पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२३८

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२३२ पनि तुम्हारे प्राण पर सङ्कट है, इसलिये तुमको झूठ बोलनेसे अपने अनुबरोंको युद्धसे निषेध करने लगे और बोले पाप नहीं।' वलिने शुक्राचार्यका यह उपदेश सुन कहा, "अभी दैव हमारे प्रतिकूल हैं, जो तीन लोकके प्रभु और 'गुरुदेव ! जो आपने कहा वह सत्य है उसमें जरा भी सर्वशक्तिमान हैं उन्हें पुरुषकारसे जीतनेकी चेष्टा करना सन्देह नहीं। किन्तु मैं महात्मा प्रहादका पौत्र और बिलकुल असम्भव है । इसलिये तुम लोग घृथा ही विरोचनका पुत्र है। मैंने ब्राह्मणको वचन दे दिया है, लोगोंका क्षय मत करो।" बलिका इतना कहना ही था, सो अब किस प्रकार उन्हें धूर्तीकी तरह धनलोभमें पड़ कि वामनके अभिप्रायानुसार उसको गरुड़ने पाशमें बांध कर लौटा दूंगा। यह ब्राह्मण चाहे विष्णु हो या शत्, लिया। तब भगवान् वामनने बलिसे कहा, "राजा! तुमने मैं तो उन्हें वह भूभि अवश्य दूंगा। मैं अनपराध हूं, यदि | मुझे तीन पद भूमी दान की है, मेरे दो पदसे सम्पूर्ण पृथ्वी ये अधर्म कर मुझे बांधेगे, तो भी मैं उनका बध नहीं | आक्रान्त हो चुकी है। तीसरे पद रखनेको और भूमी करूंगा।' बलिकी यह बात सुन कर शुक्राचार्यने क्रोधित कहां हैं, सो दो। मेरे एक पैरसे समस्त भूलोक आक्रान्त हो कहा, "तू मूर्ख पण्डिताभिमानी है ! मेरो उपेक्षा कर | हुआ, मेरे शरीरसे समस्त आकाश और दिशायें व्याप्त मेरे शासनको अवज्ञा करता है। अतएव तू सदाके लिये हो गयी हैं। इस प्रकार तुम्हारी समस्त भूमि आक्रान्त श्रीभ्रष्ट होगा। हो चुकी, सो तुम्हारे वचन पूर्ण नहीं हुये अतएव तुमको बलि गुरुकी शाप सुन कर भी सत्यसे विचलित न नरक जाना होगा। अतः कुलगुरु शुक्राचार्यकी अनुमती हुए । बलिने वामनकी पूजा की और उदकस्पर्शपूर्वक भूमि- ले कर शीघ्र ही नरक जानेकी तैयारी करो। का दान दिया। अब विष्णु भगवान् वामनरूपसे आश्चर्य- विष्णु भगवानके बचन सुन कर बलि बोले "भगवन् ! रूपमें बढ़ने लगे। बलिने देखा, कि विश्वमूर्ति हरिके मैं असत्य कभी नहीं बोलता । मेरे कहे हुये वचन मिथ्या पदतलमें रसातल, चरणद्वयमें पृथ्वी, दोनों जामें पर्वत, नहीं हो सकते । आप ही कपक्षापूर्वक वामनरूपसे जानुदेशमें पक्षी, ऊरुद्वयमें मरुद्गण, वसनमें संध्या, गुह्य भिक्षा मांग कर अब दूसरा रूप दिखलाते हैं। इस पर देशमें प्रजापति, जघनमें समस्त असुर, नाभिस्थलमें | यदि आप मुझे मिथ्यावादी मानते हों तो मैं आपके अङ्गी- आकाश, कुक्षिद शमें सप्तसागर, ऊरुस्थलमें नक्षत्रश्रेणी, कारको पूर्ण करता है । अपकीर्तिसे मुझे जितना भय है हृदयमें हर्म, स्तनद्वयमें ऋत और सत्य, मनमें चन्द्र, । उतना नरक या पाशबंधनसे नहीं है । अतएव आप तृतीय पक्षास्थलमें कमला, कण्ठमें वेद और समस्त शब्द, चरणकमल मेरे मस्तक पर स्थापन कीजिये । भगवान् चार बाहुओं में इन्द्रादि देवगण, कर्णद्वयमें दिशा, वामनने बलिके कहे अनुसार अपना तृतीय चरणकमल मस्तकमें स्वर्ग, वालों में मेघ, नासिकामें अग्नि, चक्ष द्वय बलिके मस्तक पर रखा। उस समय बलि भगवान्का स्तव में सूर्य प्रभृति तीनों लोक दिख ई देते हैं। बलि और ! करने लगे। प्रहाद आदि भी उसी समय वहां पहुंचे और समस्त असुरगण वामनके इस प्रकार शरीर देख कर भगवान्को प्रणाम कर बोले, “बलिने अनेक सत्कार्य और बहुत भयभीत हुए। सर्वस्व दानमें अर्पण कर दिया है, वह निग्रहयोग्य कदापि . तदनन्तर उनके एक पदसे बलिकी समस्त भूमि, नहीं है, इसलिये इसका बंधन मोचन कर दीजिये।" . शरीरसे आकाश, पाहुद्वयसे सम्पूर्ण दिशायें आक्रान्त ___भगवान् विष्णुने कहा, "जिस पर मेरा अनुग्रह होता हो गई। दूसरं पदसे स्वर्ग व्याप्त हो गया और तोसरा पैर है उसका मैं पहिले धन अपहरण कर लेता हूं। क्योंकि रखनेको कहीं पर ठौर न मिला। उनका यह कृत्य देख। अर्थमें ममता होती है और मुझमें अविश्वास बलिके अनुचरोंने उन्हें मायावी समझा और उन्हें मार करने लगता है । यह बलि दैत्योंका अग्रणी डालनेके लिये वे लाग अस्त्रोंका निक्षेप करने लगे; किन्तु और कोतिवद्धन है। इस व्यक्तिने दुर्जया मायाको उनका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सका। बहुतसे जीता है अतएव अवसन्न हो कर भी यह मुग्ध नहीं दानव विष्णुके अनुचरोंके हाथसे यमपुर सिधारे। बलि होता। यह निर्धन, स्थानव्युत, शबुक क वध हो