पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/७५

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करने के लिये पुरोहित बामणोंका भी प्रभाव नहीं था। जिस तरह वायावाड होता था, उसमें प्रति नितान्त दुष्कर्मों व्यक्ति भी अपने परिवारवर्गसे अपने वर्ष कितने लोग ठगों के बारा मारे जाते थे, इसकी कोई दुष्कर्माको छिपा रखता है, उनमेंमे किमीको भी अपनी शुमार नहीं। कोई कोई कहते हैं कि, प्रायः १०.०० सरह पसत्पधावलम्बी नहीं बनना चाहता। किन्तु पादमी प्रतिवर्ष ठगों के बारा मारे जाते थे। यह संख्या उगों में ठोक इससे उलटी रोति थो। ये लोग बचपनेसे अत्यन्त अधिक और भावनीय मासम पाने पर भी. ही लड़कोंको नरहत्याको शिक्षा देते थे। शरुपातमें जो प्रमाण मिल रहे हैं, उससे मत्व माल मोतो है। बालकगण चररूपमें धूमा करते थे। फिर उमको १७६८ में इस हत्याकाण्डका हाल बज गया पथिकोंकी लाश दिखाई जातो थो। वे ठगोंके साथ मण्टो कर्णगोचर हुमा । १८१५ में दोषावके निकलते थे और पथिकोंको भुलावा देने तथा अन्य नाना हानीके कूपों में ३० लाशें मिली थी। १८३० कामेिं उनकी महायता करते थे। अन्तमें जब ये योग्य में कप्तान श्रीमान्के प्रयाबसे गवर्मेण्टको माल म हो जाते, तब इनके हाथमें जीविकानिर्वाह के लिए एक- हुमा कि, भारतवर्ष का कोई भी स्थान गोंसे शून्य मात्र प्रवल बन फॉमी दी जाती थी। इस कार्यम दीक्षित नहीं है। इस वृषस पाचारका दमन करनेके लिए करनेके समय एक उत्सव होता था और दोक्षा-गुरु गवर्मेण्टने एक नया विभाग खोला। इस ठग निवारक- कालीको पूजा करके उमके कपाल पर दोक्षा-तिनक दे विभागके कर्मचारिगण अपराधियोंको प्रलोभन देकर कर उसको कानोको प्रमादो एक प्रकारका गुड खिला ठगीको खोज करके उनको पकड़ने लगे। क्या पग्रेजी देते थे। प्रवाद है-इम प्रमादी गुडको शक्ति अति राज्य और क्या देशोय गज्य, सर्वत्र इस बीभत्स उगोंक भीषण थी, एमके खानसे हो बह एक पका ठग हो हा प्रत्याचारको निवारण के लिए वापरिकर हो कर पंज. जाता था। गवर्मेण्टने वर्ष तक लगातार प्रयत्न किया था, जिस- ठग लोग इतनी चतुराई और निपुणताके माथ अपना में हैदराबाद, सागर पोर अबलपुर में प्रायः २००० ठग काम बनाते थे कि, कभी वे पकाई नहीं जाते थे। वे पकड़े गये थे और उनका न्याय हुआ था। इनमेसे विचारकों को प्रचुर उत्कोच देकर भाग जाया करते थे । १४६७ पादमी हत्या के अपराध पभियुक्त एए; जिसमें मध्यभारतके अनेक स्थानों में, विशेषतः पथिमभारतमें २८२ पादमियोंको प्राणदण्ड, ८०८को देशनिकाला, अधिकांश सर्दार राजकर्मचारीसे मिर्फ इनके उपद्रवमें ७७को पासोवन क रावाम, ६८२को निर्दिष्टकाल सक अपेक्षा करते थे, ऐसा नहीं, बल्कि उन्हें उनके चौर्य- कारावास पोर १को छुटकारा हुषा था तथा ११ लब्ध धनमेमे हिस्सा तक नियमितरूपसे मिलता था । बहुत भादमौ भाग गये थे, ३१ पादमो विचारकालमें हो मर मे तो प्रायका प्रमष्ट पन्या समझ कर अपने गज्यमें गये थे और बाकी २५० पादमियोंने राजाको तरफ पनकी रक्षा करते थे। इनके माथ एक शर्त गवाही दी थो।* फाँसोदार-ठगको फांसी ही होती रस्ती थी कि, ये उम प्रदेशके अन्दर मरहत्या न कर थी। उता दण्डितोमैसे किसी किसीने २०. सक नर. सकेंगे। इमलिये अन्य स्थानों में पर्थादि लाने पर कोई इस्या को थो, यह स्वीकार किया था। भो असन्तुष्ट नहीं होता था। जमोदार, महाजन, ठगों को न्यायोपार्जित वृत्तिहारा जोविकानिर्वाह दूकानदार, मोदी पादि सभी अर्थ लोभमे करनेको शिक्षा देनके लिए जबलपुरके मध्य जेलखाने में इनके पक्षपाती होते थे। ऐसी दशा ठगोंको एक कार्यालय स्थापित हुपा ; वहाँ पर ठगों के बच्चों पोर छाँट कर निकालना अत्यन्त कठिन कार्य था। युवकोको ऊन पोर सूतके व बुममे तथा तम्ब बनान- पत्याचारके डरसे कोई भी इनसे कुछ कहता नहीं था। , की शिक्षा पाने लगे। १८.१० भीतर भीतर उगी. इस प्रकार भारतवर्ष के विस्तोण भूभाग पर या वृशंस व्यवसाय बेखटक चल रहा था। पाखिरओ का पन्त हो गया, कहीं भी उनका नाम सनर्ममें न मासनमें या निवारिता । ..Asiatic Journal, 1886.