पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/८६

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ठोस-गम ठोस (हि.वि.), त्रिसका मध्य भाग खाली न हो, जी! ठोका (हि.पु.) पानी जमा होनेवाला । विमान पोला या खोखला न हो। दृढ़, मजबूत। (पु.) ३. सी गठबा पानो दौरोदे जपर उसोच पर जमोन O डाह, कुढ़न। ! और ( पु.) खान, जगह, ठिकाना। २ पवसर. ठोमा (हि.पु.) अंगूठा । घास, दाव, मौका। इ-मस्कृत पौर हिन्दी वर्णमालाका तेरावा वाचनवर्ण पद्यको पादिम रसका विन्याम किया जाता है। और ट-वर्ग का तीसरा पक्षर । सके उच्चारणमें पाभ्य- "; शोभा हो विशोभा" (३१० १० टी०) तर प्रयत्न जिजामस्य हारा मूईसान म्पर्य और उ(स• पु०) उयत सहोयत भत्तानां दयाकाशे यः । वाद्यप्रयत्न सवार, माद, घोष एवं पम्पमाण लगता है। डी बाइलकात् ड । १ शिव, महादेव । २ शब्द, पावाज । माटकान्यासमें दक्षिणपादगुल्फमें न्यास होता है। वास, डर। ४ वाइवाग्नि (सी.) किनो। वर्णीहारतन्नम रसकी लेखनप्रणालो, म प्रकार लिखो उंक (हि.पु.) १ वह विषेला काँटा जो भिड, विच्छ, है-"। इस प्रक्षर लक्ष्मी, मरखती और भवानी मधुमक्खो पादि कोड़ोके पीछेमें रहता है। जब वे गुस्स ते मयंदा वाम करते । यह ब्रह्मरूप पौर महाशक्ति तो रमी कटिको जीवोंके शरोरमें चुभा देते हैं। मिड मात्रा कहा गया है। मधुमक्खी पादि उड़नेवाले कोड़े का काँटा नलोके रूप वर्णाभिधानतम्बमें इसके वाचक शब्द लिखे है। यथा- होता है। रमी हो कर विष को गांठसे विष निकन कर स्म,ति, दारुक, निन्दिपिणो, योगिनो, प्रिय, कौमारी, गार. चुमे हुए स्थानमें प्रवेश करता है। यह काँटा सिर्फ मादा त्रास, विषक, नदक, ध्वनि, दुरूह, जटिलो, भीमा, कोड़ोको होता है। २ निब. कलमको शोभा। ३ वह हिजिक, पृथिवी, सतो, कोरगिरि, चमा, कान्ति, नाभि, खाम जहां डंक मारा गया हो। लोचना कदार (हि.वि.)जिसके डंक हो. वाला। इसका स्वरूप-यह सदा विगुपयुक्ता, पश्च देवमय, उंका (हि.पु.) १ माँ या लोहे के बरतनों पर चमड़ा पञ्च प्राणमय, विशति एवं विविन्दुयुत, चतुर्धानमय, मढ़ कर बनाया था एक प्रकारका बाजा । पूर्व ममय भामतत्त्वयुक्त पोर पोतवियु सताकार है। (कामधेनुतन्त्र) यानडारके स्थानमें बजाया जाता था। २ वह नियन इसका ध्यान- घाट जहां जहाजपाकर ठहरता है। "जवासिन्दरसकामां रामकरी पराम् । किनी (हि.) डाकिनी देखो। त्रिनेत्रां वरदां नित्या परमीक्षप्रदायिनी ।। उको (हि. खो०) १ कुन्तीका एका पेंच। मलभकी एवं प्यास्या ब्रह्मरूपा तम्मा दशधा जपेत् ।" एक कसरत। (वर्णोद्धारतन्त्र) र (नि. पु.) एक पुराना बाजा। इसका वर्ण जवा पौर सिन्दरमहा। यह अभय- *ग (हिं० पु०) पधपका एमारा। प्रदायक, विनेन, वरदायक, निस्व और अमरूप है। उगम (हि.पू. ) एक पेड़का नाम । या दारनिसिक इसका ध्यान करके जप करनेसे साधक शीतकी भीष्ट पासपास तथा पसियाको पहाड़ियों में बहुम पाया जाता प्राहकार सकता। . सके पत्ते प्रति वर्ष गाईको मौसिममें जात