पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/११२

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१०४ फुहारा कुछ ऐसे पत्थर ( pervious) हैं जिसमेंसे जल जाता है, तब उसे भेद कर वह प्रचण्ड वेगसे प्रपाताकारमें निकल सकता है । बालुकामय मट्टीमें भी इस प्रकार जल : पतित होता है ।(२) निगम हुआ करता है, किन्तु कड़ी मट्टी हो कर जल नहीं पर्वत वा पार्वत्यभूमिसे ही अधिक प्रस्त्रवण निकलते जासकता (impervious)। देवे जाते हैं। कारण, वहांका जल बहुत ऊपरसे सछिद्र भुपृष्ठ वा पर्वत पर वृष्टि पडनेसे कुछ जल पथ हो कर नीचे आता है, जहां उसका अधिक भाग ' तो ढालवें भागसे गिर कर नदोमें मिल जाता है और कठिन स्तरों पर ही ( Impervious Stratum जमा कुछ मट्टीमें प्रवेश करता है । जो जल मट्टीमें प्रवेश करता . हो जाता है । वद्द जल वहां अधिक देर तक नहीं ठहरता, है, वह जमीनके भीतर छेददार स्तरों ( Pervious बहुत जल्द दूसरो राहसे निकल जाता है। कूपखननकाल- Strata )से प्रवाहित हो कर एक जगह जा जमा होता में हम लोग कृपमें जलसञ्चय देखते हैं । यह जल कहांसे है। पीछे उस स्थानके भर जानेसे वह जल दूसरी गहसे आया, स्वयं समझ सकते हैं। निकलनेकी कोशिश करता है । क्रमशः सछिद्र मृत्तिका. प्रवणका जल स्वभावतः ही सुस्वादु और बल- स्तरसे होता हुआ जब वह कठिन स्तरमें पहुचता कारक है । भूगर्भस्थ धातवपदार्थ ( Minerals ) मिले है तब फिरसे जलके समतारक्षणके लिये दूसरी रहनेके कारण उसका औषधको तरह पानीयरूपमें व्यव- ओर उठाता है। इस प्रकार उठते समय यदि हार होता है। धातुदौर्बल्यादि रोगोंमें यह विशेष स्वास्थ्य- उसे किसी पर्वत, उपत्यका वा निम्नभूमिमें छिद्र मिल प्रद है। इस कारण चिकित्सकगण मस्तिष्क, जाय, तो वह उसी मुखसे निकलना शुरू करता है। पर्वत- हृदय और औदरिक रोगग्रस्त व्यक्तिमात्रको ही स्वास्थ्य- की चूड़ा पर सञ्चित जलराशि क्रमशः नीचेको ओर परिवत्त नके लिये पार्वतीय प्रदेशमें जानेकी सलाह देते उतर कर निकामके गस्तेमे बह जाता है और वह जल हैं। जिन सब प्रदेशोंका प्रस्रवण वा नदी प्रवाहित जल धाराकारमें उत्थित हो कर पूर्वसञ्चित जलराशिकी धातवयोगसे बलकर है, वही सव स्थान स्वास्थ्यप्रद माने समता रक्षणमें समर्थ होता है। कभी वह निर्भरकी तरह गये हैं। उष्ण प्रस्रवण जलमें स्नान सर्वतोभावमें पर्वत परसे झर झर करके नीचे गिरता है। इस प्राकृ- विधेय है। कटेसियस (Ktesius ) ने लिखा तिक जलोद्गमको प्रस्रवण (Spring+ ) कहते हैं। है, कि इथिओपिया राज्यमें एक प्रस्रवणसे लाल प्रस्रवण साधारणतः दो प्रकारका है शीतल जलवाही जल निकलता था जिसे पीनेसे ही मनुष्य उन्मादप्रस्त प्रवण और उष्ण प्रस्रवण। जिन सब प्रस्रवणोंसे उष्ण हो जाते थे। प्लिनिके इतिहासमें हम लोग आर्मेनिया- जल निकलता है, उसे ही उष्ण प्रस्रवण कहते हैं ।(१) भूगर्भ- देशके एक प्रस्रवणका उल्लेख पाते हैं। उस प्रस्रवणमें मध्यस्थ जलनाली (sub-terranian Channels) होकर जो मछली रहती है उसे खानेसे तत्क्षणात् मृत्यु हो प्रवाहित जलराशि प्रस्रवणाकारमें प्रकाशित हो कर नदी जाती है। आदिके उत्पत्ति-स्थानमें परिणत हुआ है। जिन सब प्रस- स्वभावजात प्रस्रवणको जलगति देख कर विज्ञान- वोंसे नदी, हृद वा नदीशाखा आदिको उत्पत्ति होती विदोंने कृत्रिम उपायसे फुहारे ( Fountain )-का आवि- है उनका जल कही बुद बुदमें बाहर होता है। पीछे वह कार किया है। जलमें एक ऐसा स्वभावसिद्ध गुण है, एक स्थानमें सञ्चित हो कर क्रमशः नीचेकी आर वह : कि उसका ऊपरी तल हमेशा समतारक्षणशील रहता जाता है। राहमें वह जल जब किसी पर्वतखण्डसे रुक है। एक 'इउ' की तरह बक्राकृतिवाले नल ( Utube )-

के एक मुख हो कर जल ढालनेसे वह स्वभावतः ही

(१) मुगेरका सीताकुण्ड और राजगृहके सप्तर्षि, सूर्य, गणेश आदि कुण्ड उष्ण प्रस्रवणके निदर्षन है। (२) गगोत्तरी, गोमुखी, नाएगरा आदि प्रपातोंकी इसी प्रकार उत्पत्ति हुई है।