पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/१४३

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बकरीद-बकवादी १३७ पितृ पुरुषोंको प्रसन्न करनेके लिये भोज्य व्यका उत्सर्ग : तैयार कर सबको देते हैं । अवस्थाके अनुकूल कोई और कुरान पाठ होता है। इस दिन कोई कोई उपवास अपने कुटुम्ब, बधुबांधबके पास मर्यादाके अनुसार एक करते हैं। दश दिन सुवहको वे लोग ममजिदमें दो या उससे ज्यादा हताशिष्ट बकरेको भेज देते अथवा नमाज पढ़ने जाते हैं। इस समय वे तकधीका पाठ करते कोई कोई असमर्थ होनेके कारण मरे हुए जीवका अगला करते जाते हैं ।(१) इन दिनों में प्रतिदिन धनी अथवा गृहस्थ वा पिछला भाग वा थोड़ा मांस उनके पास भेजते हैं। खुदाके नाम पर बकरेकी कुर्बानी करते हैं (२) अथवा हतजीव तीन भागोंमें बांटा जाता है। पहला भाग जो असमर्थ हैं वे स्त्री पुरुष बालक आदि सात जन मिल अधिकारीके लिये, दूसरा भाग अपने और दरिद्रों के लिये, कर एक गाय अथवा ऊटकी कर्वानो कर मक्त हैं। अवशिष्ट तीमरा भाग कुटुम्बियों के लिये रखा जाता है। कुरानमें लिखा है, कि जो खुदाके नाम पर पशुको कुर्वानी मुसलमानोंका ईद-उल-फतेर और ईद उल-जोद्दा नामक कर खुदाको संतुष्ट करता है, खुदा भी उस पशुको पा ईदका उत्सव ही प्रधान समझा जाता है । इस ममय कर अवलीलाक्रमम्मे उसे पुल-मिरात्मे पार कर ममजिदमें ज्ञानी और मूर्ख सभी एक साथ इकट्ठे होते हैं। देत हैं । ३) सुवे वगन्, आग्वरिचर, सुस्वा आदि इसके नामान्तर हैं। ___ नववे दिनसे ले कर प्रत्येक फजर नमाजमें और उस बकरिपु ( हिं० पु. ) भीमसेनका एक पुत्र । दिनकी उसर नमाज तक वे लोग एक बार करके तकवी- बकल ( हिं० पु० ) वकला देखो। इ-तुषरीककी आवत्ति करते हैं। नमाजके बाद वे लोग बकलस ( पु० ) एक प्रकारको चौकोर या लंबोतरी कवाब और रोटी बनाते हैं। पवित्र इब्राहीम और विलायती अंकुसी या चौकोर छल्ला। इसे किसी इस्माइलके नाम पर गृहस्थ लोग हर एकके लिये फतिहा: बधनके दो छोगेंको मिलाए रखने या क्रमनेके काममें पाठ करते हैं। पीछे कुछ आदमियोंको खिला' लाते हैं। यह लोहे, पीतल या जर्मन सिलभर आदिका कर तब आप भोजन करते हैं। कोई कोई खतवा पर्यन्त बनता है। इसे विलायती विस्तग्वद या वेष्टकोट आदि उपवासी रहते हैं। फ़तिहा पाठके बाद पावरोटी खाते के पिछले भाग अथवा पतलूनकी गेलिस आदिमे लगाने हैं। इस दिन बहुतसे मुसलमान सुमिष्ट ध्यानादि हैं। कहीं कहीं यह केवट शोभाके लिये भी लगाया जाता है। (१) राजा, राजपुत्र, नवाब आदि सभी धनी पति मही- बकला (हि.पु० ) १ पेड़की छाल। २ फलके ऊपरका समारोहसे तकवीका पाठ करते जाते हैं। ईद-इ-मजान का छिलका। ईद-उल फतेके उत्सव में भी इसी प्रकार तकवी की पाठविधि बकली ( हि . स्त्री०) १ एक प्रकारका लम्बा और सुन्दर प्रचलित है। वृक्ष । इसकी लकड़ी चमकीली और बहुत मजबूत होती है। (२) वाहिमने खुद को प्रसन्न करने के लिये अपने पुत्र यह वृक्ष वीजोंसे उगता है। इसकी लकड़ीसे आरायशो और खेतीके सामान बनाए जाते हैं तथा इसके लट्टे इस माइल की बलि देने का विचार किया था, परन्तु आर्चऊजल रेलकी सडक पर पटरीके नीचे बिछाये जाते हैं। इसका प्रेविलने उम पुत्र की जान बचाने के लिये उसके बदलेम छाग- कोयला भी अच्छा होता है और पत्तियां चमडा सिझानेके बलि दी। मुसलमान लोग: सी घटनाका स्मरण करके इस : काममें आती हैं। पेडसे एक प्रकारका गोंद निकलता महाभोजका आयोजन करते हैं । है जो कपड़े छापनेके काममें आता है। २ फल आदिका (३) मुसलमानों का विश्वास है, कि स्वर्ग जानेम पहले पतला छिलका। पुल-सिरात पार करना पड़ता है । मुखमय स्वग और नरक-बकवती (हि. स्त्री० ) एक नदीका प्राचीन नाम । मय मत्य के बीच में अनन्त अग्नि विद्यमान है। उस पुल बकवाद (हिंस्त्री० ) सारहोन वार्ता, ध्यर्थकी बात । सिरातके तुगण मानवको अग्निके मध्य हो कर स्वर्ग में ले । बकवादो ( हि वि० ) बकवाद करनेवाला, बकबक करनेवाला। Vol. xv. 85