पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/१४५

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बकुचौहाँ - बकुल बकुचौही (हिं० वि० १ बकुचेकी भांति, बकुचेके समान । मजबूत और चर्वणशक्ति बढ़ जाती है। दांत अथवा दाढ़में बकुर (सं० पु.) भास्करः वा भयङ्करः पृषोदरादित्वान् किमी प्रकारका घाव होने पर इसको छालके काढ़े की साधुः। १ भास्कर, सूर्य। २ तुरही । ३ बिजली। कुल्ली करनेमे घाव जाता रहता है। मूत्रनाली अथवा (त्रि०) ४ भयङ्कर, डरावना। गुदासे आम झरने पर काढ़ के सेवनसे उपकार होता बकुरना ( हिं॰ स्त्री०) बकरना देखो। है। यह एक ज्वर हरनेवाली औषधिमें गिना जाता बकुराना (हिं क्रि०) स्वीकार कराना, मंजूर कगना। है। कोंकणप्रदेशमें यह घावोंके धोनेके काममें आता बकुल (स पु०) बङ्कते इति वकि कौटिल्ये (सद् गुरोदयश्च । है। यह बैलके "आऊआ" रोग होनेपर उसको इसके उण ११४२) उरच, प्रत्ययरेफस्य लत्वं बणलोपश्च। सूखे फूलोंका चूर्ण सुधा देनेसे रोग दूर हो जाता है। स्वनामख्यात पुष्पवृक्ष, मौलसिरी। ( Mimusops आऊआ रोगमें अधिक ज्वर एव शिर, पैर, स्कन्धभाग Elengi) पर्याय ---केसर, केशर, बकुल, सिंहकेसर, बकुल, और समस्त शरीरमें थेदना होती है। इसको सूधनेसे घरलब्ध, सीधुगंध, मुकुल, मुकूल, स्त्रीमुखमधु, दोहल, नासिकाके द्वारा कफ निकलने लगता है। बादमें बेदना मधुपुष्प, सुरभि, भ्रमरानंद, स्थिरकुसुम, शार्गदक, कुछ कम हो जाती है। पंजाबमें स्त्रियोंको पुलोत्पादिका करक, सीसंज्ञ, विशारद, गूढपंचक, धन्वी, मदन, मदामोद, शनि पैदा करनेके लिये इसकी छालका सेवन कराते हैं। चिरपुष्प । गुण- -शीतल, हृद्य, विपदोपनाशक, कणाड़ामें बकुलके फूलोंसे निकाला जल उत्तेजक और मधुर, कषाय, मदाढ्य और हर्षदायक। इसके फूलोंका पानीके काममें आता है। पुराना घी और इसके वोजके गुण-रुचिकर, क्षीराढ्य, सुरभि, शीतल, मधुर, स्निग्ध, गूदेके चूर्णको अच्छी तरहसे पीसे। पीछे उसकी गोली कषाय और मलसंग्रहकारक। (गजनि० ) इसके फल- बना कर थोड़ी अवस्थाके बालक और बालिकाके गुह्य- का गुण----मधुर, ग्राहक, दन्तस्थैर्यकर। ( भावप्र०) स्थानमें रख देनेसे वायु निकलने लगती है एवं १५ मिनट इसके फूलोंकी सुगंध बहुत मीठी और अधिक अच्छी बाद कठिन मल भी बाहर निकल आता है। बहुत दिनके होती है । अनेक लोग सुगधि लेनेके लिये इसके फलों- आमाशयमें पके फलके खानेसे उपकार होता है। बांट की माला गूथ कर गलेमें पहनते हैं। यह वृहदाकार कर माथे पर लेप देनेसे शिरपोड़ा दूर हो जाती है। वृक्ष भारतमें सब जगह उत्पन्न होता है। दक्षिण और गर्मी में इस पर फूल आते हैं। उस समय उसके मलयप्रायोद्वीपमें इसका वन देखा जाता है। कहीं कहीं चारों तरफ सुगध ही सुगध मालूम होने लगती है। आसनके साथ बकुलको छाल मिला कर उससे चमड़ा किन्तु फूल अधिक समय तक पेड़ पर नहीं रहते। परिष्कार किया जाता है। बकुल छालम सैकड़े पीछे वर्षाकी तरह एकके वाद एक निरन्तर झड़ते रहते हैं एवं ४ भाग टेनिक एसिड रहता है, इसका काथ कुछ टयाई उसके साथ साथ फूलोंके डंठलमें फल लगने लगते हैं। लिये सफेद होता है। इसके रसमें कुछ लाल रंग रहता ये फल पक जाने पर पीले दिखाई देते हैं। पके फल खाने में है जिससे रेशम और सतीके कपड़े रंगाये जाते हैं। बहुत अच्छे होते हैं। इसके फूलोको माला देवपूजाके वृक्षको छालमेंसे जो दूध निकलता है वह भी कई काममें आती है। आम तौरसे इसकी माला भादरपूर्वक कार्मी में आता है। फूलोंमें तैल होता है जो सहज- सभी लोग गलेमें पहनते हैं । इसके फूलोंसे इतर तैयार में निकला जाता है। इसीलिये इन फूलोंको चुआ कर किया जाता है और लकड़ियां भरोले दरवाजे आदि गुलाब जलकी तरह सुगध जल निकालते हैं। बनानेमें विशेष उपयोगी हैं। बकुलके बोजोंका तेल जलानेमें, औषधियोंगे और चित्र- इसकी उत्पत्तिके सबध वामन पुराणके ६ अध्याय- कारियों के रंगको गीला करनेमें काम आता है। में इस प्रकार लिखा है। एक दिन कामदेवने अपने सामने चक्रदत्तने लिखा है-कच्चे फलका गुण धारक है। महादेवजीको विचरण करते देख अपना सम्मोहन पुष्प- दातोंके कमजोर होने पर इसका सेवन करनेसे दांत वाण छोड़ना चाहा। इसी समय क्रोधसे लाल भाछे