पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२१९

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शरीरमें अवसन्नता भी जाती है तथा वात, पित्त और हैं। ब्रह्मचर्य, व्यायाम, पुष्टिकर भोजन ही सदा श्लेष्माका प्रकोप होने लगता है। शरीर किसी प्रकारकी बिधेय है। पुष्टिकर और क्षीणकर दोनों प्रकारके दृष्य क्रिया करने में लायक नहीं रहता । बलके विकारसे शरीरमें खानेसे शरीरमें अन्नरस संचालित हो सर्व धातुओंकी स्तब्धता, भारीपन, वायुजन्य सूजन, वर्णको विभिन्नता, ! समान भावसे पुष्टि होती है। शरीरमें यदि सय धातु ग्लानि, तंद्रा, निद्रा आदिके लक्षण दीखने लगते हैं। बल- समान भावसे हों, तो शरीर स्थूल और कृश न हो कर क्षय होनेसे मूळ, मांसक्षय, मोह, प्रलाप और मृत्यु तक मध्यभ भावमें रहता है, सब कार्योंमें समर्थ होता है तथा हो जाती है। । क्षधा, पिपासा, शोत, गमी आदि सह सकता है। शरीरस्थ बलके तीन प्रकार दोष होते हैं. च्यापन, विस्र सा दोष, धातु आदिका कोई निरूपित परिमाण नहीं है। इस और क्षय । शरीरकी शिथिलता, अवसन्नता और श्रान्ति, लिये शरीरमें ये समान भावसे हैं या नहीं उसका अन्य वायु, पित्त, कफकी विकृति तथा स्वभावसे शरीरका कारणोंसे निर्णय नहीं किया जा सकता। शरीर जब इन्द्रिय कार्य जिस परिमाणमें होना चाहिये उस परिमाण- स्वस्थ हो तभी जानना चाहिये, कि तीनों समान हैं। में नहीं होना, विस्र सा होने पर ये सब लक्षण होते हैं। शरीरकी इदि यां यदि अप्रसन्न मालूम पड़े तो जानना शरीरका भारीपन, स्तब्धता, ग्लानि, शारीरिक वर्णको चाहिये, कि बलका ह्रास हुआ है। शरीरमें बल, दोष विभिन्नता, तन्द्रा, निद्रा और वायुजन्य शोफ आदि धातुओंके समानभाव रट्नेसे अन्तःकरण और इन्दि य- बालके व्यापन्न होने पर ये सब लक्षण होते हैं। बलके प्रवृत्ति प्रसन्न रहती है। (भावप्र और सुश्रु।) क्षय होने पर मूर्छा, मांसक्षय, मोह, प्रलाप और अज्ञान मनुष्यमें जितना भी बल है उनमें दैवबल ही सबसे ये सब लक्षण अथवा मृत्यु तक हो जाती है। बलके प्रधान है। मानय यदि दैवबलसे बलीयान हो, तो वह बिनसा या व्यापद होने पर नाना प्रकारके अविरुद्ध कठिनसे कठिन काम भी कर सकता है। ब्रह्मवैवर्त- प्रतिकारोंसे उसे स्वाभाविक अवस्थामें लावे। अविरुद्ध पुराणके गणेशखण्डमें लिखा है . क्रियाका यहां पर तात्पर्य है, जिसके सेवनसे कैसा भी विकार उत्पन्न न हो। अवलस्य बलं राजा वालस्य मदितं बलम् । भावप्रकाशके मतसे बलके लक्षण रससे शुक्र पर्यन्त बलं मूर्खस्य मौनन्तु तस्करस्यानृतं बलम् ॥ पुष्टिहेतु समस्त कार्योंमें पटुता होनेको बल कहते हैं। ( ब्रह्म वर्तपु. । णे खं० ३५ अ०) बलक्षयके लक्षण---देहकी गुरुता, स्तब्धता, मुख जो बलहीन हैं उनके राजा ही बल है। बालकका म्लान, बिवर्णता, तंद्रा, निद्राधिक तथा वातजन्य शोथ रोना, मूर्खका मौत तथा चोरका असत्य ही बल है। आदि लक्षणोंसे बलक्षय जानना चाहिये ! . इस प्रकार क्षत्रियका युद्ध, वैश्यका वाणिज्य, बलवृद्धिके हेतु-जिन द्रव्योंसे अग्नि और दोषोंकी भिक्षककी भिक्षा, शूदका विप्रसेवन, वैष्णवकी हरिभक्ति समता हो धातु पुष्ट होता है उन्हीं द्रव्योंके सेवनसे बल- और हरिके प्रति दास्य, खलके प्रति हिंसा, तपस्वीकी की वृद्धि होती है। दोष, धातु और मल इनमेंसे किसी तपस्या, वेश्याका भेष, स्त्रीका यौवन, साधुका सत्य और पकका क्षय होने पर जिन द्रव्योंसे उसकी पूर्ति हो उसी पण्डितकी विद्या ही एकमात्र बल है। इस प्रकार सभी भोजनको अभिलाषा सबको होती है। क्षीण व्यक्तिको मनुष्यके बलका विषय अभिहित है। विस्तार हो जानेके जिस द्रब्यके खानेकी इच्छा हो वही द्रव्य यदि उसे | भयसे नहीं लिखा गया। बलदेव दे दो। खानेको मिले तो शारीरिक क्षयप्राप्त अंशका पूरण होता है। उस समय अपने आप ही बलकी पूर्ति हो जाती १३ वायुकर्तृक प्रदत्त कार्तिकेयके एक अनुचरका है। रसोंके न्यूनाधिक होनेसे ही शरीर कृश और नाम । १४ श्रीरामचन्द्र के पुत्र कुशके वंशमें उत्पन्न परियात्र स्थूल होता है। स्थूलता या कृशता दोनों ही निदनीय के एक पुत्रका नाम । १५ दनायुके पुत्रका नाम । १६ मेघ, Vol. xv: 54