पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/१६०

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बड़रा-बड़वानल बज्रधर राउत १५६० से १५८४ ई० रखना, कहीं भी जाने न देना।" ब्रह्माके इतना चन्द्रशेखर मङ्गराज १५८४ , १६१७ , कहने पर समुद्रने इच्छा नहीं रहते हुए भी इसे स्वीकार नारायण मगराज १६१७, १६३५ , कर लिया। इसके बाद बड़वामुन अग्नि समुद्र में कृष्णचन्द्र मगराज १६३५ , १६५० , प्रवेश कर ज्वाला समूहसे प्रदीप्त हो समुद के जलको गोपीनाथ मङ्गराज १६५०, १६७६ , दग्ध करने लगी। बलभद्र मगराज १६७६ , २७११. बड वाकृत ( स० पु०) बड.वया दास्या कृतः । पन्दह फकीर मङ्गराज प्रकारके दासोंमेंसे एक दास । १७४३ , १७११ , "भक्तदासश्च विशे यस्तथैव बड वाकृतः।" सानुधर मगराजमहापान १९४३ , १७१८, (नारद ) पद्मनाभ बोरवर मगराज १७४८, १७६३ ,, · 'बड वा दासी तल्लोभात् अङ्गीकृतदास्यः' ( दायक्रमस० ) पिण्डिक वीरवर मङ्गराजमहापान १७६३, १८४१ ॥ ___अर्थात् बस वा दासीके लिये जिस व्यक्तिने दासत्व गोपीनाथ वीरवरमगराज महापात्र १८४१, १८६६, अङ्गीकार किया है। कहीं कहीं 'बड़वाभृत' और दाशरथी वीरवरमगराजमहापात्र १८६६, १८८१, १८८१ , 'बड वाहत, ऐसा भी पाठ देखने में आता है। विश्वम्भर वीरवरमगराजमहापान १८८१, बड बाग्नि (सं० पु०) बस वायाः समुद्र स्थितायाः घोरक्याः (वर्तमान राजा) मुख स्थोऽग्निः । समुद्राग्नि । बडया और बड़वानल देखो। बडरा (हिं वि०) बहा। बड़बानल (सं० पु०) बड.वायाः अनलः। बड वाग्नि । बडराना (हिं क्रि०) रीना देखो। पर्याय -सलिलेन्धन, बड वामुख, काकध्वज, वाणिज, बटु वा ( सं स्त्री०) बलं वातीति बल वा-क-टाप, मन्दाग्नि, तृणधक, काष्ठधुक, और्व, बाडव। डलयोरैषयात् लस्य रत्वं । १ घोटकी, घोड़ी। २ किसी समय महर्षि और्च अयोनिज पुत्रकी कामना- अश्विनी रूपधारिणी सूर्यपत्नी संहा। ३ तृतीया सूर्य- करके अपना वक्षःस्थल मथने लगे । इससे एक पत्नी। ४ अश्विनीनक्षत। ५ नारीविशेष । ६ दासी। ज्वालामय पुरुष उत्पन्न हुआ। उस पुरुषने उत्पन्न हो ७ वासुदेवकी एक परिचारिका । ८ नदीविशेष । ६ तीर्थ- कर पिता और्वसे प्रार्थना की, 'मैं भूखके मारे व्याकुल हो भेद । १० बडवाग्नि, समुद्रके भीतरकी आग या ताप । रहा हूं, अतः मुझे जगत्भक्षणकी आज्ञा दीजिये।' इसी इसका उत्पत्ति-विवरण कालिकापुराणमें इस प्रकार समय ब्रह्मा और्वके समीप पहुंच गये और उनसे बोले, लिखा है-महादेवका कोपानल जब मदनको भस्म अपने पुत्रको संभालो, सारा संसार इससे कष्ट पा रहा करके दर्शकवृन्दको भस्म करनेके लिये तैयार हुआ है।' इस पर और्व ने निवेदन किया, 'भगवन् ! आप तब ब्रह्माने उसे बड़वा या घोडोके रूपमें कर दिया । ही इस पुत्रकी वृत्ति स्थिर कर दीजिए।' ब्रह्माने कहा, देवगण उस अग्निको बध घारूप धारण करते देखा 'समुद्र में बड वामुखमें इसका बासस्थान और समुद्रकी निश्चिन्त हुए । पीछे ब्रह्मा उस वड़वाको ले कर जगत्को वारिरूप हयि ही इसकी खाद्य वस्तु होगी। इस जगत् भलाईके लिये समुद्र के किनारे गये । समुद ने ब्रह्माको में यह बडवानल नामसे प्रसिद्ध होगा। जब जगत्का अपने किनारे उपस्थित देख उनकी पूजा की और आनेका अन्तकाल आयेगा तब यह अनलदेवासुरोंको भक्षण कारण पूछा । ब्रह्माने कहा, "यह बड़वारूपधारी महा- ___ करेगा।' इस प्रकार उसको वृत्ति स्थिर करके ब्रह्म पिता- देवके क्रोधानलसे उत्पन्न हुआ है, जब तक मैं इसे पुन- ___ भह चल दिये। तभीसे यह ज्वालामय पुरुष समुद्रके र प्रहण न करू, तब तक तुम इसे अपने हवाले बड़वामुखमें रहने लगा। (मत्स्यपु०६५. अ.) रणना । जिस समय मैं आ कर इसे छोड़ देने कहूंगा, उस बड़वा देखो। समय तू इसे छोड़ देना। तुलारा केवल जल पी कर २ लडाके दक्षिण पृथ्वीके चतुर्थ भागरूप स्थान- बड़वा यहां पर रहेगी। तुम इसे यत्नपूर्वक अपने पास विशेष । सिद्धान्त-शिरोमणि )