पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/१९५

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है। बग्नू-वपयार शाहके अमलमें मरवत्'लोगोंने इस पर अधिकार जमाया राज्यभुक्त होनेके बाद यहां अङ्रेजोंका शासन अच्छी तरह और नि जैिको खटक नियाजै पर्वत पर मार भगाया। जम गया। १८५७ ई०में सिपाही विद्रोहके समय यहां इसके प्रायः डेढ़ सौ वर्ष बाद अहमदशाह दुरानीने जब कोई विशेष घटना न घटी। पश्चिमके अधिवासियों के गकर जातिका प्रभाव नष्ट कर डाला, तब सरहङ्ग लोगोंने : आक्रमणसे बोच बीचमें शान्ति भङ्ग हुआ करती थी। यहां आ कर आश्रय ग्रहण किया था। मरवत् और सीमान्तदशकी रक्षाके लिये यहां १० थाने हैं जिनमेंसे बग्नूची आज भी इस प्रदेशमें बास करते हैं। में गोरा और करम तथा टोची थाने में देशीय सिपाही ___ अकबरके परवत्ती दो सदी तक यहांके अधिवासियों- : रहते हैं। ने नाममात्र दिल्लीको अधीनता स्वीकार की थी। १७३८ इस जिलेमें २ शहर और ३६२ ग्राम लगते हैं। जन- ई में नादिरशाहने यह स्थान जीत कर सारे संख्या ढाई लाखके करीब है। यहाँको भाषा पुश्त है। प्रदेशको श्मशान-सा बना दिया। अह्मदशाह दुरानीने विद्याशिक्षामें यह जिला बहुत पीछा पड़ा हुआ है। इसी उपत्यका हो कर अपनो सैन्यपरिचालना की थी और सैकड़े पीछे ४ मनुष्य पढ़े लिखे मिलते हैं। अभी जाते समय वे यथासाध्य कर वसूल करनेमें जरा भी उच्चनीच श्रेणीके स्कूलोंकी संख्या कुल २०० हैं। स्कूलके बाज नहीं आये थे। किंतु दुर्द्धर्ष अधिवासियोंको वश-: अलावा एक मिभिल अस्पताल और एक निकित्सालय में ला कर वे शासनविधिकी स्थापना किसी हालतसे न कर सके । १८३८ ईमें यह स्थान सिखोंके अधिकारमें २ उक्त जिलेकी एक तहसील । यह अक्षा० ३२४४ से आया। रणजितसिंहने रावलपिण्डीवासी गाकर जाति- ३३५ उ. और देशा० ७०२२ से ७०.५८ पृ०के मध्य को परास्त कर सिधुके पूर्ववत्ती स्थानों में अपना शासन अवस्थित है । भूपरिमाण ४४३ वग मील और जन- प्रभाव फैलाया। राज्य फैलानेकी इच्छासे वे धीरे धीरे संख्या प्रायः १३०४४४ है। इस उपविभागमें बन्नूची सिन्धुके पश्चिम बन्नू उपत्यका तक बढ़ गये थे । अन्यान्य नामक अफगान जातिका वास है। इसमें इसी नामका सभी स्थान उनके हाथ आने पर भी घे बन्नूवासियोंको एक शहर और २१७ ग्राम लगते हैं। कावूमें न ला सके। कई बार युद्धके बाद वे अपने पूर्व- ३ उक्त तहसीलका एक नगर। यह अक्षा० ३३० पुरुषोंकी प्रथाके अनुसार बाकी खजाना वसूल करनेके तथा देशा०७०३६ पू० कुर म नदीसे एक मील दक्षिण में समय सैन्य प्रेरण द्वारा उन्हें उत्सादित करते थे। अवस्थित है । जनसंख्या १५ हजारके लगभग है । १८४८ रणजितकी मृत्युके बाद यह स्थान अङ्रेजोंके अधि-: ईमें लेफ्टिनेण्ट एडवर्डने इस नगरको बसाया। यहां कारमें आया। १८४७-४८ ई०में सर हावर्ट एवाडिस काश्मीरके महाराजाके स्मारकमें एक दुर्ग बनाया गया है सिखसेना के साथ बन्न उपत्यका देखने आये। इस जिसका नाम धुलीपगढ़ है। धूलीपनगर नामका एक बाजार समय बन्नूबासी स्वाधीन, परस्पर विरोधी और युद्ध- । भी उन्हीं की स्मृतिमें बसाया गया था। चर्च मिशनरी विग्रहमें लिप्त थे। प्रत्येक ग्राम एक दर्गरूपमें परिणत : समितिने शहर में एक गिरजा और १८६५ ई० में एक हाई- हो गया था। सेनापति एडवाडिसने अपने बुद्धि- स्कूल खोला है। यहां ब्रिटिश सरकारका सीमान्तरक्षक कालिसे उबला कर राज्य भरमें शान्ति स्थापन ! सेनादल (१ दल अश्वारोही, २ दल पदातिक, १४७० सङ्गीनवाही सैन्य, ४९२ तलवारधारी और कामानवाही की। उनके सभी दुर्ग तोड़ फोड़ दिये गये। वे सबके सब सैन्य ) रहता है। स्वेच्छासे राज कर देने लगे। मूलतान-युद्धके आरम्भमे बन्नूची-बन्न जिलावासी अफगानजाति । एडवासि यहांसे सैन्य संग्रह करके युद्धक्षेत्रमें उतरे। बन्हि ( स०स्त्री० ) वहि देखो। अभियानकालमें बन्नवासियोंने विशेष राजभक्ति दिख- खपमार (हि.वि.) पिताका घातक, वह जो अपने लाई थी। एडवासाबादकी सिखसेना विद्रोही हो पिताकी हत्या करे । २ सबके साथ धोखा और अनपाय कर मूलतानमें आ कर मिल गई। पञ्जाब अगरेजोंके करनेवाला । Vol. xv. 48