पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२३१

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___ तथान्नमस्ति। बलि २२५ रायः भोजन करे। .( भनु म. ) वैश्वदेवबलि बुधको क्षोरान्न, बृहस्पतिको दध्योदन, शुक्रको धृतौ- साग्निक ब्राह्मणको अवश्य कर्तव्य है। दन, शनिको खिचड़ी, राहुको बकरेका मांस एवं केतुको काम्यबलिमें बलिके पश्चिम भागमें जलसे उत्तराम चित्रौदन बलिमें दिया जाता है। जिनकी जो बलि है रेखा खींच कर इस मन्त्रसे बलि देनी चाहिये । यथा-- उनको वही बलि देनेसे वे प्रसन्न होते हैं। देवताओंको "ऊ देवा मनुष्याः पशवो वयांसि सिद्धाः सय जिन जिन उपायों द्वारा प्रसन्न एवं पूजन किया जाता है शोरगदैत्य संघाः। वह सब बलि कहे जाते हैं। प्रताःपिशाचास्तरवः समस्ता ये चानमिच्छन्ति कालिकापुराणमें वलिका विषय, उसका क्रम एवं मया प्रदत्तम्॥ स्वरूप अर्थात् जिस प्रकार रुधिरादि द्वारा देवियां प्रसन्न पिपीलिकाः कीटपतङ्गकाद्या बुभुक्षिताः कर्म होती हैं उसका वर्णन इस प्रकार किया है- साधकों- निबंधदेहाः। को चाहिये, कि वे बलिदानका क्रम जैसा वैष्णवी कल्प- पयान्तु ते तृप्तिमिद मयान तेभ्यो विसृष्टः । तंत्रमें कहा गया है वैसा हो ग्रहण करें। पक्षी, कच्छप, सुखिनो भवन्तु ॥ ग्राह,मत्स्य, नौ प्रकारका मृग, भैसा, बकरा, भेडा, गाय, पेषां न माता न पिता न बन्धु¥वान्नसिद्धिर्न बकरी, रुरु, सूअर, कृष्णसार, गोधिका, शरभ, सिंह, शार्दूल, मनुष्य और अपने शरीरका खून इन्हें चण्डिका तत्तृप्तपेऽन्नं भुवि दत्तमेतत् प्रयान्तु तृप्ति और भैरवीको प्रसन करनेके लिये बलिमें देना चाहिये । मुदिता भवन्तु॥ इन बलियोंको देनेसे सम्पूर्ण इच्छाओंकी पूर्ति एवं ॐ भूतानि सर्वाणि तथानमेतदहश्चविष्णुर्न । मृत्युके बाद स्वर्गकी प्राप्ति होती है। महामाया दुर्गाजी यतोऽन्य दस्ति। मत्स्य और कच्छपके रुधिरकी बलिसे एक तस्मादहं भूतनिकायभूतमन्नं प्रयच्छामि मांस, प्राहादिके रुधिरसे तीन मास, मृग और भवाय तेषां ॥ मनुष्योंके खूनसे आठ मास, गोधिकाके रुधिरसे एक चतुई शो भूतगणो यएष तत्र स्थिता येऽखिल साल, कृष्णसार और सूअरके खूनसे बारह वर्ष, अजा, भूतसंघाः। भेड़ और शार्दूलके रुधिरसे पच्चीस वर्ष, सिंह, शरभ, तृप्त्यर्थमन्नं हि मया विसृष्ट' तेषामिदंते मुदिता, और अपने रक्तसे एक हजार वर्षे तक संतुष्ट होती हैं। इन भवन्तु ॥” | सम्पूर्ण पशुओंकी बलिसे दुर्गाजी परिमितकाल तक संतुष्ट __(आहिकतत्व ) रहती हैं। कृष्णसार, गैंडा और बकरा देवीको बहुत माहिकतस्वमें इसका विवरण खुलासा तौरसे किया ! प्यारे लगते हैं। बलियोंमें मनुष्यको बलि सबसे उत्कृष्ट गया है। विस्तार हो जानेके भयसे यहां दो एक हीका है। विधिके अनुसार एक नरवलि देनेसे देवी दुर्गा एक वर्णन किया जाता है। बलि देनेका तात्पर्य यह है, कि हजार वर्ष तक और तीन नरबलि देनेसे एक लाख वर्ष कोई अपने उद्देश्यसे पका कर भोजन न करे। समस्त तक संतुष्ट रहती हैं। मंत्रसे पवित्र किया हुआ बलि- भूत, कीड़े, पता आदिको अन्न देना ही बलि है का रक्त अमृत रूपमें परिणत हो जाता है। बलिका पर्व इसी प्रकार बलि देकर भोजन करना चाहिये। मस्तक एवं मांस देवताका बहुत अभीष्टप्रद है। इसी शास्त्र में लिखा है कि जो अपने सुखके निमित्त भोजन लिये पूजाके समय बलिका शिर और रक्त देवीको दान पकाते हैं वे केवल पापका ही बोझा बांधते हैं। करना पड़ता है। साधकोंको चाहिये, कि ये भोज्य- . . . नवप्रहके लिये जो बलि दी जाती है उसे नवग्रह बलि द्रष्यके सहित लोमशून्य अथवा पूजापकरणके सहित भा मांस हो दें। रक्तशून्य बलिका मस्तक अमृतके — सूर्यको गुड़ोदन, चन्द्रमाको घी दूध, मंगलको यावक, | बराबर है। Vol. xv 57