पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/१७२

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बदरिकाश्रम-बदरीनाथ

पर्णित अपण देवीमूर्ति हैं। जोषीमठमें भविष्यबदरी बदरी ( स० स्त्री० ) बदर गौरादित्वात् ङीष वा बदरि और वासुदेव, गरुड़ और भगवती मूर्ति प्रतिष्ठित है। कृदिकारादिति पक्षे ङीष । १ कोलिवृक्ष, बेरका पेड़ या कुछ शताब्दी पहलेसे दाक्षिणात्यके दण्डी परमहंसगण फल । २ कार्पासी। ३ कपिकच्छु, कौं छ । ४ आश्रम- बदरीनाथके पूजारीका काय करते आ रहे थे। पीछे ' विशेष, शम्याश्रम । नम्बूरी ब्राह्मणोंने उक्त कार्यका भार ग्रहण किया। वैशाख ब्रह्मनदी सरस्वतीके पश्चिमी किनारे ऋषियोंका से ले कर कार्तिकमास तक वे लोग बदरीनाथकी सेवा यज्ञ वृद्धिकारक शभ्याश्रम नामक पवित्र आश्रम किया करते हैं। पीछे शीत पड़ने पर वे ज्योतिर्धाम है। यहां बहुतसे बदरी वृक्ष है इसी कारण इसका वदरो चले जाते हैं। देवप्रयागके ब्राह्मण तप्तकुण्डमें, कोटि- आश्रम नाम पड़ा है। यहां भगवान् वेदव्यासने ईश्वरकी याल, हातोयाल और दण्डो ब्राह्मण ब्रह्मकपालोमें, डिम्रो' चिन्तामें अपना तन मन लगा दिया था। पीछे भक्ति ब्राह्मण शिव और लक्ष्मी मन्दिर में, खालिया ब्राह्मण द्वारा जब चित्त निर्मल हुआ, तब पहले पुरुष और पीछे तङ्गनीमें तथा पुरोहितानुचर योगवदरीमें, डिम्रीगण : तदधीन माया उनके दर्शन-गोचर हुई । जो अपर मायामें ध्यानबदरीमें और दक्षिणाब्राह्मण वद्धबदरी और आदि- संमोहित जीव स्वयं गुणातीत हो कर भी अपनेको बदरीमें याजकता करते हैं। पञ्चबदरी छोड़ कर नन्द त्रिगुणात्मक समझते और गुणकृत कत्तु त्वादिको प्राप्त प्रयाग और विष्णुप्रयागके विभिन्न मन्दिरोंमें अपरापर होते है उन्हें भी वे देख पाये। वेदव्यासने इस प्रकार विभिन्न श्रेणीके ब्राह्मण पुजारोका काम करते ।। नन्द- आत्मतत्त्वका अवलम्बन करके श्रीमद्भागवत संहिताकी प्रयागमें स्नान करनेसे गो और ब्राह्मणबधका पाप नाश रचना की। (भाग० । अ०) होता है। बदरी--महिसुर-राज्यके अन्तर्गत एक नदी। यह बाबा- बदरिकाश्रम ( स० पु०-क्ली० ) वदरिकाचिह्नितः आश्रमः । ' बुदन-गिरिमालासे निकल कर बेलूर नगर होती हुई हेमा- तीर्थविशेष । यह तीर्थ श्रीनगर (गढ़वाल) के पास अलक- : वतीमें जा गिरी है । बेरेजी-हल्ला नामक एक और शाखा- नन्दा नदोके पच्छिमी किनारे पर अवस्थित है। यहां नर- नदीने इसके कलेवरकी वृद्धि की है। नारायण तथा ध्यासका आश्चम है , कहते हैं, कि भृगु- बदरी-सह्याद्रिके अन्तर्गत एक तीर्थ । यहाँ त्रिलोचन तुंग नामक शृङ्गाके ऊपर एक बदरीवृक्षके कारण वदरिका- : शिवकी एक मूर्ति प्रतिष्ठित है। (भाद्र ० ३६८) श्रम नाम पड़ा। महाभारतमें लिखा है, कि पहले यहां बदरीच्छद (स.पु. क्ली० ) नखीनामक गन्धद्रव्य । गंगाकी गरम और ठंढी दो धाराएं थीं और रेत सोने- बदरीच्छदा ( स० स्त्री० ) वदर्याः छदा इव छदा यस्याः। की थी। यहीं पर देवताओं और ऋषियोंने तप कर १ हस्तिकोलिवृक्ष, एक प्रकारका बेर । २ शङ्कनदी, एक भगवान् विष्णुको प्राप्त किया था। गन्धमादन, बदरी, सुगन्ध द्रव्य जो शायद किसी समुद्री जंतुका सूखा मांस नरनारायण और कुबेरशृङ्ग इसी तीर्थके अन्तर्गत हैं। हो। नरनारायण अर्जुनने यहां कठोर तपस्या की थी। बदरीनाथ-युक्तप्रदेशके गढ़वाल जिलान्तर्गत एक हिमालय पाण्डव महाप्रस्थानके लिये इसी स्थान पर गये थे। शिखर। यह समुद्रपृष्ठसे २३२१० फुट ऊंचा है। इसी पद्मपुराणमें वैष्णवोंके सब तीर्थों में बदरिकाश्रम श्रेष्ठ कहा शृङ्गभमिसे अलकनन्दा नदी निकली है। उसके सानु- गया है। देशमें प्रायः १०५०० फुटकी ऊँचाई पर बदरीनाथ नामक "योऽवतीर्य्यात्मनोऽशेन दाक्षायण्यान्तु धर्मतः। लोकानां स्वस्तपेऽध्यास्ते तपो वदरिकाश्रमे ॥” प्रसिद्ध विष्ण मूर्ति स्थापित है। यह अक्षा० ३०°४४ (भाग० ७१४) १५ उ तथा देशा०६३०४० पू०के मध्य पडता है। भगवान् विष्ण ने अपने अश द्वारा दाक्षायणी में अव- शङ्करस्वामी नामक किसी योगीने नदीगर्भ से वह मूर्ति तीर्ण हो कर लोगोंकी भलाईके लिये वदरिकाश्रममे निकाल कर स्थापित की । तीर्थसाहात्मामें इसकी विशेष तपस्या की थी। परिका देखो। । ख्याति गाई है। भूमिकम्पसे मन्दिर नष्ट प्राय हो गया