पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/७७१

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मेर सबाट ने जब उससे ग्वालियरका समाचार पूछा, तब कोही पोलिसांवत्सविधाम, भावारबिसने और उसने बहुत पभद्रतासे उत्तर दिया। इस पर वा सो सङ्गीतविद्या नका बड़ा मेम था। उनका प्रासाद समय दरबारसे निकास बाहर किया गया पोर सिकः पौर उनको बनाई संगोतावसो हो सका निदर्शन। दाने स्वयं म्वालियर के विश्व यात्रा को। मानमिने से गुजरी नामक मित्ररागियोके प्रतिष्ठाता थे। से यद, बाबर का भोर रायगणेश नामक तोन पन्नातक उहोंने अपनी गुजरीमषिो मगनयनाको कम करने व्यक्षियोको सम्बाट के साथ सौंप, अपने सड़केको उनके लिए समय सुरका नामकरण विभ। उनसे हो पास पहारके साथ भेजा। उसी समयसे युद्ध बन्द गुगैरागिणीको बासगुरो मझगुर्जरो, मानगुर्जरी हो गया, लेकिन १५.५ में सिकन्दरने पुन: ग्वालियर और विणणगुजगे ये चार विभाग कलित हुए। पर चढ़ाई कर दी। इस बार देशके ममुख भो उनके विमा इनके दो सौ महिषियों में मगनयना त वा प. हो गये। वे देशीय लोगों के चक्रातमें पड़ कर भूपसे वतो यो । राजकार्य में भी ये खब विलक्षचा पोजिसकी कासर को लौट पानिको वाध्य हुए । अन्तमें शव के भयमे तारीफ अबुलफजल कर गये । . .. उन्हें एक गुम्न स्थानमें छिपना पड़ा और वहांसे किमो रनके बाद इनके लड़के विक्रमादिस्यने बुधौम राज्य प्रकार भाग कर प्राण बचाया। उनको माग मा लाभ किया। उनके समय पजोम मायंबादिक. नष्ट हो गई। सिकन्दर जब ग्वालियर दुर्ग जोसनमें गढ़वा तोरण जला कर उस पर अधिकार कर बहा। हताश हो गये, सब दूसरे वर्ष उन्होंने ग्वालियर के अधीन यही ग्वालियरका पहला दार था। दूसरे और तोमर हिम्मतगढ़को हो जोत कर सम्मानरक्षा को। १५१७ तोरणमें धनघोर युद्ध एषा, पन्नमें वे भी मुसलमानों के ई० में ग्वालियरको तहस-नहस कर डालनेको पच्छासे हाथ लगे। लक्ष्मणपुर नामक चौधे तौर पर अधिकार • उन्होंने दूर दूर देशों के सामन्तगण निमन्त्रण किया। करते समय दिशीके एक प्रशन सेनापति तामनिजाम- इसी बीच सिकन्दरको मृत्यु हो गई। बाहिम लोदी का मृत्यु हो गई। जब पन्तिम तोरण हतियापुरं पर सम्राट हो कर उनके विद्रोही.भाई जलालखाको पात्रय अधिकार करने पाये, तब राजा विक्रामने अपमानित देने के अपराध मानर्मिरके प्रति बहुत कोधित हुए। तद तथा दुर्दशाग्रस्त होनेके भयसे पाममम किया। नुसार ३१ हजार पखारोडी पोर पो हाथो प्रजोम राजा पागरा लाये गये । यह सबाट नै उई शाममा- हुमायू नामक सेनापति के अधोन ग्वालियर के विरुद्ध बाद प्रदेश जागोर दिया। ग्वालियरका तोयर या भेजे गये। अन्यान्य स्थानों के पौर भो मांत सेनापति तोमरवंग इसी प्रकार ध्वंस हो गया। मुगलको साथ अजीम पवावलम्बन करनेमें नियुक्त हुए | इस युतमें पानीपतको लड़ाई में १५२१०को सोसिखोदीकी ग्वालियरका दुर्ग हाथ पा गया और युद्धके थोड़े दिनों तरफंसे लड़ते हुए राजा विक्रम मारे गये के बाद मानसिंह लोकसे चल बसे। राजा माम- बाबर पानीपतको लड़ाई में जयलाभ कर पाप तो. सिंह बहुत साहसी, वोरपुरुष थे, शव मित्र दोनों से दिलोके सम्राट बन बैठे और अपने पुत्र माय को ही तरह सम्मानित होते थे। कभो भो किसीके ग्वालियर भेज दिया। राजा विक्रामके वंशधरोंने उन्हें प्रति पहोंने अत्याचार न किया । नियामत उल्ला नामक बहुतसे होरा, मविमुक्ता उपहारमें दिये। इनमेले एक एक ऐतिहासिक उनको प्रशंसा कह गये है कि हिन्दू रा बहुत बड़ा था, जिसका बजन फेरिखाने निकल राने पर भी मुसलमानों के प्रति कभी बुरी निगाह न ३९४ रत्तो बतलाया है। वे भारम्किन पौर टावानियर डाली, बाहरसे तो हिन्दू-भाव टपकता था, पर भीतर इन दोनों होरको खानोंको 'कोहिनूर' कहकर वर्णन मुसलमानो-भाव खचाखच भरा था। उन्होंने ही कर गये। ये खाने' सम्राट पसारहीन खिलजी ग्वालियरको 'मोती भीख' बनवाई। तोमरगढ़ और पाईौं। . जिलवर जिला में जितनी भो भी राजा मानसिक १५२०ी अन्त में राजा मासराय ना तोमर.