प्राप्त कर सकता। १६ पप्रतिहसानत्व, वह पाचा द्रय भो भलो भांति परिपक्ष हो जाता है।२१ तेजसी जिसे उल्लंघन नहीं कर सकते। १७ चैतन्यात्मक उपचार के कारण तेजस मन्दसे तेजस्वोका बोध होता ज्योतिः । १८ सत्वगुणजाम लिङ्गदेश, सत्वगुणसे उत्पन ।(भारत अनुशा.) लिङ्ग शरीर । १८ अखका वेग, घोडको चलनेको तेजो तेजसिह-प्रसिह सिख-मेनापति। ये गौडबाणवश . घोड़ोंका स्वाभाविक स्फ रण (हिलाव) को तेज है। यह में सत्यब हर थे। इनका प्रक्षत नाम तेजराम और सेज दो प्रकारका है, मततोत्थित पोर भयोस्थित । घोडौं दमके पिताबा नाम निधिराम था। ये महाराज रणजित को चलाये बिना जो स्वाभाविक स्करण होता है, उसो मिस प्रियपास खुशालसिहके भतीजे थे। स्थान मा नाम सततोत्थित तेज है। चाबुकसे अथवा भय रणजितमि के यहां पारपालकका काम करते थे। दिखलानसे जो स्फुरण होता है, उसे भयोस्थित तेज खयामसि से पाला लिये बिना कोई भी रिपणित कहते है । ( भोजराज) सिंहसे मुलाकात नहीं कर सकता था। जब कभी कोई . २. पञ्चमहाभूतका वृतोय भूत, पांच महाभूतोमसे मचान्त व्यक्ति रणजितसिंहसे मुलाकात करना चाहते तीसग भूत । इसका स्वयं उष्ण, रूप शल पौर-भाखर है। थे, तब तथालमिको बहुत रुपये हाथ लगते थे। इस किसी वस्तु के स्पर्य करनेसे जो उष्णता मालम पड़ता प्रकाराबसिपोर और बहुत पनो हो गये और Vol. Ix. 183 .