पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२०२

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१९६ बयावान-परई पुरस्कारका कुछ अंश जो बातचीत पक्की करनेके लिये पर देखो। २ वह आशीर्वाद सूचक वचन जो किसीकी दिया जाय । वयाना देनेके बाद देने और लेनेवाले दोनोंके प्रार्थना पूरी करने के लिये कहा जाय। ३ बल, शक्ति । लिये यह आवश्यक हो जाता है, कि वे उस निश्चयको ४ वटवृक्ष, बरगद । (वि०) ५ श्रष्ठ, अच्छा। पाबदी करें जिसके लिये बयाना दिया जाता है । बयाने- बर (फा० अव्य०) १ ऊपर । (वि.)२ श्रेष्ठ, बढ़ा चढ़ा। को रकम पीछेसे दाम या पुरस्कार चुकाते समय काट ३ पूर्ण, पूरा। (पु०) ४ एक प्रकारका कीड़ा जिसे ली जाती है। खानेसे पशु मर जाते हैं। बयाबान (फा० पु०) १ जगल । २ उजाड़। बरअंग (हिं. स्त्री० ) योनि। बयार (हिं स्त्री०) पवन, हवा । बरई-बिहार और बङ्गालवासी निम्नश्रेणीको एक जाति । बयारा ( हिं० पु० ) १ हवाका झोंका । २ तूफान। इस जातिके लोग बरई, बरजी, वारजीपी और लतावैध बयारी ( हि स्त्री० ) तयारी देखो। नामसे भी प्रसिद्ध हैं। पानकी खेती करना इनका जातीय वयाला (हिं० पु०) १ दीवारमेंका वह छेद जिससे झांक कर व्यवसाय है। ये लोग पानको खेती तो करते हैं, पर बाहरकी ओरकी वस्तु देखी जा सके। २ आला, ताख । बाजारमें तमोलीके जैसा खुदरा नहीं बेचते । जातीय ३ कोटको दीवारमें वह छोटा छेद या अवकाश जिसमें व्यवसाय एक होने पर भी बिहार और बङ्गालकी पर्छ से तोपका गोला पार करके जाता है। ४ पटायके जाति एक दूसरेसे बिलकुल पृथक् है । ये लोग आपसमें मीचेकी खाली जगह। ५ गढ़ों में वह स्थान जहां तो खान पान नहीं करते और न पुनकन्याका विवाह ही लगी रहती हैं। बयालिस (हि.पु.) १ चालीस और दोकी संख्या ।२ बरई जातिकी उत्पत्तिके सम्बन्धमें अनेक प्रवाद इस संख्याका सूचक अंक जो इस प्रकार लिखा जाता प्रचलित हैं। इन लोगोंका कहना है, कि देवपूजोप- है.--४२। (वि.) ३ जो गिनतीमें चालीससे दो अधिक। करणमें पानकी आवश्यकता देख कर पायोनि ब्रह्माने उनकी सृष्टि की । जातिमालामें लिखा है, कि ग्वाले और वयालीसवाँ ( हिं० वि० ) जो क्रममें बयालिसके स्थान : ताँती रमणीके संयोगसे इनकी उत्पत्ति है। वृहद्धर्म- पर हो, इकनालिसवें के बादका। पुराणमें ब्राह्मण और शूद्राणीके संयोगसे इनकी उत्पत्ति बयासी (हिं० पु.) १ अस्सी और दोकी संख्या । २ इस बसलाई गई है। किसी किसोके मतसे क्षत्रिय या संख्याका सूचक अंक जो इस प्रकार लिखा आता है--- कायस्थके औरस और शूदाणीके गर्भसे यह जाति उत्पन्न ८२।( वि० ) ३ जो सख्यामें अस्सीसे दो अधिक हो। हुई है। बरंग (हिं० पु०) १ एक छोटे कदका पेड़ जो मध्यप्रदेशमें साधारणतः पे लोग राढो, वारेन्द्र, नाथान भौर होता है । इसकी लकड़ी सफेद और मुलायम होती है। कोटा इन चार भागों में विभक्त हैं। भलम्याम, वारस्य, इमारत तथा खेतीके इससे अच्छे अच्छे सामान बनाये भरद्वाज, चन्द्रमहर्षि, गौतम, जैमिनी, कण्वमहर्षि, काश्यप, जाते हैं। इसकी छालके रेशोंसे रस्से भी बनाते हैं। २ मधकुल्य (मौहल्य), शाण्डिल्य, विष्णु, महर्षि और प्यास बख्तर, कवच नामक इनके कई एक गोल हैं। ये सब उचश्रेणी के हिन्दुभी बरगा (हि० पु० ) १ छोटी छोटी लकड़ियां जो छत के अनुकरण मात्र हैं। इन लोगों के मध्य सगोलमें भी पाटने समय धरनोंके वीचवाला अंतर पाटनेको लगाई। विषाह चलता है, पर समानोदक होने पर नहीं चलता। जाती हैं। २ छत पाटनेकी पत्थरकी छोटी पटिया जो इन लोगोंमें पालिका-विवाह प्रचलित देखा जाता प्रायः डेढ़ हाथ लबो और एक बिलश्त चौड़ी होती है। है। विधवा विवाह निषिद्ध है। स्त्रीके बन्ध्या होने पर वर ( स० क्ली० ) वर देखो। • पुरुष दूसरा विवाह कर सकता है। इनकी विवाह- वर । हिपु०) १ वह जिसका विवाह होता हो, दूल्हा। प्रणाली ठीक ब्राह्मण कायस्थ की-सी है। किसी किसी