पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/१९१

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बन्धकी-बन्धलगोती १८५ बलपूर्वक गिरवी द्रव्यका भोग नहीं हो सकता । यदि बन्धनपालक ( स० पु० ) कारागार रक्षक, वह जो काग- कर्ज देनेवाला उस द्रव्यको काममें लाये, तो ऋणका सूद गारको रक्षा करता हो। छोड़ना होगा अथवा भोग करनेका कारण यदि उलटा बन्धनवेश्म ( स० क्लो० ) बन्धनाय बधनस्य वा वेश्म हो, तो कर्जदारको निश्चित मूल्य दे कर संतुष्ट करना गृह। कारागार, कैदखाना। होगा। यदि न करे, तो कर्ज देनेवाला चोरकी तरह बन्धनस्थ (स.त्रि०)वधने तिष्ठति स्था-क। बंधन- दंडनीय होगा। गिरवी द्रव्यको कर्जदार जिस समय स्थित, कारारुद्ध। चाहेगा उसी समय उसको देना होगा। गिरवी व्य बन्धनस्थान ( स० क्ली० ) व धनस्य स्थान। १ कारा जितने दिन क्यों न रहे, उस पर कर्जदारका सदा हक गार ।२ पश-बधन म्थान, मवेशियोंके यांधनेका स्थान । बना रहेगा। महाजन जितना रुपया कर्ज में दे, वह बन्धनागार ( स०पु०) बंधनस्य आगारः। कारागृह, कारागार। कर्जदारके पासमें कितने हो दिन क्यों न रहे, उसके दूने बन्धनालय ( स० पु०) बंधनाय बधनस्य वा आलयः। से ज्यादा होने पर महाजनको फिर घ्याज नहीं मिलती। कारागार। (मनुस्मृति ८ अ०) बन्धनी (स० स्त्री०) १ भेदावरोधक सूत्रमय और स्थिति- (पु० ) बन्ध स्वार्थे-कन् । २ विनिमय, बदला। ३ स्थापक गुणोपेत पदार्थ, शरीरके अन्दरकी वे मोटी रतहिंजक, वह जो स्त्रियोंको चुराता हो । (त्रि०) ४ बंधन नसें जो सन्धिस्थान पर होती हैं और जिनके कारण कर्ता, बांधनेवाला। "न नारी न धनं गेह न पुत्रो न सहोदराः। दो अवयव आपसमें जुड़े रहते हैं। २ बन्धनसाधन बन्धनं प्राणिनां राजन्नहङ्कारस्तु बधकः ॥” रज्जु, वह रस्सी जिससे कोई चीज बांधो जाय । (भागवत ५॥१॥३६) ! बन्धन बन्धनीय (स० वि०) बन्ध-अनीयर। १ बन्धनयोग्य, अहंकार ही जीवका बंधक अर्थात् बांधनेवाला है। बांधने लायक। (क्ली० )२ सेतु, पुल। जब तक 'मेरा' हम, हमारा, अर्थात् हमारी स्त्री, हमारा बन्धमोचनिका (स. स्त्री०) १ बन्धसे भोचनकारो, बन्ध- से रक्षा करनेवाला। २ योगिनीविशेष । पुत्र हमारा सुख दुःख, यह शान रहेगा, तब तक बंधन बन्धलगोती--अयोध्या-प्रदेशवासी क्षत्रिय जातिविशेष । अवश्य होगा, इसलिये अहंकार ही बधक है। सुलतानपुर-जिलेके अमेथी परगने में इस जातिके अनेक बन्धकी (सं० स्त्री०) बध्नाति मानसमिति बन्ध-ण्वुल, क्षत्रिय रहते हैं। दूसरी जगह कहीं भी इनका वास गौरादित्वात् ङोष । १ व्यभिचारिणी स्त्री, बदचलन नहीं देखा जाता : कहते हैं. कि हसनपुर-राजभृत्यके औरत। महाभारतमें लिखा है, कि जो पञ्चपुरुषगामिनी औरस और घर्रामी-रमणीके गर्भ से इनकी उत्पत्ति है। है, उसे बन्धको कहते हैं। २ वेश्या, रंडी । ३ हस्तिनी, हथनी। आज भी इनके किसी किसी क्रियाकर्म में 'बड्डा' नामक अस्त्रकी पूजा होती है। उस अस्त्रसे उनके पूर्वपुरुष- बन्धक (सं० पु०) शिव, महादेव । - बन्धन (सं० क्ली०) बन्ध-भावे-ल्युट।. १ बन्धनक्रिया, गण बांस फाड़ते थे, किन्तु वर्तमान बन्धलगोतिगण ! इस नीच उत्पत्तिकी कथा स्वीकार नहीं करते। इन बांधनेका काम। २ वह जिससे कोई चीज बांधी जाय। लोगोंका कहना है, कि वे सूर्य वशीय क्षत्रिय हैं, वर्तमान ३ बध, हत्या। ४ हिंसा। ५ रज्जु, रस्सी। ६ कारा- जयपुर राजवंशकी एक शाखासे उत्पन्न हुए हैं । प्रायः गृह, कैदखाना। ७ बन्धनस्थान। ८ शिव, महादेव । सौ वर्ष पहले उस वशके कोई व्यक्ति अयोध्या-तीर्थ ६ शरीरका संधिस्थान, जोड़। (त्रि०) १० बन्धन- कर्ता, बांधनेवाला। दर्शनको आये थे और अपने अलौकिक शक्ति-प्रभावसे बन्धनप्रन्थि (स.पु०) बन्धनस्य प्रन्थिः। १ अस्थि- यहां एक नई शाखा स्थापन कर गये। धीरे धीरे बन्धनको प्रन्थि, शरीर में वह हड्डी जो किसी जोड़ पर हो। दलपुष्ट हो कर उस दलके लोग यहांके सर्वेसर्वा हो २बन्धनकी गांठ, गिरह। उठे। Vol. xv.'47