पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/१७५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


बदाऊँ १६६ परास्त कर इस प्रदेशको दिल्लीके राज्यमें मिला लिया। व्यवसायके केन्द स्थान हैं। नोल, चीनी, और पीतल.. जब हिन्दुस्तानमें मुगल बादशाहत्की नींव पड़ी तो के वासनोंकी यहाँ पर ज्यादा विक्री होती है। ककोरा हिमायूनने इस प्रदेशमें एक सर्दार तैनात कर दिया। नामके स्थानमें हर साल कार्तिक संक्रान्तिको बड़ा भारी अकबरको सल्तनतमें बदाऊ एक स्वतंत्र महकमा माना मेला लगता है। इस मेले में लाखों मनुष्यकी भीड़ होती गया और कासिम अली खाँ इसके जागीरदार बनाये है। चावपुर, सुखेला, लक्ष्मणपुर, पाड़चियामें एक गये। १५७१ ई०में बड़ा भीषण अग्निकाण्ड हुआ, और मेला लगता है। यहां अयोध्या रुहेलखण्डका एक सबका सब जल कर खाक हो गया। शाहजहांने विचार स्टेशन है। अदालत बदाऊँसे उठवा कर बरेलीमें पहुंचावा दी। २ वदाऊजिलेकी एक तहसील। यह अक्षा० २७ रोहिलोंके अभ्युदय पर बदाऊं और भी श्रीहीन हो गया ५० से २८१२ उ० तथा देशा० ७८०४८ से ७६ १६ पू०के था। १७१६ ई०में फरुखाबादके नवाव महम्मद खाँ वङ्गम- मध्य गङ्गाके उत्तरी किनारे पर बसा हुआ है । भूपरिमाण ने बदाऊँ नगर तक जिलेका दक्षिणांश अपने अधिकाग्में ३८५ वर्ग मील और जनसंख्या ढाई लाखके कर लिया था। वाकीके भाग पर रोहिल-सग्दार अली. करीब है। इसमें २ शहर और ३७७ ग्राम लगते हैं । महम्मदने अपना दखल जमाया । रोहिलाओंने फर्रुखा- ३ जिलेका प्रधान नगर और विचार-सदर। यह वादमें नवाबको हराया और सब महाल भी अपने कावृमें अक्षा० २८२ उ० और देशा० ७७ पू०के मध्य किये। १७७४ ई०में भिगमपुर कटरामें हाफेज रहमत विस्तृत है । जनसंख्या प्रायः ३६०३१ है । प्राचीन बदाऊ जब हार गया तब यहांके शासनकर्ता दाऊदखाने अयोध्या नगरके पास ही नवीन बदाऊ बसा हुआ है। पुराने के वजीर शुजाउद्दौलासे संधि कर ली। किन्तु वजीरने बदाऊ में दुर्ग और सुरम्य मकानोंके खडहर दीख पड़ते थोड़े ही दिन बाद उनके ऊपर हमला कर उनको बुरी हैं। मुसलमानाधिकारमें प्रायः चार सौ वर्ष तक बदाऊ तरह शिकस्त दी और उनका राज्य छीन लिया। शहरमें कातिहरकी राजधानी थी। उस समय इसकी शोभा १८०१ई० में यह स्थान ब्रिटिश राज्यमें आया। इस और सम्पत्ति खूब बढ़ो चढ़ी थी । बलवन जब बदाऊ शहर समयसे गदर तक यहां और कोई नवीन घटना न घटी। को देखने आये थे तब यहां मालिक फेज शिरवाणी मीरटके गदरका समाचार सुन यहांके सभी सिपाही शासनकर्ता थे। ये मादक वस्तुओंको खा कर ऐसे बागी हो गये। अबदुल रहीम खाँ उम समय इस उन्मत्त हो जाते थे, कि एक दिन इन्होंने अपने भृत्यको प्रदेशमें राज्य करते थे। किन्तु हिंदू और मुसलमानोंमें मार डाला था । भृत्यकी विधवा पत्नीने यह इस गोलमालके समय आपसमें वैमनस्य बढ़ा। दास्तान सम्राट् बलवन्को सुनाई। सम्राट् बलवन् ठाकुर राजाओं और मुसलमानोंके बीच दो बड़े भयंकर इस करुण-कहानीको सुन बहुत बिगड़े और उन्होंने उसे युद्ध हुये।। इस युद्ध में हिंदू हारे । मालागढ़के वालि- शहरके सदर दरवाजे पर लटकवा कर मरवा डाला। दाद दुर्ग के पतनके बाद विदोही सर्दार बदाऊ में लौटे। इस नगरमें वास करनेके कारण मौला अबदुल किन्तु थोड़े ही दिनोंके बाद उन्होंने फतेगढकी तरफ कादेका बदाऊ नाम पड़ा। १००४ ई० में यहां प्रस्थान किया। गुनौर के पास मुसलमानोंसे अहोर परास्त उनकी मृत्यु हुई। उन्होंने १५७१ ईमें बदाऊका हुए। १८५८ ई०में मियाज महम्मद, सर जहोप प्राण्टके अग्निकाण्ड अपनी आंणोंसे देखा था। उसके बाद हाथ हार स्वीकार कर बदाऊ शहरमें छिपे थे। उसके : जहांगीरके भाई कुतबुद्दीन चिश्तीने यहां पर वास किया दलबलको अब ब्रिटिश सैन्यने अच्छी तरह हरा दिया, था। उन्होंने यहांकी जुम्मा मसजिदका जीर्णोद्धार कराया। तब मुसलमान जरा सी भी देर रणक्षेत्रमें न ठहर सके। अबुल फजलने लिखा है, कि यहां पर अनेक साधु फकीरों- इसके बाद यह प्रदेश अंग्रेजोंके अधिकार में आया। को कत्र थीं। बहुतसी कन न मालूम कहां चली गई है। कंबल

बदाऊ, साहसवन और विल्सी ये यहांके प्रधान समशी इदगाके पास बदरुद्दीन शाह विलायतकी जियार

Vol. xv. 43