पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२३५

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साल २३६ जहान्ने मगरकी नींव डालते समय लाख पशुओं का रक्त । स्कान्दिनेविया और प्रेटविटेनके रहनेवाले प्राचीन दूद उसमें डाला था। (६) ( Druid. ) पुजारी लोग मनुष्यको जला कर अपने आजकल भी बङ्गालियों के घरमें देवी प्रसन्न करनेके देवात्माको तृप्त करते थे। आथेन्सवासी अपने स्वदेश लिये रक्तदानकी प्रथा प्रचलित है। स्वामी, पुत्र वा भाई' वासियों के पापोंको क्षालन करनेके लिये थार्गेलिया आदिके मरणासन्न बीमार होने पर हिन्दू स्त्रियां उनकी ( Thargnlin )में प्रतिवर्ष एक एक नरनारो युगलकी आरोग्यताके लिये देवीको रक्तदान करनेका मनमें संकल्प बलि देते थे। भारतीय हिन्दू राजाओंकी तरह प्रोकवासी करतो हैं। दुर्गा या कालोपूजामें स्त्रियां अपनी छातीका भी शत्रुबलि देनेमें हिचकने नहीं थे। होमरने लिखा है, मध्यभाग गोर कर मानसिक पूजा समाप्त करती हैं। कि द्रोजान बंदियोंकी पेट्रोक्लिस ( Patrocler)की समाधि- जनसाधारणका विश्वास है, कि रक्तलोलुपा भैरवी के समय हत्या की गई थी। इजिप्तके रहनेवाले पवन- मनुष्य-रक्तसे संतुष्ट होती हैं । अतएव स्त्रियां देवीको अपने देवके निकट बलि देनेके लिये बालक 'मेनेलेयस्'को शरीरका रत देकर संतुष्ट करनेका प्रयास करती हैं : सना बंदी कर ले गये थे। (८) अगष्टसने अपने देवतुल्य तन हिंदूधर्ममें देवोह शसे आत्मोत्सर्ग करनेके और भी चचा दिवास जूलियसके संतोषके लिये तीन सौ पेरु- कितने ही उपाय बतलाये गये हैं। बहुतसे लोग यथाविधि सिया वासियोंको यमपुर भेजा था । पुराणवर्णित राक्षसों- कर्मानुष्ठान करने के बाद महाप्रस्थान कर वा अग्निकुण्डमें की नरबलि और नरमांस भोजन युरिपिड्यस वर्णित साह- प्रवेश कर देवताके संतुष्ट होनेकी आशामें अपने आपको लोप जातिके समान है ।(६ युरिपिडस् फिलो ष्ट्रटस् बलि चढ़ा देते हैं ।(७) ऐसा सुना जाता है, कि बहुतसे और आरिष्टटलने लामी ( I. ma ) और लेष्ट्रीगो लोगोंने देवताको संतुष्ट रखने और उससे मोक्षप्राप्तिकी ( Lestrirgons )नामकी जातियों का उल्लेख किया है। आशामें अपने आपको जगन्नाथजीके रथचक्रके नीचे इटली, सिसली, प्रीस, पन्टास और लिविया नामके उत्सर्ग कर दिया है। । स्थानों में उनका वास था । समुद के किनारे कायेट (Cai- जैसे प्राचीन भारतइतिहासमें ऐसी नरबलियों का cte) नगरमें उनका सर्व प्रधान देवमन्दिर था। यहां हाम अनेक जगह उल्लेख है वैसे ही प्राचीन यूरोपादि ( Ham) देवताके समक्षमें सुकुमार बच्चोंकी बलि दी देशों में भी देवताओं को संतुष्ट करने के लिये नरबलि दी जाती थी। साइरेन ( Surens ) स्त्रियां अपनी सुन्दरता जाती थो । फिनिकीय और कार्थेजि-वासी अपने और सुमधुर गानसे समुद्रके किनारे आनेवाले मल्लाहोंको बाल ( Ba'al) और मोलक नामके देवताको रक्त लुभा कर कास्पनिया कुलवी मंदिरमें ले जाती थीं। पिपासा बुझानेके लिये मनुष्यको उपहारमें देते थे। (८) Herodotus, Vol. 11. p. 119 (8) History of India Vol. IV. p. 278, (द) होमरने आडेसी नामके प्रन्थमें लिखा है, कि (७) जिस समय तांत्रिकोंका प्रवाह जोरों बह रहा साइक्लोप सिल्लाने युलिसिखके अनुचरों का मांस हाया था उस समय देवीपूजाको सामग्री नररतसे बनायी था। युरिगडिसने भी उनके नरमांस भोजनका उल्लेख जाती थी। किया है। इन प्रमाणोंसे अच्छी तरह जाना जाता है, (७) महाप्रस्थान--स्वेच्छासे समुदमें डूबकर प्राणों का कि भूमध्यसागरके किनारे अनेक स्थानों में पहले नर- विसर्जन। श्रीक्षेत्रमें इन उपायोंसे अनेक साधु-संन्या- बलि प्रचलित थी । जब कभी मल्लाहका खोटा भाग्य सियों ने प्राणत्याग किया ऐसा सुना जाता है। उसे इस प्रकारको राक्षसप्राय असभ्य जातिके स्थानमें माकिदनवीर आलेकसन्दरके समय कलेनासने तुषानल | पहुंचा देता था, तब वह अपने प्राणसे हाथ धो बैठता. किया था। हिंदशास्त्रों में अनेक जगह तुषानलकी उसे किसी न किसी देवताकी पलिमें जाना पड़ता था। अवस्था है। | ( Homers Olessy A trivides) Vol, xv."68