पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२२४

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बलभद्रमूरि-बलरामदास ममय इन्होंने अंगरेजों के विरुद्ध घमसान युद्ध बलर--पआबके अन्तर्गत एक प्राचीन स्थान। एक किया था। प्राचीन स्तूपके लिये यह स्थान बहुत कुछ विख्यात ____२ अयोध्याके प्राचीन हिन्दू राजवंशके एक राजा। है। स्तूपकी ऊँचाई प्रायः ५० फुट और व्यास उनके अधीन प्रायः लाखसे ऊपर राजपूत सेना थी। ४४ फुट है। इसके पास ही १७० फुट स्थानके मध्य १.७८०६ में उन्होंने लखनऊके नवाब वजीरकी अधीनता और भी कितने छोटे छोटे स्तूप तथा सङ्घारामादिके अस्वीकार को। दो वर्ष लगातार युद्ध के बाद वे मुसल ध्वंसावशेष देखनेमें आते हैं। इससे अनुमान किया मानोंके हाथ परलोक सिधारे । जाता है, कि बौद्धाधिकारमें यह स्थान धर्मालोचनाके लिये बलभद्रसूरि -प्रमाणमञ्जरोटीकाके प्रणेता। मशहूर था। बलभद्रसशक ( स० पु० ) धूलीकदम्ब । बलगम (मं० पु०) रम-भावे घ, बलैव गमो रमणं यस्य । वलभद्रा (म. स्त्री०) बलभद्र टाप । १ कुमारी । २ लाय श्रीकृष्ण के बड़े भाई जो रोहिणीसे उत्पन्न हुए थे। माण नामकी लता। ३ वनजाता गो, जंगली गाय । ४ . बलदेव देखो। नीलगाय। वलभद्रिका ( सं स्त्री० ) वलभदा-स्वार्थे कन् अत इत्वं । बलरामदास -श्रीचैतन्यचरिस्तामृतके ११वें परिच्छे दमें लिखा है, कि बलरामदास नित्यानन्दप्रभुके भक्त थे। वायमाणा नामकी लता। बलभी .१ मालव राज्यके उत्तर काठियावाड़का एक प्राचीन वैष्णव-बन्दनामें जो 'सङ्गीतकारक' है वह इन्हींका बनाया नगर। इसका वर्तमान नाम बाला है। चीनपरि- हुआ है। अतएव पदकर्ता बलरामदास नित्यानन्दके ब्राजक यानवगने यह नगर देख कर लिखा है, कि 'गण' हैं । बलरामने अपनी पदावलीमे अपने प्रभुके रूप- यहां सैकड़ों मघाराम और देवमन्दिर थे। हीनयान-। गुणका अच्छी तरह वर्णन किया है। मम्प्रदायी मम्मनीय शाखाके प्रायः ६ हजार श्रमण उस प्रेमविलास एक प्राचीन ग्रन्थ है। ये ही उसके समय यहां धर्मचर्चा करते थे। उन्होंने यहांका अशोक- रचयिता हैं। उस प्रन्थमें इनका जो आत्मपरिचय है स्तूप भो देखा था। उस समय मालवराज शिलादित्य- उससे जाना जाता है, कि बलरामकी माताका नाम बंशीय ध्रु वभट्ट नामक एक क्षत्रिय राजा यहांका शासन सौदामिनी और पिताका नाम आत्मारामदास था। करते थे। राजधानीके पास ही एक सुवृहत् सघाराम ये जातिके वैश्य थे और श्रीखण्डमें इनका घर था। इनका था जिसमें गुणमति और स्थिरमति नामक दो बोधि । गुरुदत्त नाम था नित्यानन्दास। 'भेकधारी' वैरागी मत्त्व रहते थे। सम्प्रदायमें ये गुरुदत्त नामसे प्रसिद्ध हैं। किन्तु प्राचीन २ सह्यादि पर्वत पर अवस्थित एक नगरी। प्रन्थादि देखनेसे मालूम होता है, कि पूर्व समयमें बलभी (हि.स्त्री०) वह कोठरी जो मकानके सबसे ऊपर-: वोकेटो नाम रखते थे। शान्त स्वर वीराखिर वाली छत पर बनी हो, चौबारा। और प्रेमदासका नामोल्लेख किया जा सकता है। बलभृत् (म त्रि०) बल विभर्ति भृ-क्किप तुक च ।। बलधारो। श्रीनित्यानन्द प्रभुके दो स्त्री थी, वसुधा और जाहवा । बलमोटा (सस्त्री० ) वृक्षविशेष, जयन्ती। इसका गुण जास्वाद वी शिष्यादि करती थीं। उपयुक्ता स्त्री पुरुषको कटु, तिक्त, शीत, कण्ठशोषक, लघु, कफनाशक, मद- भी शिष्य बना सकती हैं, यह गुरुपरिवारमें सर्वत्र प्रच- गन्धि, मूत्रकृच्छ विष और पितनाशक माना गया है। लित है। अतएव बलराम (जाहवा-शिष्य होनेके कारण बलम्बिद---बम्बई प्रदेशके धारवार जिलेका एक गण्ड प्राम। ही ) नित्यानन्द 'परिवार' के हैं, इसोसे चरितामृतमें यहां विषपरिहरेश्वर और बासवका एक मन्दिर है। नित्यानन्द-शाखा-वर्णन परिच्छेदमें इनका नाम देखने में उसके गान संलग्न पांच शिलालिपियों से सर्व प्राचीन आता है। कवि शानदास भी इसी प्रकार जाहवाशिष्य शिलालिपि ७६ सम्बत में उत्कीण हुई है। थे। ज्ञानदास २द देखो।