पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२३३

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२२७ इस प्रकारके पशुको बलि दनेसे नाना प्रकारकी आपत्तियां और निर्मल चरित्रपाले सध्द्रको उसके कुटम्बियों- आती हैं। के हाथसे मोटी रकम देकर खरीद लेना चाहिये। ब्रह्मवैवर्त में लिखा है-दुर्गापूजामें सप्तमीके दिन पूजा कर' तत्पश्चात् उसको स्नान करा कर एक वर्ष तक संसार बलि देनी चाहिये, अष्टमीके दिन बलि चढ़ाना निषिद्ध है। का भमण करावे। फिर उसको अष्टगी और नवमीको भष्टमी दिन चढ़ानेसे कोई न कोई विपत्ति अवश्य आती है। मन्धिमे बलि दे। (दुर्गासवतत्व ) नवमीको दिन पूजा कर यदि विधिके अनुसार बलि दी जाय, जिस समय पशका मस्तक काटा जाता है उस समय भोपात पण्यका लाभ होता है। बलि दनेसे दवी दुगा यति टांतोंका कट कट शब्द हो तो बलि देनेवालेको रोग अवश्य प्रसन्न होती हैं ; किन्तु इससे पशु-हिसाजन्य पाप और काटनेके बाद उसकी आंग्वोंसे यदि मैल बाहिर हो, भी अवश्य लगता है। पशु-बलिमें जो बलि चढ़ाते हैं तो जानना चाहिये, कि गज्यका अमङ्गल होगा। महिष अर्थात् पुरोहित, बलिदाना, कारनेवाला, पोटा, रक्षक, का शिर करने तथा नीचे गिरने पर यदि उमके नेत्रोंसे आगे और पीछे रोकनेवाले ये सात मनुष्य बलिके पाप- ग्वून निकले, नो जानना चाहिये, कि प्रतिद्वन्छी राजाका भागी होते हैं। अतएव बलिमे पाप और पुण्य दोनों ही मृत्यु होगी। दुसरे पशुके मस्तकसे पसीना निकलने होते हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराणके प्रकृतिखण्डके ६१वें अध्यायमें पर भय होगा, ऐसा जानना चाहिये। लिखा है, कि बलिदान देना पाप है। इससे पाप और पुण्य नर बलिके ममय यदि मनुष्यका शिर हंसे, तो दोनों ही होते हैं। रघनंदनने तिथितत्व में जहां दर्गा-पूजा- जानना चाहिये, कि शत्रुका विनाश और बलि देनेवाले के बलिदामका वर्णन किया है वहां पर उन्होंने निश्चय की लक्ष्मी तथा आयुकी वृद्धि होगी। नर-बलिका कटा किया है, कि बलिके लिये जो हिसा की जाती है वह। हुआ मस्तक जिन जिन वाक्यों का उच्चारण करे उनको पापजनक नहीं है । अवैध-हिंसा ही पापजनक है ।। अवश्य सफल मानना चाहिये। यदि वह हुंकार करे बैध-हिंसामें पाप न हो कर पुण्य होता है-"वधोऽवधः” तो गज्यकी हानि और यदि देवताके नामका उच्चारण करे, इसका अर्थ यह है, कि पूजाके लिये जो बध किया जाता , तो बलि देनेवालेको अतुल ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है। है, वह बध नहीं है। ऐसा कहनेका एक मात्र यही उद्देश्य (कालिकापु० ६७०) है, कि बलि चढ़ाने में किसी प्रकारका पाप नहीं होता। ऐतिहासिक आलोचनासे जाना जाता है, कि पहले यदि पूजामें बलि न दी जावे, तो महा अनर्थ होगा। अत- क्या तो भारतवासी, क्या यूरोपवासी सभीमें, चाहे सभ्य एव पूजा करने में बलि अवश्य ही देनी चाहिये। जाति हो या असभ्य, पशुबलि वा नरबलिको प्रथा बे रोक सांस्यकारिकाको टीका वाचस्पतिमिश्रने, बलिमे । टोक प्रचलित थी। वैदिकयुगमें पुरुषमेधकी कथा पहले हिंसा होती है या नहीं, ऐसा वर्णन आने पर, स्थिर किया, ही लिखी जा चुकी है। इसके बाद मारण्यकादिसे पितृ- है, कि बलिमें दोनों होते हैं, पाप भी होता है और पुण्य : मेध, गोमेध और अश्वमेधादि यज्ञों का वर्णन पाया भी। प्राणीको मारनेसे पाप और पूजा समाप्त होनेसे जाता है। पौराणिक कालमे यद्यपि पुरुषमेध-यज्ञ पुण्य भी होता है। उनके मतसे यह बात बिलकुल निषिद्ध था, तो भी चामुण्डाके सामने बलि देनेकी प्रथा सिद्ध नहीं होती, किबलि पुण्यजनक है, पापजनक एकदम प्रचलित थी। कालिकापुराणके ५६वें अध्यायमें देवी मही है। वैचाहिसा और हिंसा शब्द देखो। ! पूजनेके समय बलि देना चाहिये, ऐसा लिखा हुआ है। पशु-बलिके साथ साथ नर-बलिका भी विधान शास्त्रों- जब तक तांत्रिक मतका प्रभाव रहा तब तक यह में पाया जाता है। किस प्रकारका मनुष्य बलिके योग्य रक्तकी बलि चलती रही। मानसिक प्रपञ्चकी सिद्धिक होता है, उसके विषयमें ऐसा लिखा है-माता पितासे , लिये पाशवप्रकृतिके कापालिक भैरवीदेवीको प्रसन्न करने, हील, युवक, विवाहित, दीक्षित, व्याधिशून्य, पर-खीरहित' नरबलि अथवा शवसाधनाके अङ्गोंकी पूर्तिके लिये नर