पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/१८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


मत्यमाव अभ्यास किया है। अभ्यासके बलसे वह चाहे जिस भ्यस्त विषय भुला जाता है, उसी प्रकार मृत्युयन्त्रणा समय विछावन पर जाय, पर उसकी नींद ठक उसी भी मुमूर्षु के विद्यमान सभी भावोंको विस्मृतिसागरमें समय टूटतो है । अथच वह व्यक्ति यदि चाहे, कि मैं कल निमग्न और अभिनव भावनाका उत्स्थापन करती है। ठीक ६ दण्ड रात रहते उगा, तो यह निश्चय है, कि जीवने जीवन भरमें जो सब कर्म ध्यान वा अभिनिवेश उसकी नींद ठीक उसी समय टूट जायगी। इससे जानना किया है, मृत्युकालमें उसीके अनुरूप एक नूतन-परि- चाहिये, कि ध्यान वा अभिनिवेश अभ्यासको अतिक्रमण वर्तन अर्थात् एक नूतन भावना उपस्थित होती है । करके प्रभुत्व करनेमें समर्थ है। आहार, बिहार, विसर्ग शास्त्रमें इसीको भावनामय शरीर बतलाया है। मृत्यु- (मलमूलत्याग) और अन्यान्य दैहिकक्रिया सभी अभ्यास, कालमें भावनामय शरीर होता है, इसका अर्थ यह, कि ध्यान और अभिनिवेशके प्रभावसे हमेशा निर्वाहित भविष्यमें जो व्याघ्रयोनिमें जन्म लेगा, मरणकालमें उसे होती है। शरीरके रहते जो सब ध्यान, अभिनिवेश 'ध्याघ्रोऽहं' एसो भावना उत्पन्न होती है। उत्कट और अभ्यास किया जाता है, शरीरपात होने पर वे सब मरणयन्त्रणा उसके स्थूलशरोरके समान ज्ञानको विलुप्त ध्यान, अभिनिवेश और अभ्यास सस्कारीभावको प्राप्त कर भावनामय विज्ञान उत्पन्न करती है। यह भावना- हो कर जीवको अनुरूप नियमके अधीन रखते और विज्ञान वा भावशरीर स्वप्नशरीरके अनुरूप है। हम परिवर्तित करते हैं। इस शरीरमें किसी एक विषयका लोग जिस प्रकार स्वप्न देखते हैं, उसी प्रकार स्थूलदेह- निरन्तर ध्यान करके शरीर परित्याग करने पर भी वह ज्युत भावदेही पहले अस्पष्ट परजन्मका स्फुरण सन्दर्शन कभी न कभी पुनरुदित होगा हो। उस उदयका वीज करता है, पीछे यथाकालमें उसका पाटकौषिक शरीर अनुष्ठित ज्ञानकर्मका संस्कार है । जो संस्कार सूक्ष्म उत्पन्न होता है। शास्त्र में जन्म और मरणको जो तृण- शरीरमें रहता है, पीछे उसीके वलसे वह उबुद्ध होता जलौकाको तरह बतलाया, वह भावनामय शरीर विष- है। स्थित सस्कारके उद्बुद्ध होनेसे स्मरण और यक अर्थात् जलौका जिस प्रकार एक तृणको छोड़ कर प्रत्यभिज्ञा नामका ज्ञान उत्पन्न होता है। उसके साथ दूसरे तृणको पकड़ती है अथवा अन्य तृण बिना पकड़े मनोभाव और अवस्था परिवर्तित होती है। इस जन्म-: गृहीत तृण नहीं छोड़ती हैं, उसी प्रकार जोव भी अन्य में जो जन्मान्तरीय संस्कार उबुद्ध होता है, वह उद्बोध: शरीरको बिना ग्रहण किये इस शरीर का त्याग नहीं इहलोकमें स्वभाव और प्रकृति इत्यादि नामोंसे परिचित . करता । वह अन्य पाटकौषिक शरीर नहीं है । परन्तु वह है। मरणकालमें स्थूलदेह पतित रहता है, किन्तु उस ; भावनामय शरीर है। षाटकौषिक शरीरलाभ सबोंके देहका अजित मस्कार सूक्ष्मशरीरके अवलम्बन पर विद्य भाग्यमें बदा नहीं रहता। मान रहता है, वृथा नष्ट नहीं होता। यही कारण है, कि “योनिमध्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः । मरनेके बाद उस देहका अर्जितज्ञानकर्म अर्थात् धर्मा स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥" धर्मादि उसको अभिनव अवस्थाको उपस्थापित करता (स्मृति) है। मृत्युयन्त्रणा उस देहकी परिचित सभी वस्तुओं भावनामय देहका दूसरा नाम आतिवाहिक देह है। को भुला देती है और भविष्यत देह नथा भविग्यत देहका आतिवाहिक देह थोड़े समय तक रहती है । पीछे पूर्व- भोग्य एवं भोगसम्बन्धीय भावना-विज्ञानमें पर्यवसित प्रशाके अनुसार षाटकौषिक भोगदेह उत्पन्न होती है। करती है। _____ कोई तो मानवदेह, कोई तिर्यकदेह, अथवा कोई देव- ___ यातना चाहे जितने प्रकारको क्यों न हो, 'मग्ण- देह पाता है। पुण्याधिक्य रहनेसे पुण्यशरीर अर्थात् यातना सबसे उत्कट है ; किसी प्रकारका उत्कट रोग ' देवादि शरीर, पापाधिक्य रहनेसे तियकशरीर, पापपुण्य- होनेसे अथवा मूर्छादि दुरन्त अवस्थाका भोग होनेसे का बल समान रहनेसे मानवशरीर उत्पन्न होता है । जिस प्रकार पर्वमञ्चित झानकी अन्यथा होती है, पूर्वा जब तक स्थूलशरीर उत्पन्न नहीं होग, तब तक भावना-