पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२३०

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२२४ बलास-बाल जिसमें कफ और वायुके प्रकोपसे गले और फेफड़े में। "अध्यापन ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम् । सूजन तथा पीड़ा होती है, सांस लेनेमें कष्ट होता है। होमो दैवो बलिभौंतो नृयज्ञोऽतिथि पूजनम् ॥ पलाम ( स० पु०) बलमस्यति क्षिपति अम-अण । १ पञ्चैतान् यो महायज्ञान न हापयति शक्तितः। कफधातु । २ कगठगत रोग । बलाश देखो। स गृहेऽपि वसन्नित्यं सूनादोनै लिप्यते ॥" बलास ( हिं० पु० ) बरुना नामका पौधा । (मनु ३१७०-७१) बलासक ( स० पु०) शुक्लगत नेत्ररोग। गृहस्थोंको चाहिये, कि वे प्रतिदिन बलिया करें। बलासप्रथित ( स० क्ली० ) चक्ष रोगभेद । गृहस्थको सदा ढाचित्त और देवताको पूजामें तत्पर बलासम (सं० पु० ) बुद्ध । हो कर होम करना चाहिये । होमके बाद पूर्वादि दिशाओं- बलासिन् ( स० वि० ) श्वासरोगयुक्त, जिसे श्वासरोग में बलि देनी चाहिये। अन्न ले कर पहले पूर्व दिशामें हुआ हो। 'इन्दाय नमः' 'इन्द्रपुरुषेभ्यो नमः' दक्षिण दिशामें बलाहक ( स० पु० ) १ मेघ, बादल । २ मुस्तक, मोथा। यमाय नमः' 'यमपुरुषेभ्यो नमः' पश्चिम दिशामें ३ शाल्मलीद्वीपस्थ पर्वतविशेष । ४ दैत्यविशेष । ५ 'वरुणाय नमः' 'वरुणपुरुषेभ्यो नमः' उत्तर दिशामें नागविशेष । ६ सर्पविशेष । ७ कल्किदेवके रमागर्भ 'सोमाय नमः' 'सोम पुरुषेभ्यो नमः', इस प्रकार चारों जात पुत्रभेद। कल्किपत्नी ग्माने बैशाखी शुक्लाद्वादशीके दिशाओं में बलि देनी चाहिये । ऐसा करनेके बाद मण्डल- दिन जमदग्निके उद्देश्यसे व्रत करके महाबलिष्ट दो पुत्र के द्वारमें यों कहे 'मरुद्भ्यो नमः' जलमें 'अद्भ यो नमः' लाभ किये जिनका नाम मेघपाल और बलाहक था। ये मूसल वा ओखली में 'वनस्पतिभ्यो नमः' इस प्रकार बोल दोनों सर्वदा देवताओंके उपकार, यक्ष, दान और तपस्या कर बलि देनी पड़ती है। वास्तु पुरुषके शिरःप्रदेशमें, उत्तर में लगे रहते थे। ( कल्किपु. २१.)८ श्रीकृष्णका पूर्व दिशामें लक्ष्मीको 'श्रिये नमः' ऐसा कह कर, फिर रथाश्वविशेष, कृष्णचन्द्र के रथके एक घोड़े का नाम। ६. उसके पाददेशमें 'भद्रकाल्य नमः' घरमें ब्रह्माको 'ब्रह्मणे जयद्रथ के भातृविशेष। १० नदविशेष । ११ कुशद्वीप नमः' वास्तु देवताको 'वास्तोस्पतये नमः' ऐसा कह कर स्थित पर्वतविशेष । १२ तारापीड़ राजाके स्वनामख्यात बलि देनी होती है। 'विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः' 'दिवा- सेनापति । चरेभ्यो भूतेभ्यो नमः' नक्तंचारिभ्यो नमः' ऐसा कह कर बलाहकन्द ( स० पु० ) बलमाह्वयतीति बलाहस्तादृशः समस्त देवताओं तथा दिवाचर और राठि.चर भूतोंके कन्दः। गुलञ्चकन्द। उद्देश्यसे ऊपर आकाशमें बलि फेक दी जाती है। बलि (म० पु० : वल्यते दीयते इति बल-दाने (सर्व बाकी बची हुई बलिको अपने पृष्ठदेशमें 'सर्वात्मभूतये धातुभ्यो इन् । उण ४।१।१३ ) इतीन् । १ कर, भूमिको नमः' कह कर सब भूतोंको बलिप्रदान करना चाहिये। उपजका वह अंश जो भूस्वामी प्रति वर्ष राजाको देता है। अन्तमें सम्पूर्ण बलि देनेके बाद जो अन्न बचे उसे दक्षिण हिन्दू-धर्मशास्त्रों में भूमिको उपजका ६ठां भाग राजाका दिशामें मुख कर और प्राचीनावीति हो पितरों- अंश ठहराया गया है। इसीको बलि वा कर कहते हैं। को 'स्वधा पितृभ्यः' बोल कर बलि देनी चाहिये। बलि २ उपहार, भेट। ३ पूजा-सामग्री, वह सामग्री जिससे देनेके बाद वह अन्न कुत्ते, पतित, कुस्से आजीविका देवताओंको पूजा जाता है । ४ चामरदण्ड, चंवरका करनेवालेको, पापरोगियोंको, कौवा तथा कृमियोंको देना दंडा । ५ बलिवैश्व नामक पञ्च यशोंमें भूतया। गृहस्थ- चाहिये। उस अन्नको भूमि पर इस प्रकार रक्खे जिससे को प्रति दिन पांच यक्ष करने पड़ते हैं। इससे प्रतिदिन उसमें धूलि न लगे। जो ब्राह्मण प्रतिदिन इस विधि पञ्चसूनाजनित पाप छूट जाता है। अतएव यह यज्ञ द्वारा अन्नसे सम्पूर्ण भूतोको बलि देते हैं वे मृत्युके बाद प्रत्येक गृहस्थका कर्त्तव्य बतलाया गया है। इन्हीं पांच दिव्य शरीरको प्राप्त कर परलोक जाते हैं। इस प्रकार यशोंमें जो भूतयश नामका यह है उसे बलि कहते हैं। बलि देनेके बाद अतिथियोंको भोजन करा कर पीछे आप