पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/११८

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फेफड़ा-फेरना दहिने और बाएं फेफडे कहलाते हैं। दहिना फेफड़ा। उसे श्वास और जो बाहर निकाली जाती है उसे प्रश्वास बाएँ फेफड़े मे चौड़ा और भारी होता है। फेफड़े की कहते हैं। जो वायु भीतर खींची जाती है उसमें कार आकृति वीचसे फटी हुई नारंगीकी फांक-सो होती है। बन, जलवाष्प और हानिकारक पदार्थ बहुत कम जिसका नुकीला शीर्ष भाग ऊपरकी ओर होता है। मात्रामें होते हैं, तथा आक्सिजन गैस जो प्राणियों के लिये फेफड़ाका निचला चौड़ा भाग उदराशयको वक्षाशयसे आवश्यक है अधिक मात्रामें होती है। परन्तु प्रश्वासमें अलग करनेवाले परदे पर रखा रहता है। दहिने कारवन या अङ्गारक वायु अधिक और आक्सिजन कम फेफड़े में दो दरारें होती हैं। इन दरारों के कारण वह रहती है। शरीरके मध्य जो अनेक रासायनिक क्रियाएँ तीन भागों में विभक्त दिखाई पड़ता है। बाएं फेफडे- होती रहती हैं उनके कारण जहरीली कारबन गैस बनती में एक ही दरार होती है जिससे वह दो ही भागों में रहती है। इस गैसके सबबसे रक्तमें कुछ कालापन ओ बटा दिखाई देता है। फेफड चिकने और चमकीले जाता है। यह काला रक्त शरीरके सब भागोंसे जमा हो होते हैं और उन पर कुछ चित्तियां-सी पड़ी रहती हैं । कर दो महाशिराओंके द्वारा हृदयके दक्षिण कोष्ठमें पहुँ. युवावस्थामें मनुष्यके फेफडे का रंग कुछ नीलापन लिये चता है। हृदयसे यह दूषित रक्त फिर फुफ्फुसीय धमनी भूरा होता है। गर्भस्थ शिशुके फेफड़े का रंग गहरा द्वारा दोनों फेफडोंमें आ जाता है। यहां रक्तकी बहुतसी- लाल होता है। जो जन्मके उपरान्त गुलाबी रहता है। कारवन गैस बाहर निकल जाती है और उसके स्थानमें दोनों फेफडोंका वजन सेर सवा सेरके लगभग होता है। आक्सिजन आ जाता है, इस प्रकार फेफड़ों में जा कर स्वस्थ मनुष्यके फेफड़े वायुसे भरे रहनेके कारण जलसे : रक्त शुद्ध हो जाता है। हलके होते हैं और जलमें नहीं डूबते। परन्तु जिन्हें फेफड़ी ( हि० स्त्री०) गरमी या खुश्कीसे ओठोंके ऊपर न्यूमोनिया, क्षय आदि रोग होते हैं उनके फेफड़े का चमड़े को सूखी तह, प्यास या गरमीसे सूखे हुए ओठ- रुग्ण भाग ठोस हो जाता है और जलमें डालनेसे डूव का चमड़ा। जाता है। गर्भ के अभ्यन्तर शिशु श्वास नहीं लेता, इस फेफरी ( हिं० स्त्री० ) फेफडी देहो। कारण उसका फेफड़ा जलमें डूब जायगा। परन्तु जो फेर (सं० पु० ) के इति शब्द राति गृहातीति रा-ग्रहणे शिशु उत्पन्न हो कर कुछ भी जीवित रहा है, उसका क। शृगाल, गीदड़। फेफड़ा जलमें नहीं डूबता। प्राणी श्वास द्वारा जो वायु फेर (हिं पु०) १ चक्कर, घुमाव। २ परिवर्तन, उलट खींचते हैं वह श्वास नाल द्वारा फेफड़े में पहुँचती है। पुलट। ३ मोड़, झुकाव। ४ असमंजस, उलझन । ४ इस टेंटुवेके नीचे थोड़ी दूर जा कर श्वासनालके इधर भ्रम, संशय । ६ षट्चक्र, चालबाजी। ७ वल, अन्तर । उधर दो कनखे फूटे रहते हैं जिन्हें दहनी और बाई ८ प्रपंच, जंजाल। ६ हानि, टोटा । १० भूत प्रेतका वायुप्रणालियां कहते हैं। फेफड़े के भीतर प्रवेश करते प्रभाव । ११ युक्ति, उपाय । अदला बदला, एवज़ । ही ये वायुप्रणालियाँ उत्तरोत्तर बहुत-सी शाखाओंमें बँट : फेरण्ड ( स० पु०) फे इत्यव्यक्त शब्देन रण्डतीति रण्ड- जाती हैं। फेफड़े में जाने के पहले वायुप्रणाली लचीली अच । शृगाल, गीदड। हड्डीके छल्लोंके रूपमें रहती है, पर भोतर जा कर ज्यों फेरना (हिं० कि० ) १ भिन्न दिशामें प्रवृत्त करना, गति ज्यों शाखाओंमें विभक्त होती जाती हैं त्यों त्यों शाखाएँ बदलना।२ मण्डलाकार गति होना, चक्कर देना। पतली और सूतके रूपमें होती जाती हैं। यहां तक, कि: लौटना, वापस करना। ४ ऐंठना, मरोड ना । ५ यहांसे ये शाखाए फेफड़े के सब भागोंमें जालके सदृश फैली वहां तक स्पर्श कराना, किसी वस्तु पर धोरेसे रख कर रहती हैं। इन्हींसे श्वास द्वारा आकर्षित वायु फेफड़े- इधर उधर ले जाना। ६ पीछे चलाना, जिधरसे माता के सब भागोंमें पहुंचती है। फेफड़े के बहुतसे छोटे छोटे हो, उसी ओर भेजना या चलाना। ७ जिसके पाससे विभाग होते हैं। जो वायु नासिका द्वारा भीतर जाती आया हो उसीके पास पुनः भेजना। ८ घोड़े आदिको