पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/१९०

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१८४ बन्धक अनुसार मुख्य सोलह आसनोंमेंसे कोई आसन । मुख्य या राजकृत उपद वमें गिरवी द व्यके नाश होनेसे उसका सोलह आसन ये हैं -१ पद्मासन, २ नागपाद, ३ लता- मूल्य नहीं देना पड़ता। गिरवी द व्य यदि यलपूर्वक सुर- घेष्ट, ४ अर्द्ध संपुट, ५ कुलिश, ६ सुन्दर, ७ केशर, ८ क्षित रखने पर भी नष्ट हो जाय तो उसके बदले में उसका हिलोल, ६ नरसिंह, १० विपरीत, ११ क्ष ब्ध, १२ धेनुक, यथोचित मूल्य देना पड़ेगा। १३ उत्कण्ठा, १४ सिंहासन, १५ रतिनाग, और १६ कर्जदार महाजनको सच्चरित्र जोन कर यदि बहु- विद्या-धर। मूल्य द्रव्य बंधक रख कर उससे अल्प धन ले, तो द्विगुण इसके अतिरिक्त स्मरदीपिकामें अठारह प्रकारके सूद समेत मूलधनके देने पर बंधकी दृष्य वापिस लेता रतिबधोंका उल्लेख है, यथा---१ कामप्रद, २ विपरीत, ३ है। यदि कर्जदार यह शर्त करे, 'जब सूद दूना हो जायगा नागर, ४ रतिपाशक, ५ केयूर, ६ प्रियतोष, ७ समपद, ८ तब द्विगुण सूद दे कर गिरवी द्रव्य छुड़ा लूगा' तो इस एकपद, ६ सम्पूट, १० उद्ध्वसम्पूट, ११ स्तनभव, १२ रति शतके अनुकूल ऋणी दूना सद दे कर अपना दव्य ले सुन्दर. १३ ऊरुपीड़, १४ स्मरचक्र, १५ ऊरुक्रम, १६ सक्ता है । ऋणी जब व्याज सहित मूलधन ले कर गिरवी चेष्टक, १७ हंसकील और १८ लीलासन । द्रष्य छुड़ाने आवे तब धनीको वह चीज बिला उजुर दे (स्मरदीपिका) देनी चाहिये। ८ योगशास्त्रके अनुसार योग साधनको कोई मुदा। धनी ऋणीको दव्य देने में आपत्ति करे, तो राजाके यहां जैसे, उड़ियानबन्ध, मूलबध, जालन्धरबंध, इत्यादि। उसे चोरके समान दंड मिलता है। धनीकी उपस्थिति निवन्ध रचना। १० चित्रकाथ्यमें छन्दकी ऐमी रचना नहीं रहने पर उसके विश्वस्त मनुष्यके पाससे मूलधन जिससे किसी विशेष प्रकारको आकृति या चित्र बन : व्याज सहित देने पर बंधकी दवा ले लिया जाता है। 'जाय। ११ लगाव, फंसाव । १२ मानसिक चिन्ता । १३ . गिरवीदार के पास गिरवी दव्यका लेनेवाला यदि कोई जिससे कोई चीज बांधी जाय । उपयुक्त मनुष्य न रहे, अथवा कर्जदार गिरवी दवा बेच बन्धक ( क्ली० ) बध्नातीति यंध ण्वुल । ऋणके लिये गिरवीदारकी अनुपस्थितीमें ऋण शोध करना चाहे, तो ऋणके बदले में धनोके पास रखी जानेवाली वस्तु, द व्यका जितना मूल्य हो उसे निर्धारित कर ले, और जब रेहन, गिरवी। ऋण लेते समय सुवर्ण वा भूमि आदि तक गिरवीदार न आवे तथा धन ले कर गिरवीनामा बंधक रसनी पड़ती है। वादमें सूद सहित ऋण चुकती फाड़ न दे, तब तक चीज उसीके पास रहने दे। पर उस होने पर बंधको संपत्ति वापिस हो जाती है। याज्ञ- : दिनसे उस पर वाज नहीं चलेगी, यदि ऋण लेते समय हितामें इस संबंधमें लिखा है, गिरवी रख यदि कर्ज। यह शर्त हो जाय. कि मूलधनके दने होने पर दूना ही लिया लिया जाये, तो कर्ज के दूने होने पर भी ऋण चुकती न हो, जायगा, तो कर्जदार उतना देनेको बाध्य है। यदि मूल तो गिरवी रखी हुई वस्तु महाजनकी हो जाती है । उम पर धन बढ़ कर दूना हो जाय और कर्जदारके पास गिरवी रखनेवालेका कुछ अधिकार नहीं रहता। गिरवी। रुपया न रहे तो गिरवीदार साक्षी रख कर गिरवीद्रवा छुडानेका समय निश्चित रहता है। निश्चित समयमें। बेच सक्ता है। यदि विना गिरवी द ष्य रखे कर्ज बढ़ कर गिरवी वस्तुको नहीं छुड़ानेसे उस पर अधिकार धनीका दूना हो जावे तो कर्जदार उसके बदलेमें जमीन गिरवी- होता है। दारको दे दे। पीछे उस जमीनकी फसलसे अपना कुल यदि महाजनको बधकी दृष्य पर सूद बरावर मिलता पावना परिशोध कर महाजन कर्जदारको वह जमीन रहे अथवा अन्य लाभ हो, तो बधकी दव्य ज्योंकी त्यों वापस दे दे। बनी रहती है। गिरवी व्यके गुप्त रूपसे भोगने अथवा मनुस्मृतिमें लिखा है कि यदि भोगके निमित्त कार्याक्षम कर देने पर सूद नहीं मिल सकता । गिरवी : कोई वस्तु या वास दासीको गिरवी रख कर महाजनसे दव्यके खो जानेपर उसका मूल्य दे देना पड़ता है। देवकृतः रुपया उधार ले तो व्याज नहीं देनी पड़ती। .