पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/७६०

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७४८ तेलंगापी एक सुन्दर घर बनवा दिया और खानपानेको को पहच गई। बलिङ्गस्वामीने भो प्रशान्त विससे उम व्यवस्था कर दो। तभोमे वैलिधर वह रह कर दूधको पो लिया। थाकोबाबाके उस स्थान पर माता हारा उपदिष्ट योगाभ्यास करने लगे। इस प्रकार पानसे हो नदीने दूधका रूप परित्याग कर स्वाभाविक वहां बोम वर्ष बीत गये। इस समय पश्चिमप्रदेशम पाकार धारण किया। यह पाचर्य घटना देखकर पतियाला राज्य बास्तुर ग्राममें भगीरथस्वामी नामक वे स्तम्ब हो रहे पौर उस रातको योगाभ्यासमें न जाकर एक सुप्रमिद योगी रहते थे। मयोगवश एक दिन पाश्रमको लौट पाए और वहाँ अन्यान्य महामानों में व लिङ्गके माथ उनकी भेंट हो गई और दोनों बहुत यह भूतपूर्व वृत्तान्त पाद्योपान्त कह सुनाया। इस देर तक वार्तालाप गोता रहा, पीछे कुछ दिन दोनों पर मय कोई स्वामोजीको माधारण क्षमता देख कर एक साथ रहे। अनन्तर भगीरथ स्वामी उन्हें अपने पहलेसे भक्ति और अदा करने लगे। पोछे स्वामोजी साथ पुष्करतोथ को ले गये। वहां बहुत दिन तक रह यहाँसे प्रयागधाम जा कर कुछ काल तक रहे और फिर कर लिङ्गधरने भगीरथस्वामोमे अच्छी तरह योग- वहाँसे काशोधामके प्रमो घाटमें पाकर तुम्नमीदामक शिक्षा प्राप्त को। इस प्रकार दोक्षित हो जाने पर भगो. उद्यान में गुप्तभावसे रहने लगे। म समम काशोधाम- रथस्वामो इन गणपतिस्वामो नाममे पुकारने लगे। में पान कल जमा असत् लोगो का वास नहीं था। अनन्तर ये दोनों जब अनक तोों को पर्यटन कर काशी. अधिकांश लोग धार्मिक और सात्विक स्वभावक थे। धाममें पहुचे. तब वहाक सभी लोग उन्हें लिङ्गः जब ये तुलमोदासक उद्यान में रहते थे, तब कभी कभी स्वामो कहने लगे। कुछ दिन बाद भगोरथस्वामीका लोला कुण्ड में जाया करते थे। अनेक उत्कट रोगो पुष्करतोथ में ही शरीरात हुआ। स्वामीजोके मरने रोगको यन्त्रणासे बैचैन हो कर स्वामीजीके शरण लेते पर विलिङ्गस्वामी भी तीर्थ -पर्यटनको पच्छासे वहांमे भोर स्वामीजी दयापरवग हो कर उन्हें दम रोगसे निकले । रमो प्रकार कुछ दिन घूमते फिरते ये सेतुबन्ध- आरोग्य कर देते थे। क्रमशः अनेक लोग पाकर उन्हें गमिखरा पहुचे जहां पहोंने महाराष्ट्र देशोय अन्धगव सा करने लगे। बाद वे यह स्थान छोड़ कर दशाख नामक एक ब्राह्मणको अपना शिष्य बनाया। कार्तिक मेधघाटमें रहने लगे। रमका तात्कालिक प्रमानुषिक मासको शुक्ला पश्चमामें बहुत समारोहके साथ एक मेला कार्य कलाप बहुत पाश्चय जनक था । वे कभो तो शीत- लगा जिसमें अनेक यात्री एक हुए थे। वलिङ्गस्वामीकालको दु:महशोतमें और कभी जलमें रहते थे । के स्वदेशवासो कई एक यानो भी यहाँ पाये हुए थे। फिर प्रोमकालको प्रचण्ड प्रोष उत्तामें जब साधारण उन्हो न लिङ्गास्वामोको घर चलने के लिए बहुत संग लोगोको बाहर निकलने का माहम नहीं होता, तब किया। इस पर वे यह स्थान छोड़ कर सुदामापुगेको अवलोलाक्रमसे दुःसह उत्तम बाल पर मो जाया करते चले गये । पोछ वाम भी नेपाल जा कर कुछ काल थे। ये भोख मांग कर नहीं खाते थे। जब कभो साथ तक योगाभ्यास करने लगे। यहां लोगों को संख्या पदार्थ सामने पा जाता था, तभो उसे खा लेते थे । इसमें अधिक देख कर तिब्बतको चले गये। फिर वासे किसी जाति वा पानापानका अथवा खाद्याखायका मानस-सरोवरमें जा कर इन्होंने दोघ काल तक योगा- विचार नहीं करते थे। वहां के लोग शिसो समय इन्हें भ्यास किया। पोछे या स्थान भी छोड़ कर नमैदा २०१२५ मेर खाद्य पदार्थ खिला देते थे। फिर थोड़ी देरके नदोके किनारे माकड य ऋषिके पाश्रममें रहने लगे बाद ही यदि कोई कुछ सानको दे देता तो उसे भो यहां इनका अनेक महात्मापासे भेंट तथा बातचीत वेखनिमे मुंह नहीं मोड़ते थे। पहले तो ये सभोसे 'ई। इस पाश्रमके थानोबाबा एक दिन यथासमय बार्तालाप किया करते थे, किन्तु यहाँ पा कर किसो. नदोके किनारे आ रहे थे कि इसो बोचाउन्होंने देखा से बोलत. तक न थे। जब शास्त्रका कोई दुर्बोध्य कि मदो दूधका रूप धारण कर समास्वामोको पास विषय पापड़ता था, तब स्वामोजी हो मध्यस बन