पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/९५

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जोधको लाहोरको मवाद भेजा गया। महाराज रण- सम्म से पपीन पारिनेके लिए भारत के गवर्नर-जन- जोत्मिहके परिवार शोकध्वनि हो उठो । दलीपसिंह रलको वाण होना पड़ा है। इसलिए गवर्नर-जनरल का सुख हमिशाके लिए डूब गया। डलहौसोने लाहोर प्रचार करते और सहारा घोषणा करत कि, दरवारकों कहलवा भेजा कि, सिख राजस्वका पन्तको पचाव-राजत्व हो गया, शिव महाराज दलीपसिंह बहादुर. गया। दलीपमिहकी सम्म उस समय सिर्फ ग्यार का पौनख समस्त प्रदेश पवी भारत-साम्राज्यके पन्त- वर्षको घो। दरबारके सदस्सीने डलहौसीके प्रस्ताव पर गॅसपा।" पजाब, सिड और सिखायुब देखो। कछपापत्ति नहीं की। दलीपसिहको बिना अपराध. चिलियनवाला-युपका संबाद ड पहुंचने पर के दल हुघा, यह डलहौसीको जतलाने पर भी कोई कम्पनीके प्रायः सभी कर्मचारी सर चास नेपियरको लाभ होता था या नहीं सन्देश था। कुछ भी हो, एक सेनापति बना कर भारत भेजने के लिए डिरकरोंसे पुनः मन्धिपत्र लिखा गया, जिस पर महाराज दलीपसिंहके पुनः पनुरोध करने लगे। डिरकरोंने राम होते हस्ताक्षर कराये गये (१० सन् १८१८)। इस सन्धिपत्र में हुए भी उनको नियुक्त किया। किन्त खोसो मेपि- निम्नलिखित ५ नियम लिखे थे- यरको क्षमताम बड़ी वर्षा रखते थे। भारत पा जाने पर (१) महाराज दलोपमिहने पचावका स्वत्व हमेशाके डलहौसी और नेपियर दोनोंम मनोविकार होने बगा; लिये परित्याग किया। . एक वर्ष के भीतर ही भीतर यह मनोमालिन्य अत्यन्त (२) राजसम्पत्ति हटिशगवर्मेण्ट के अधीन हुई। वामूल हो गया। पचाबमें इनका प्रकास विवादका (३) कोहिन र ग्लण्डकी रानीके मस्तक पर सूत्रपात हुधा। खाद्य पदार्थोके खरीदनमें पतिरिका सुशोभित हुआ। भत्ता लगनेके कारण डलहौसीने सिपाहियोका वेतन (8) गवर्नर-जनरल जो स्थान मनोनीत करेंगे, वहीं घटा दिया था। इससे पत्रावके सैनिकोंमें भावो विद्रोह दलोप रहेंगे। को सूचना हो रहो यो। इस पर चालस नेपियरने (५) 'महाराज दलीपमिबहादुर' यह नाम उन- गवर्नर-जनरल अथवा सुप्रिम कौन्सिलकी अनुमति विना का यावज्जोवन रहेगा. वे यथोचित मानके साथ व्यव. लिए गवर्म एके नियम बंद कर दिये। उलहौसी उस इत होंगे तथा ४ लाख से ज्यादा पौर ५ लाखसे कम समय समुद्रयावा कर रह थे। इसके बाद विद्रोहको रुपये उन्हें भत्ताके मिला करेंगे। भाशा देख नेपियरने ॥ संख्यक देवीय पदाति सैनिकों २८ मार्चको लार्ड डलहौसीने निनलिखित प्राशय को कर्मचुत कर दिया। उसोसीने पर नारास का एक घोषणापत्र प्रचारित किया- विषयमें पसअति प्रकट की किन्तु प्रथमोल विषयको __भारतगवर्मेण्टने पहले घोषणा की थी कि, गव- उन्होंने साजमें नहीं शेड़ा, इस विषय में मतामत प्रकट में एटको अब अधिक राज्य-विजयको इच्छा नहीं है करके सेकेटरोबारा सेना विभागके पडझटान जन- और पब तक उस प्रतिश्रुत वाक्यको रक्षा हुई थी। रलको नियमानुसार पत्र भी भेज दिया। यह पत्र तीन अब भी गवर्मेण्टको राज्य पधिकारको रछा नहीं है। तिरस्कारसे भरा पुषा था रस पत्र में निवालिक्षित भाव किन्तु अपनी निरापदता पौर जिनका भार उन पर प्रभिव्यक्त था, 'सेनापतिने जो पचावके कर्मचारियोंको उनको स्वार्थ रचा करनेके लिए. गवर्मेण्ट वाध्य है। इस पादेश दिया है, उससे मसि-समाधिष्ठित गवर्नर-जनरल सहंग्यसे तथा बिना कारण बुधविपासे राज्यको रक्षा अत्यन्त दु:खित पौर असन्तराए । भविष्य के लिए करनेके लिए जिन लोगोंका उनके अधिपति शासन नहीं उनको सूचित किया जाता कि भारतके सैनिकी कर सकत, किसी प्रकारका दणी जिनको उत्पीड़नसे भत्ता वा वेतनके परिवतंनी विषयमें केसो भी अवस्था विरत वा भीत नहीं कर सकता और किसी प्रकारको बानहो-यदि वे कोई प्रादेय दें, तो गवर्नर-जन- भी मिलता जिनको शान्तिसे नहीं रख सकती, उनको रत कभी भी उस पर सच्चतिनही । बम विषयने