पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/१९७

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बभनी-भ्र वाहन ३ पस्सी बबूल देखो।' ४ हाथियोंके पांवमें होनेवाला । बभ्रुवाहन (पु० ) मणिपुरके एक प्रसिद्ध राजा। यह एक प्रकारका फोड़ा। अर्जुनकी स्त्री चित्राङ्गदाके गर्भसे पैदा हुए थे। बभनी (हिं. स्त्री०) १ एक प्रकारका कीड़ा। यह छिप महाराज युधिष्ठिर जिस समय अश्वमेधयश करते थे, कलीके समान, पर जोंक-सा पतला होता है। इसके शरीर उस समय अर्जुनको यज्ञके अश्वका रक्षक बनाया। पर लंबी सुन्दर धारियां होती हैं। जिनके कारण वह | यज्ञीय अश्व दौड़ता हुआ मणिपुर पहुंचा, उसके साथमें बहुत सुन्दर जान पड़ता है। २ कुशकी जातिका एक भजन भी थे। अपने समीप विनीत भावसे बभ्र बाहन तृण जिसे बनकुस भी कहते हैं। को आते देख अर्जुनने इसका कुछ भी आदर नहीं किया बभूत (हिं स्त्री०) भूत या विभूति देखो। बरन् तिरस्कारसे कहा, 'तुम क्षत्रिय तथा वीर पुरुष कैसे, बभूवी (सं. स्त्री० ) बमोः शिवस्येय पत्नी, बभ -अण जो मेरे सामने युद्धार्थों बन कर नहीं आये! यह तुमने डीप, न वृद्धिः । दुर्गा। क्षत्रियोचित कार्य न कर प्रत्युत क्षत्रियविहित कार्य किया बभि ( स० पु. ) वभ इन्। १ वज्र । (त्रि०) २ भरण- है। अतएव मैं तुझे स्त्रोसे भो अधम समझता हूं।' कर्ता। ३ धारक। अर्जुनके इस प्रकार तिरस्कार करने पर उलूपो बहुत बभ ( स० पु० ) विभर्ति भवति वा भृ (कुभश्च । उण बिगड़ी। उसने बभ्र वाहनको अजनके साथ लड़ाई १२२३) इति कुर्द्धित्वञ्च। १ अग्नि, आग | २ शिव । ३/ करनेके लिये उसकाया। बभ्र वाहनने यक्षीय अश्व पकड़ विष्णु । ४ नकुल । ५ मुनिविशेष । ६ देशभेद । ७ सिता- | रखा। इस पर दोनोंमें युद्ध उटा । वभ्र वाहनने युद्ध में वरशाक । ८ खलति । ६ कपिलवर्ण । १० लोमपादसुत । अर्जुनको धराशायो बना दिया। चित्राङ्गदाको जब यह (पाग०६।२४।१) ११ देवोवृधसुत । १२ ययातिपुत्र द्र ह्य- समाचार मिला तब वह रणाङ्गणमें आई और उलूपी तथा के पुत्र । १३ पञ्चगन्धर्व पतिमेसे एक । १४ विश्वामित्र बभ्रुवाहनको कोश कर रोने लगी। उसने स्वामीके के पुत्रभेद । १५ विश्वगर्भ के पुत्र । ये यादवोंके अन्यतम साथ सती होनेका निश्चय कर लिया। पिता और माता थे। इनकी स्त्रोको शिशुपालने हर लिया था । यादवकुल के शोकसे बभ्र वाहनने भी प्रियमाण हो प्रत्योपवेशन ठान जब विनष्टप्राय हो गया, तब बभ, कृष्णके आदेशसे यादव दिया । पत्नियोंकी रक्षाफे लिये गये थे। इसी समय कुछ पुकैतोंने ___ उलूपीने इन लोगोंको प्राणत्यागको चेष्टा देख मिल कर इन्हें मार डाला। (भारत मापला. ४ अ.) नागलोकस्थित सञ्जीवनीमणिका ध्यान किया। ध्यान १६ कपिला गाय (नि०) १७ पिङ्गल वर्ण । १८ विशाल । करते ही वह मणि उलूपीके पास आ गई। नागकुमारी १८ कपिलवर्णयुक्त। उलूपोने उस मणिको ले कर बभ्र वाहनको पुकारा, 'वत्स! पभु क (सं० वि०) १ पिङ्गलवर्ण सम्बंधीय । (पु० ) २ शोक छोड़ दे। तुम अर्जुनको पराजित नहीं कर सकते। नकुल, नेवला। ३ कपिञ्जल, बदर। इंद्रादि देव भी उन्हें पराजय न कर सके हैं। तुम्हारे बर्धकर्ण ( स० वि० ) पिङ्गलवर्ण कर्णयुक्त । और पिता अर्जुनके प्रेम देखने के लिये मैंने यह माया- ब देश ( स० पु० ) जनपदभेद । आल रचा था। अर्जुन तुम्हारा पराक्रम जाननेके लिये बभ्रुधातु (स० पु०) बभ्रुः पिङ्गलो धातुः । १ स्वर्ण, सोना। ही यहां आये थे। मैंने भी इसोलिये तुम्हें युद्ध करनेके २ गैरिक धातु, गेरू! लिये उभाड़ा था। अतएव तुम्हें इस विषयके पापको बभ्र नीकाश ( स० वि०) कपिलवर्ण सदृश । अणुमात्र आशंका न करनी चाहिये । मैंने यह विध्य मणि बभ्रमालिन् (सं० पु० ) १ पिङ्गलवर्ण मालाधारी। २ ला दी है, इस मणिको ले जाओ और अर्जुनके पक्षस्थल मुनिविशेष। (नि.) ३ नकुलकी तरह मुंहवाला। पर रख दो । धनंजय मणिके ग्खने मालसे चट उठ स्बई बसु वाह (सं० पु०) महोदयपति, अर्जुनका पुन।। होंगे। वन वाहनने वह मणि अर्जुनकी छाती पर रख दी। बाहन देखो। सुप्तोत्थितके समान अर्जुन उठ खड़े हुये। माकाशसे