पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/१९

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प्रत्यमाव-प्रय मय शरीरमें अर्थात् आतिवाहिक भावदेहमें सुखदुःखका टे-भाव लाभ करके प्रबल प्रसवधायु द्वारा धनुर्मुक्त भोग करना होगा। वह भोग स्वप्नभोगकी तरह अस्पष्ट वाणको तरह योनिछिद्रसे बाहर निकल आता है। है। स्वप्न और भावनामय है। मृत्युकालमें जिस योगशास्त्रमें लिग्वा है, --अष्टम मासमें जब मनका भावकी स्फूति होगी, वह भाव प्रबल हो कर उसे तदनु- प्रादुर्भाव होता है, तभीसे ले कर जब तक भूमिष्ठ नहीं रूप गति प्रदान करता है। जीवके मुमूर्षु होनेसे लोग होता, तब तक जीव पूर्वजन्मका वृत्तान्त स्मरण और उसके काममें विष्णुका नाम इस लिये सुनाते हैं, कि इस गर्भावासको कठोर यन्त्रणाका अनुभव करके क्लेश पाता समय भी उसके मनका भाव ईश्वरकी ओर जाय । परन्तु रहता है । वह वेचारा क्या करे, मुख जरायुसे आच्छन्न है, इससे कोई फल पानेकी सम्भावना नहीं । चैतन्य प्रति- कण्ठ कफपूर्ण है, वायुका पथ निरुद्ध है, इत्यादि कारणों- बिम्बित सूक्ष्मदेह कथित प्रकारसे पाटकौपिक शरीरसे से वह रोदनादि नहीं कर सकता। सुतगं पूर्वानुभूत निकल कर पहले आतिवाहिक शरीरमें आकाशस्थित, नाना जन्मकी नाना प्रकारको यन्त्रणा याद करके अति आलम्बनहीन, वायुभूत और आश्रयशून्य अवस्थाको उद्वेगके माथ उसे सह कर रह जाता है। प्राप्त होती है। पीछे यथाकालमें जन्मग्रहण "जातः स वायुना स्पृष्टौ न स्मरति । करती है। जो अत्यन्त पापाचारी हैं वे मरनेके बाद इस पूर्व जन्ममरणं कर्म च शुभाशुभम् ॥” पृथ्वी पर आतिवाहिक शरीरमें कुछ दिन रह कर पीछे ज्योंही वह भूमिष्ठ होता है, त्योंही सभी बातें भूल तमःप्रधान वृक्ष-लतादि जड़ सहित ग्रहण करते हैं। जो जाता है । वाह्यवायु हो उसकी पुरातन स्मृतिको विनाश ऋषि, तपस्वी और शानो हैं, वे देवयानपथसे ऊर्ध्वलोक- कर डालती है। इसी नियमसे जन्म और मृत्यु हुआ गामी हो कर धीरे धीरे ब्रह्मलोकमें जा उत्पन्न होते हैं। करती है। जो सत्कर्मनिष्ठ हैं वे पितृयानपथसे ऊळगामी हो पितृ- दर्शनशास्त्रमें जीवका जन्म और मृत्युःविषय लोकमें जा कर जन्म लेते हैं । अनन्तर सुखभोगके बाद वे इस प्रकार निर्दिष्ट हुआ है। जन्म और जन्मके पुनः पितृयानपथसे इहलोकमें उतरते और अपने कर्मानु- बाद मृत्यु, यह अवश्य होगी ही । इस प्रकारका सार मानवशरीर पाते हैं। जो मनुष्य पशुशरीर पाता है, जन्म और मृत्यु ही जीवका प्रेत्यभाव है । जब उसे आकाशमें, पृथ्वी पर, पीछे पार्थिवरसके साथ तक मुक्ति नहीं होगी, तब तक पूर्वोक्त प्रकारसे जन्म शस्यादिके मध्य, उसके बाद खाद्यरूपमें मनुष्य वा अन्य और मरण-क्लेशका भोग करना ही पड़ेगा । मुक्ति किसी जीवके शरीरमें कुछ दिन रहना पड़ता है। होनेसे फिर प्रत्यभाव नहीं होगा। सभी दर्शनशास्त्रोंमें पुंशरीरमें प्रवेश करनेसे रसरक्तादि क्रमसे शुक्रधातुमें और जिससे यह प्रत्यभाव अर्थात् जन्ममृत्यु न हो, उसका स्त्रीशरीरमें प्रवेश करनेसे आतंवरक्तमें अषस्थान करता विषय समझा गया है। है। अनन्तर वह स्त्रीपुरुषसंयोगके उपलक्ष्यमें गर्भयन्त्रमें प्रत्यभाविक (स० वि०) प्रेत्यभाव सम्बन्धीय, इहलोक- प्रविष्ट हो कर षाटकौषिक देह पाता है। सम्बन्धी। जीव खाद्यके साथ जिस शरीरमें प्रवेश करता है, प्रेत्वन् (संपु०) प्र-इ क्वनिप् । १ इन्द्र । २ बात, हवा । उस समय उसे उसी शरीरके अनुरूप संस्कार होता है। प्रेप्सु (स त्रि०) प्राप्त मिच्छुः प्र-आप-सन्-उ । जो पानेमें जो पहले मानवदेहमें था, कर्मकी प्रेरणासे वह यदि इच्छुक हो, जो कोई चीज पानेकी खाहिश करता हो। बानरयोनिमें उत्पन्न हुआ हो, तो बानरशरीरमें प्रवेश प्रेम ( स० पु० क्ली० ) प्रियस्य भावः प्रिय ( पृथ्व्यादिभ्य करते ही उसका मानवोचित संस्कार जाता रहता है और • इमनिण्या। पा ५११२२ ) इति इममिच ( प्रियस्थिरेति । पानरोचित संस्कारका सञ्चार होता है। पा ६४१५३ ) इति प्रादेशः, वा प्री-तर्पणे-मणिन् । १ पुंस्त्रीके संयोगसे जीव गर्भ में प्रविष्ठ होता है । पीछे सौहाई । पर्याय प्रेमा, प्रियता, हाद, स्नेह । गर्भस्थ देही वम या दशममासमें अङ्गप्रत्याङ्गादिका प्रेमके प्रियता, हाई, स्नेह आदि कतिपय पर्याय Vol. xv 4