पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२१८

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२१२ बहिशुष्मन्-बल बर्हिशुष्मन् ( स० पु० ) बहिः कुशः बलमस्य। पहि, मृमण, तविषी, शुष्म, शुष्ण, भूष, दक्ष, बीठ छु, ज्यौल, आग। सह, यह, बध, वर्ग, घृजन, वृक्, मज मना, पौत्स्यानि, बर्तिमद् ( म० पु० बर्हिपि अग्नौ, कुशासने या सीदन्ति | धर्णसि, द्रविण, स्यन्द्रास, शम्बर । (घेदनिघण्टु ) गर्भमें सद-विप् । पितृगणविशेष, पित्राधिष्ठातृ देवगण । बालकके ६ मासमें बल आ जाता है। ४ गन्धरस । ५ पितृ मान आदि के उद्देश्य से तर्पण करने में पहले इन्हींके रूप। ६ शुक्र । धातुओंका जो मुख्य तेज है वही ओज उद्देश्यमे तर्पण करके पीछे पितरोंका तर्पण करना होता | वा बल कहलाता है । ७ वपु, शरीर। ८ पल्लव, कोपल । है । इन पितरोंके उद्देश्यसे किसी किसीने तीन बार और रक्त, खून, ।१० काक, कौवा । ११ बलदेव, बलराम । किसोने एक बार तर्पण करनेको बतलाया है। १२ बरुणवृक्ष। सद्योबलकर और सद्योबलहर द्रष्य- "अग्निस्वात्तांस्तथा मौम्यान् हविष्मन्तस्तोथष्मपान् । __“सद्योबलकरास्त्रीणि वालाभ्यङ्ग सुभोजनम् । सुकालिनो बर्हिषद आज्यपांस्तर्पयेत्ततः॥" सद्योबलहरास्त्रीणि, अध्वानं मैथुनं ज्वरः॥" (आहिकतत्त्व ) तर्पण देखो। ( वैधक ) २ पृवंशज हविर्द्धानके पुत्रका नाम । बालास्त्रीसंभोग, सैलमर्दन और उत्तम भोजन ये सद्यो- बहिषद् . म पु०। बर्हिस सद-विप पृषोदरादित्वात् बलकर तथा अधिक भमण, मैथुन, ज्वर ये तीन सद्यो- माधुः। वरिषद् शब्दार्थ। बलहर हैं। पूर्वोक्त तीनोंके सेवनसे बल बढ़ता है और वहिक ( स० वि० ) १ वालक नामक गन्धद व्य। २ अन्तके तीनोंसे बलका क्षय होता है। नर्भयुक्त। विद्या, अभिजन, मित्र, गृद्धि, सत्त्व, धन, तप, सहाय, व . ० . ति भाग। वीर्य और दैव पे १० बल हैं। जिसके ये सब होते हैं बष्ट ( ० १ हावेर । (त्रि.) २ कुशस्थित ३/ उसके दश प्रकारके बल होते हैं और वही व्यक्ति बलवान् वृद्धनन। कहलाता है। सुश्रूतमें बलके सम्बन्धमें यों लिखा है- वाई मत् (स त्रि०) १ कुशयुक्त । २ यज्ञयुक्त जमान । रससे ले कर वीर्य पर्यन्त सप्तधातुओंके जो उत्कृष्ट वर्षिय ) वहिप दत्त वर्हिपि हितमिति वा यत् । तेज हैं, आयुर्वदके शास्त्रों में उसी तेज या ओजको बल वः । गड़ जा कुमर रखा जाता है । बतलाया है । बलके होनेसे शरीर पुष्ट और मजबूत होता बहि पद् । सं० पु० ) वर्हिषद् । है, सब काम करनेमें उत्साह दिखाई देता है, शरीर प्रसन्न बहिण्ठ ( स त्रि० ) वहिष्ठ । रहता है और बाह्य तथा अभ्यतरकी इद्रियां बेरोकटोक बर्हिस् । स क्ली० ) १ कुश । २ दोप्ति । ३ अग्नि । अपना काम करने लगती हैं। (सुश्रुत २५ अ०) पलंद ( ( फा० वि० ) ऊंचा। शरीरस्थ ओज अथवा बल सोमगुणविशिष्ट, स्निग्ध, बलंबी (हि पु०) भारतके अनेक भागोंमें मिलनेवाला एक श्वेतवर्ण, शीतल, स्थिर, सरस, मृदु और सुगंधित है। पेड़। इसके फल खट्टे होते हैं और अचार के काममें यह शरीरमें गुप्त रूपसे रहता है, और इससे प्राणको आते हैं। फलोंके रससे लोहे परके दाग भी साफ रक्षा होती है। यह शरीरके सभी अवयवों में व्याप्त हो किये जाते हैं । इसकी लकड़ीसे खेतोके सामान कर रहता है। इसके नहीं रहनेसे शरीर शीर्ण बन बनाये जाते हैं। जाता है। सब धातुओंसे जो सार निकलता है, वही बल (स० क्लो०) बलते विपक्षान् हन्तीति बल-पचायच ।। भोज अथवा बल है। मानसिक भौर शारीरिक क्लेश, १ सैन्य, सेना। २ स्थौल्य, मोटोपन। ३ सामय, क्रोध, शोक, एकाग्रचित्तता, श्रम और क्षुधा भादि कारणों- ताकत । पर्याय- द्रविण, तर, सह, शौर्य, स्थामन्, से बलका नाश होता है। बलके नाशसे सेज भी जीवोंसे शुष्म, शक्ति, पराक्रम. प्राण, महस, भष्मन्, उजस । एक ओर किनारा कर जाता है। चैदिक पर्याय-ओजस्, पाजस्, शव, तर, त्वक्ष, श, बाध बलके बिकार भौर क्षयसे संधिस्थानों में शिथिलता,