पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२३४

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२२८ बलि देते थे । १७वीं शताब्दीसे १८वीं शताब्दी तक यह लिके समय नाभि तक गङ्गाके जलमें डुबाई जाती है। नृशंस पूजा पद्धति ममस्त भारतवर्ष में प्रचलित थी। अब | उस वृद्धके जब कण्ठ तक प्राण आ जाते हैं तब उसके भी वामाचारी सम्प्रदायके अनेक गृहस्थ परिवार जिनमें | शीतल जलमें डुबे रहनेसे उनकी अन्तर्वहि धीरे धीरे पहले नर बलि दी जाती थी, जीवित मनुष्य के बदले उनको बुझ जाती है। प्रायश्चित्तत्त्वोचत अग्नि और स्कंद- प्रतिमूर्ति बना कर देवीकी तृप्तिके लिये बलि देते हैं। पुराणके वचनानुसार यह जाना जाता है, कि उपवास कर इस पुतलाके बनानेके वाद उसमें प्राणप्रतिष्ठा की जाती आधी देह गङ्गाके जलमें दुबो कर प्राणत्याग करनेसे है। सुना जाता है, कि पहले बङ्गालकी स्त्रियां पुत्रकी ब्रह्मसायुज्य होता है । (४) प्राप्तिके लिये गङ्गाके पास जा कर प्रार्थना करती थीं, कि ___ कालिकापुराणमें जिस प्रकार नरबलिका वर्णन किया हमारे पुत्र होनेसे हम आपको ही दे जावेंगी। भाग्यसे | गया है उसी प्रकार बृहन्नीलतन्त्रमें शनलिका । (५) यदि उस स्त्रीके कन्या या पुत्रका जन्म हुआ, तो वह खेद शास्त्रोल्लिखित वलिके सिवाय तालाब, मन्दिर, घर चित्त होती हुई गङ्गामें उसको फेक देतो थी। कोई आदि बनानेके समय यदि कोई विघ्न उपस्थित हों, तो कोई उस पुत्रको मल्लाहोंसे निकलवा कर खरीद लेते थे। देवताओंको प्रसन्न करनेके लिये नर-बलि दी जाती थी। बङ्गालमें और भी आत्मोत्सर्गका वर्णन पाया जाता है, आजकल भी सुना जाता है, कि मनुष्यरक्तसे बहुतसी वह सतीका सहमरण है। जो सती अपनी इच्छासे भट्टालिकाओंकी नीय डाली जाती है। ऐतिहासिक पतिके मार्गका अवलम्बन करती थीं उनका पवित्र आत्मो- हिलर साहबने ऐसी ही कितनी घटनाओंका वर्णन किया त्सर्ग परम श्लाघनीय है। किन्तु जो स्त्री जीवनके दुःखसे है। हिन्दू राजाओंके समय उक्त कार्योंमें मनुष्यको रत पीड़ित हुई, अनिच्छासे अपने कुटुम्बादिकी ताड़ना तथा काममें लाया जाता था। मुसलमानों का जब अधिकार लज्जा और भयसे चिताको ज्वालामें प्रवेश करती थी उसको हुआ तब यह नृशंस बलि उठा दी गई। सम्राट शाहं. निष्ठुर बलि न कहा जायांतो क्या कहा जाय ? यह बलि खडगकी तीक्ष्ण धारसे नहीं, बांसोंके भीमप्रहारसे होती! (8) "अर्बोदके तु जाहव्यां म्रियतेऽनशनेन यः। थी । (२) स याति न पुनर्जन्म ब्रह्मसायुज्यमेति च ॥" __शास्त्रमें गङ्गामें डूब कर प्राणत्याग करना महा- (अग्निपुराण) स्कंदपुराणमें भी ऐसा ही एक और श्लोक पाया पुण्यजनक कहा गया है । (३) शास्त्रीय प्रमाणोंसे जाना जाता है- जाता है, कि गङ्गाके जलमें प्राण त्याग करनेसे ब्रह्महत्या- "नाभ्यर्तगततोयानां मृतानां क्वापि देहिनां । का पाप छूट जाता है और अन्तमें ब्रह्मपद एवं मोक्षकी तस्य तीर्थफलावाप्ति कार्या विचारणा॥" प्राप्ति होती है । उस जीवका फिर कभी जन्म नहीं होता। .(स्कन्दपुराण) इसी कारण हमारे देशमें ज्वरसे पीड़ित अस्सी वर्ष से पवित्र हृदयसे किसी संन्यासीको नाभी पर्यन्त अधिक वृद्धको गङ्गाको यात्रा करायी जाती है। अन्त जलमें डूबो कर प्राणत्याग करते हुए हमने देखा है, यही (१) इसका प्रकृष्ट प्रमाण वार्ड साहबके प्रथमें लिखा वास्तव में आत्मोत्सर्ग है। किन्तु मृत्युके मुशमें पड़ने- वाले नरनारियोंका आश्रय रहित बना, यक्षीय बलिका हुआ है। छोटा रूप है। (२) सतियोंका विस्तृत इतिहास सती शब्दमें देखो। (५) ततः शत्रु बलि राजा दद्यात क्षीरेण निमित्तम् । (३) 'गङ्गायां त्यज्यतः प्राणान् कथयामि वरानने! स्वयं विन्द्यात् कोधष्टया प्रहारजनकेन च ॥ कर्णे तत् परम ब्रह्म ददामि मामक पदम् ॥" कोपेन बधकवि सत्य सत्यं महेश्वरि । (स्कन्दपुराण) प्राणप्रतिष्टां कृत्वा वै शननाम्ना महेश्वरि। "संत्यज्य देह गङ्गायां ब्रह्महापि च मुक्तये।" शवक्षयो महेशानि भवत्येव न संशयः॥" (क्रियायोगसार) ( हन्नीलत)