पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/१००

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फिरिशता-फिरोज तद्देशवासो हिन्दू-मुसलमान आदिके आचार व्यवहारका से ये बीजापुरराज इब्राहिम आदिलशाहके निकट परिचित अनुकरण करने लग गये हैं। इनका विवाह घटकको हुए। १५९२ ई०में अहमदनगरके युद्ध में इन्होंने बीजापुर तरह तृतीय व्यक्ति द्वारा निष्पन्न होता है। ये लोग की ओरसे सैन्य चालना की थी। उस साधारणतः स्त्रीके प्रति निष्ठुर व्यवहार करते हैं। युद्ध में ये जामल खाँसे आहत और वन्दी हुए। २ दक्षिण भारतमें पुत्तगीजोंका प्रचलित शास्त्रविशेष। अखिर बीजापुर भाग कर उन्होंने आत्मरक्षा की। इसके फिरिश्ता ( फा० पु. ) देवदूत । बाद इब्राहिम शाहने इन्हें एक इतिहास लिखनेका अनु- फिरिशता--विख्यात मुसलमान ऐतिहासिक । इनका पूरा रोध किया और अन्यान्य लेखकोंकी तरह उन्हें भी माम था महम्मद कासिम हिन्दूशाह । फिरिशता इनकी आरोपित अंश बाद दे कर प्रकृत घटनाका अवलम्बन उपाधि थी और इसी नामसे ये तमाम परिचित हैं। करनेका हुकुम मिला। १५६४ ईमें ये बेगम सुलतानके इनके पहले और कोई भी मुसलमान ऐसे विशदभावमें विवाहमें उपस्थित थे और उन्हें साथ ले कर सुलताना इतिहास सङ्कलन करने में समर्थ नहीं हुए हैं। बुर्हानपुर अपने स्वामोके घर आई। १५९६ ई०में कास्पियन सागरतीरवती अष्ट्रावाद नगरमें इनका जन्म उनका बीजापुर-राजइतिहास समाप्त हुआ । १६०५ ई० में हुआ। इनके पिता गुलाम अली हिन्दूशाह एक विशेष सम्राट अकबर शाहकी मृत्यु पर शोक प्रकाश करने और शिक्षित व्यक्ति थे। किसी कारणसे वे अपने पुत्रको सान्त्वना देनेके लिये वीजापुरराजने उन्हें दिल्ली भेजा। साथ ले जन्मभूमिका परित्याग कर भारतवर्ष आये। १:०६ ई०को लाहोरमें जहाडीरके साथ इनकी भेट यहां अहमदनगरके अधिपति मुर्ताजाने इन पर बड़ी कृपा हुई। लौटते समय ये बदकशान, रोहतस आदि स्थानों में दरसाई और इन्हें अपने पुत्र मीरन हुसेनको पारसी परिभ्रमण कर अपने इतिहासके उपकरण संग्रह कर भाषा सिखाने के लिये नियुक्त किया। किन्तु उस राज- लाये। उनकी मृत्यु कब हुई, ठीक ठोक मालूम नहीं। प्रसादका वे अधिक दिन भोग करने न पाये । अकाल ही पहले उन्होंने उस पुस्तकका गुल-शन-इ-इब्राहिमी वा घे कराल कालके गालमें पतित हुए। नौरसनामा मामसे प्रचार किया। जनसाधारणके फिरिशता अनाथ हो गये सही, पर स्वयं मुर्ताजा निकट वह ग्रन्थ तारिख-इ-इब्राहिमी वा तारिख-इ-फिरिस्ता निजाम उनके प्रतिपालक हुए । निजाम गुलामक सद्गण नामसे मशहूर है। पुस्तककी उपक्रमणिकामे उन्होंने भूले नहीं थे। उन्होंने एक दिन फिरिश्ताको राजसभा- : हिन्दू और भारतमें मुसलमान आगमन लिपिवद्ध किया है। में बुलाया और अति विश्वस्त ( गुप्त ) मन्त्रिपद पर पीलेपयक्रमसे लाहोर गजनी दिली और दाक्षिणात्यके नियुक्त किया। इसके बाद फिरिश्ता राजरक्षी सेनापति- मुसलमानराजवंश (कुलवर्गा, बीजापुर, अहमदनगर, तैलङ्ग- दलके अधिनायक हो गये । इस समय पूर्व राजाके अमात्य- बेराहर, विदार ) गुजरात, मूलतान, मालव, खान्देश, वर्ग विद्रोहियों के हाथसे मारे गये, एक मात्र फिरि- बङ्गाल और बिहार, सिन्धु और काश्मीर राजवंशका श्ताने ही युवराज मीरन हुसेनकी आडमें अपनी प्राण- इतिहास प्रकाशित किया तथा शेष दो खण्डों में उन्होंने रक्षा की। पिताको राज्यच्युत करके मीरन स्वयं गद्दी। मलवार और भारतीय साधुओंकी जीवनी लिखी है। उप- पर बैठे, पर वे अधिक दिन तक राज्यभोग न कर सके। संहार भागमें भारतवर्षका प्राकृतिक और भौगोलिक १५८८ ई०के राष्ट्रविप्लवमें घे भी निष्ठुरभावसे निहत हुए। विवरण लिपिवद्ध किया गया है। इस समय यहां सुन्नियोंकी तूती बोलती थी। फिरिश्ता फिरिहरा (हि.पु.) एक प्रकारका पक्षी। इसकी छाती सिया थे, इस कारण उन्नतिकी कोई आशा न देख वे लाल और पीठ काले रंगको होती है। धीजापुरकी ओर अग्रसर हुए। फिरिहरी (हिं. स्त्रो०) वच्चोंका एक हिलौना जिसे १५८६ ई० में वीजापुर पहुचने पर राजमन्त्री दिला- फिरकी भी कहते हैं। पर खा'ने उनका यथेष्ट आदर किया और उन्हीं के अनुग्रह फिरोज --आगरा-वासी एक विण्यात सुफो पण्डित । इन्होंने