पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२२१

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बलदण्ड-बलदेवविद्याभूषण २१५ अग्निका भिन्न भिन्न नाम रखा गया है। पौष्टिक कममें रेवतीके साथ इनका विवाह हुआ। यदुकुल ध्वस अग्निका नाम 'बल' है। इस बलद नामसे ही अग्निका होनेके समय जब ये योगासन पर बैठे, तब इनके शरीर- होम करना होता है। "पौरिके बलदः स्मृत: ( तिथितस) छिद्रसे रक्तवर्ण सहन मुखधारी एक वृहत् श्वेत सर्प ३ वृषभ, साढ़। ४ पर्पटक, पित्त पापड़ा । ५ अश्वगन्धा। निकल कर समुद्रमें चला गया। इस समय बलरामका ६ बलदाता, बल देनेवाला। शरीर प्राणशन्य हो गया था। कुरुकुलपति दुधिन इनके बलदण्ड ( स० पु० ) कसरत करनेके लिये लकड़ीका : शिष्य थे। कृष्ण देखो। बना हुआ एक ढांचा। इसमें एक काठके दोनों ओर बलदेवकी पूजा करनेमें इस प्रकार ध्यान करना होता कमानको तरह दो तिरछी लकड़ियां लगी होती हैं। है। यथा-- इसे गट्ठदण्ड भी कहते हैं। बलदेव द्विवाहुश्च शङ्ककुन्देन्दुसन्निभम् । बलदा (सं० स्त्री० ) अश्वगन्धा। वामे हलायुधधर मूषल दक्षिणे करे । बलदाऊ (हि. पु०) १ बलदेव, बलराम । हालालाल नोलवस्त्र हेलावन्त स्मरेत् परम् ॥" बलदीनता ( स० स्त्री० ) बलस्य दीनता। ग्लानि, २ वायु, हवा।। लजा। बलदेव--युक्तप्रद शक मथुग जिलेका एक शहर। यह बलदेव (स० पु०) बलेन दीव्यतीति दिव-अच् । वलराम। अक्षा० २७ २४ उ० तथा देशा० ७७ ४६ पू०के मध्य इन्होंने अनन्तदेयके अंशसे जन्म ग्रहण किया था, इसीसे अवस्थित है । जनसंख्या तीन हजारसे ऊपर है। वे शेषावतार समझे जाते हैं। (भारत १६७१५१) इस नगरक ठोक मध्यस्थलमै एक मन्दिर और सामने विष्णुपुराणमें इस प्रकार लिखा है -- गोकूलमें रोहिणी और ममुद्र नामक एक पुण्यसलिला पुष्करिणो है । देव. नामको वसुदेवके एक और पत्नी थी। देवकीके जब मूत्तिदर्शन और दीधिकामें स्नान करने के लिये अनेक सातवां गर्भ हुआ, तब महामायाने क'सके भयसे उस तीथ यात्री आते हैं। माल भरमें यहां दो मेले लगते गर्भ को रोहिणोके उदर में रख दिया। इस प्रकार गर्भ हैं। सङ्कर्षणके लिये उस गर्भ से जो पुत्र उत्पन्न हुआ, वह बलदेवक्षेत्र -उड़ीसा अन्तर्गत एक तीर्थ स्थान । इस पीछे सपण कहलाया। इसीसे बलदवका दूसरा नाम तुलसीक्षेत्र भी कहते हैं। यह पवित्र स्थान कटक सङ्कर्षण भी है। (विष्णुपु० ५।२ अ०) ब्रह्मवैवर्त पुराणमें : जिलेके वत्त मान केन्द्रपाड़ाके अन्तभुत है। उड़ीसाके नामनिरुक्तिके विषयमें लिखा है, कि गर्भ सङ्कर्षणके वैष्णव इसे पवित्र स्थान समझते हैं । तुलसोक्षेत्र कारण सङ्कर्षण, वेदमें अन्त नहीं होनेके कारण अनन्त, माहात्म्यम इस स्थानका दे यमाहात्म्य वर्णित है। बलोद्र कके कारण बलदव, हल धारणके कारण हली, बलदेवविद्याभूषण वङ्गन्देशीय एक विख्यात ब्राह्मण नीलवास परिधान करनेके कारण शितिवास, मूषल अस्त्र पण्डित । करीब तीन मौ वर्ष हुए ये जीवित थे । वैष्णव- होनेके कारण मूषली, रेवती पत्नी होनेके कारण रेवतीरमण दर्शनादिमें उस समय इनके मुकाबलेका कोई भी न था। और रोहिणी गर्भ सम्भूत होनेके कारण इनका रौहिणेय : इनका प्रण था, कि वे उन्हीं के शिष्य बनेंगे जो उन्हें तर्क नाम पड़ा था । ( ब्रह्म वर्तपु० श्रीकृष्ण जन्म ० १३ अ०) में पराजित कर दंगे। इसो उद्देशसे वे दिग्विजयको ___ नन्दालयमें इन्होंने जन्मग्रहण किया। गोकुलमें निकले। वङ्ग, मिथिला, काशी आदि प्रधान प्रधान स्थानों- आ कर महामुनि गर्ग द्वारा इनका नामकरण हुआ। के पण्डित इनसे परास्त हुए । आखिर ये भ्रमण करते नन्दालयमें श्रीकृष्णके साथ ये एकत्र पाले पोसे गये। करते वृन्दावन पहुंचे। यहां प्रसिद्ध टीकाकार विश्वनाथ पीछे अकरके आने पर बलराम कृष्णके साथ मथुरा चक्रवत्तींसे भक्तिशास्त्रके विचारमें परास्त हो इन्होंने पधारे और कसको मार कर वहां कुछ दिन ठहरे । अन- ' उन्हीं का शिष्यत्व ग्रहण किया। तीक्षण प्रतिभावलसे न्तर सान्दीपन मुनिके निकट इन्होंने विद्याभ्यास किया। थोड़े हो समयके अभ्यन्तर ये वैष्णवशास्त्रमें व्युत्पन्न