पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२१६

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२१० बर्राना-वर्मावर बर्राना ( हि क्रि० ) १ व्यर्थ बोलना, फजूल बकना। २. सिंहासन पर बैठे। इनका भी शासनकार्य सराहनीय म्वनको अवस्थामें बोलना। न था। १८६४ ई०में उनकी मृत्यु हुई। पीछे उनके बर ( हिं० पु. ) भिड़ नामका कीड़ा, नितैया। बड़े लड़के रणजिसिंह सोलह वर्षको अवस्था राज- बर्गे ( हि पु० ) पक पक्षीका नाम। सिंहासन पर अधिरूढ़ हुए। ये ही वर्तमान राजा हैं वर्वाकशाह --बङ्गाधिप नाशिरशाहके पुत्र । इन्होंने १४५८ और गणा इनकी उपाधि है । गृटिश सरकारसे इन्हें । ईमें वङ्गासिंहासन पर बैठ कर १७ वर्ष तक गज्य किया। सलामी तोपें मिलती हैं। विलक्षण दक्षताके साथ राज्यशासन करके इन्होंने अच्छा इस राज्यमें इसी नामका १ शहर और ३३३ प्राम नाम कमा लिया था। आठ हजार निप्रो और आवि. लगते हैं। जनसंख्या ८० हजारसे ऊपर है जिनमेंसे सिनिया देशीय क्रोतदासोंको ला कर इन्होंने अपना सेना- सैकड़े पीछे ५० हिन्दू हैं और शेषमें मुसलमान तथा दल परिवर्द्धित और सुशिक्षित किया था। ८७६ हिजरी ऐनिमिष्ट आदि हैं । यहांकी प्रधान उपज ज्वार, मर्का, तिल, (१.४१४ ई० ) में इनका देहान्त हुआ। चना और गेह्र है। यह राज्य चार परगनोंमें विभक्त है। बर्वानी ..१ मध्यभारतके भुपावर एजेन्सीके अन्तर्गत एक हर एक परगना कमासदारके अधिन है । राजस्व चार मामन्तराज्य । यह अक्षा० २१३६ से २२७ उ० तथा लाखसे ऊपर है । राजाको किसी दरबारमें कर नहीं देना देशा० ७४ २८ से ७५ १६ पू०के मध्य नर्मदानदीके - पड़ता। इन्हें गांजा, भांग, अफीम बेचनेका अधिकार है। बायें किनारे अवस्थित है। भूपरिमाण ११७८ वर्गमील पहले पहल यहां १८६३ ई०में एक स्कूल खोला गया। है। इसके उत्तर धारराज्य, उत्तर-पश्चिम अलीराजपुर, पीछे १८६१ ई० में एक दूसरा स्कूल स्थापित हुआ जिस- पूर्व इन्दोर गज्यका कुछ अंश और दक्षिण तथा पश्चिम का विक्टोरिया-हाई-स्कूल नाम रखा गया । अभी कुल में बम्बईका खांदेश जिला है। यहांके सरदार उदयपुरके मिला कर १६ स्कूल और ६ चिकित्सालय हैं। शिशोदीय राजपत वंशके हैं। १४वीं शताब्दी में इन्होंने यहां आ कर राज्य बसाया। वर्तमानराजके ऊर्द्ध तन उ० तथा देशा० ७४५४ पू० नर्मदाके बाये किनारे अव- १५वीं पीठीके परशुरामने अपने भुजबलसे दिल्लीश्वरकी स्थित है । जनसंख्या छः हजारसे ऊपर है। कहते हैं, कि सेनाको मालवराज्यसे मार भगाया था। पीछे वे १६५० ईमें राणा चन्द्रसिंहने इस राज्यको स्थापन पकड़े गये और दिल्ली ला कर इस्लाम धर्ममें दोक्षित किया। नगरसे पांच मीलको दूरी पर भवनगंज नामका हुए। इसके बाद वे अपने राज्यमें लौट आये सही, पर एक पर्वत है जिस पर बहुतसे जैन-मन्दिर देखनेमें आते सिंहासन पर बैठे नहीं। अपने पुत्र भीमसिंहको सिंहा हैं। प्रतिवर्ष जनवरी मासमें मन्दिरके पर्वोपलक्षमें एक मन पर बिठा कर लोकलजाके भयसे वे मौन हो कर मेला लगता है। यहां स्टेट-अतिथि-भवन, अस्पताल, सर दिन बिताने लगे। उनका 'समाधि-स्तम्भ' अवसगढ़में कारी डाकघर और टेलीग्राफ, एक कारागार तथा एक आज भी देखनेमें आता है । इधर उधर पड़े हुए भग्नदुर्ग, स्कूल है। श्रीहीन नगर और जलनालीसमूह इस गज्यकी प्राचीन बर्वाला---१ पजाबप्रदेशके हिसार जिलेकी एक तहसील। समृद्धिका निदर्शन है। विगत शताब्दीमें महाराष्ट्रप्रवाह- भूपरिमाण ५८० वर्गमील है। से इस राज्यको पूर्व-श्री नष्ट हो गई है। १८६० ईमें २ उक्त जिलेका एक नगर और तहसीलका सदर । इस वंशके सरदार यशोवन्त सिंहकी अक्षमता देख इसके चारों ओर पड़ा हुआ भग्नावशेष इसकी पूर्व ब्रिटिश सरकारने १८७३ ई० तक इस राज्यका शासन- समृद्धिका परिचय देता है। आज भी यहां पहलेके जैसा कार्य अपने तत्वाधानमें रखा। पोछे यशोवन्तने पुनः । वाणिज्यस्रोत बह रहा है। यहांके प्रधान आधिवासी शासनभार ग्रहण कर १८८०ई० तक राज्य किया। उनके सैयद हैं। ये ही लोग पार्श्ववत्तीं भूभागके कर्ता हैं। मरने पर १८८० ई०में उनके भाई इन्द्रजिसिंह राज- बर्मावर---पञ्जाबके चम्बाराज्यके अन्तर्गत एक प्राचीन