पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/७४८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


७३६ तेवार तसिवा १६ और ५१५८पमें अवस्थित है। भूपरिमाण ८१६ सभी टोके बने हुए मन्दिर बरबाद हो गये. किन्तु वर्गमीन पर लोकम'च्या प्रायः १०५१५४ है। रममें प्रस्तनिर्मित मन्दिरमिसे अधिकांश मष्टो के नौदा गये एक शहर और ५०५ ग्राम लगते हैं। पवा पर्वत रमे दो हैं। यहाँ भगवान महावीरस्वामोके रहगो बनाया भागों में विभक्त करता है । टतोन्स नही तहमीन के मध्य हुमा एक अति प्राचीन जैनमन्दिर है, जिसे स्थानीय हो कर बनी है यहां को प्राय सोन लाख रुपयेमे लोग वोरुपका मन्दिर कहते है। पायः मभी मन्दिर अधिकको है। बगि कांके यन में बनाये गये है। · प्रवाद है, कि राजा २ पा सहमोलका एक शहर । यह प्रक्षा० २४५८ विक्रमादित्य दुस्मोके छाता पोखरमें मान करने के पहले 3. और देशा.८१४१ पु०के मध्य पथस्थित है। लोक- यहां पा कर तेल लगाते थे, रमोमे इस स्थानका नाम मच्या १५८३ के लगभग है। यहां एक स्कन और तेलकूपो या तेलकूपो पड़ गया है। एक चिकित्सालय है। तेलगू (हि.सो.) तैलंग देशको भाषा । तेरा -पालनपुरके शामनाधीन एक देशोग राज्य । एमके तेलङ्ग (मपु.) १ तेलङ्ग देश । २ तेलङ्ग देशके मनुथ। उत्तरमें दिवदर, पूर्व में कांकरेज, दक्षिणामें राधनपुर विलिंग देखो। पौर पश्चिम में भारत राज्य है। भूपरिमाण १२५ वर्ग मीन्न तेलवाई (हिं पु०) १ तेल लगाना. तेल मलना । २ और लोकमख्या लगभग हजार है। यहांको जमीन विवाहको एक प्रथा। इसमें वधु पक्षवाले जनवामे में . समतल है, मटीकाली और बाल -मियम है। वर्षभरमें वरपक्षवालों के लगाने के लिए तेल भेजते हैं। केवल एक फमल होती है। २० मे ५० हाथ नीचे धरती तेलसुर (हिं. पु.) चट्टग्राम और सिलहटके जिम्ली में सोने. खोदने पर जन्न मिलता है। वाला एक जगन्नी वृक्ष। यह बहुत ऊंचा होता है। ___ पहले या बधेला राजपूत लोग राज्य करते इमके होरकी लकड़ी कड़ो और सफेटो लिए पोलो होतो । १७१५१ में नवास कमालउद्दोनखाने इसे पधि है। रमको लकड़ी नाव बनानेके काममें पातो है। १. ार किया। उस ममय यह राज्य राधनपुरके नवाब तलछड़ा (हिं.पु.) मट्टोका बड़ा बरतन जिममें तेल शामनाधीन था। सिन्धु प्रदेशमे मुसलमानका एक दम रखा जाता है। पा कर नवाचके यहां घुउसवार में भो हो गया। सन. तेलहडो (हि.सी.) मटोका छोटा बरतन जिम में तेल मेंसे बलुमन्वा प्रधान थे । १८२२१ में पालनपुर के सुपरि रखा जाता है। एट डेण्टने बलुचखाँको यह स्थान प्रदान किया । तभोसे तेलहन (हि.पु.) वे बीज जिनसे तेल निकलता हो। सुचखाँके वंशधर गहां राज्य करते पा रहे है। तेला (हि. पु. ) तोम दिनरातका उपवास । तेल (हि.पु. ) तैल देखो। तेलिन (हि. स्त्रो०) १ तेलोको त्रो। २ एक बरसातो तेलकूपी--मानभूम जिलेको दामोदर नदी के किनारे पव- कोड़ा । यह कोड़ा जहां शरोरसे छू जाता है, वह काले स्थित एक ग्राम । यहाँ बहुत सुन्दर, सदृश्य और सुख- पड़ जाते हैं। हत् प्राचीन देवमन्दिर है। ये सब मन्दिर बाब बनाये तेलियर (जि. पु० ) काले रंगका एक पक्षो। गये है, उसका ठीक पता नहीं चलता। उक्त मन्दिरों में सारे शरीर पर सफेद बुदकियाँ या चित्तियाँ होती है। शिवमन्दिर हो अधिक है, इसके बाद विष्णुमन्दिर तेलिया ( हि वि० ) १ जो तेलको तर विकला और पोर तब सूर्य मन्दिर । तमें प्राचीन मन्दिर रहने पर भो चमकोला हो । (पु.) २ वह रंग जो काम, चिकना शिलालेख अधिक देखनमें नहीं पाते । केवल दो जगह और चमकोला हो । ३ सो रंगका .छोड़ा। ४ को दी पक्षर देखे जाते है और वे भी १०वीं शताब्दोके प्रकारका बबूल । ५ एक प्रकारको छोटो मछलो प्रतोत होते है। राजा मानसिंहने भी कईएक मन्दिर तेलिये रंगका कोई पदार्थ या जानवर। सौंगिया निर्माच किये थे। दामोदर नदोषी बाद यहां प्रायः नामक विष। . .

.