पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२३९

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२३३ कर भी सत्यसे बिचलित नहीं हुआ और जातिवाले इस- बलि रोग प्रगट होगा। यह वायु, पित्त और कफ इस को परित्याग कर दुःखते हैं। यहां तक, कि कुलगुरु प्रकार त्रिदोषज होती है। शुक्राचार्यने भी शाप दिया है, फिर भी बलि सत्यसे जरा वायुजबलि -बायुजनित बलि शुष्क, अरुणवर्ण, भी विचलित नहीं हुआ। अतएब मैं इसे देवताओंको मध्यस्थलमें विषम, कदम्ब पुष्प, तुण्डिकेरी, नाड़ीमुख, दुष्प्राप्य स्थान देता है। मैं स्वयं इसके आश्रय हुआ। या शुचीमुखको आकृतिके समान होती है। यह वायुज यह सावर्णिमन्वंतरमें इन्द्र होगा। जब तक वह मन्वन्तर बलि टन टन शब्द करती है । रोगो सहतभावसे अर्थात् नहीं आयेगा, तब तक यह विश्वकर्मा निर्मित सुतलमें जड़सड़ हो कर बैठता है। कटि, पृष्ठ, पाच, मेद, गुह्य जा कर रहेगा। यह स्थान सामान्य नहीं, आधि व्याधि, और नाभिमें घेदना होती है। नख, दन्त, चक्ष , मुख, क्लाति, जरा और पराभवसे रहित है । उसो स्थानका प्रभु मूत्र और पूरीष काले हो जाते हैं। हो कर बलि! तू वहां अवस्थान कर । मैं कौमोदकी पित्तजबलि -पित्तजवलिका अप्रभाग नील और गदासे तुम्हारी रक्षा करूगा।” सूक्ष्म होता है। यह विसपी, ईषन् पीतवर्ण वा यकृत्के बलि भगवान्का आदेश पा पातालको चल दिये। समान आभाविशिष्ट होती है। शुकपक्षीकी जिह्वाके समान इधर शुक्राचार्य ने भगवान् विष्णुको आज्ञासे यज्ञको पूर्ण संस्थित, यवके मध्यभागको आकृतिसी और जोंकके किया । ( भागवत १८.२ अ० वामनपुराण आदिमें मुखके समान सनदा फ्लेदयुक्त होती है । पित्तजबलिसे इसका विशेष विवरण मिलता है। वामन देखो। दाहयुक्त रुधिर निकलता है। ज्वर, दाह, पिपासा और ___५ ययाति-वशोद्भव सुतपा-राजपुत्र । । स्त्री०) मूर्छा प्रभृति उपद्रव तथा नख, नयन, दशन, वदन, मूत्र लति संवृणोतीति वल संवरणे इन् । ६ जरा द्वारा श्लथ-' और पुरोष पीतवर्ण हो जात हैं। चर्म, बुढ़ापेके कारण चमड़े पर पड़ो हुई शिकन । पर्याय-- श्लेष्मजवलि--श्लेष्मजन्य बलि श्वेतवर्ण, महामूल- चर्मतरङ्ग, त्वगुम्मि, त्वक् तरङ्ग । ७ जठरावयच । ८ गृह-: विशिष्ट, दगढ़, गोलाकार, स्निग्ध, पाण्डुवर्ण, करीर, पनस- दारुभेद । ( मेदिनी ) ६ गुदांकुर। बबासीर होने पर के आकारकी, कठिन, आस्रावहीन और अतिशय कण्ड- यह निकलता है। सुश्रुतमे लिखा है- विशिष्ट होती है। इसमें श्लेष्मायुक्त और अधिक परि- गुह्यदेशसे आध अंगुलकी कुछ अधिक दूरी पर प्रवा- माणमें मांसके धोवनके समान मल निकलता है । त्वक, हणी, विसर्जनी और सम्बरणी नामको तीन बलि हैं। नख, नयन, दशन, वदन, मूत्र और पुरीष श्वेतवर्णाके ये तीन बलि चार अंगुल चौड़ी, तिर्यग भावसे स्थित होते हैं। और एक अंगुल ऊंची हैं । शङ्कावर्तकी तरह बलयाकार इसके सिवाय रक्तजन्य बलि भी होती है। रक्तजवलि में जड़ित हो कर एक दूसरेके ऊपर सस्थित हैं । उनका वटके अंकुर वा विद्रुमके समान और पित्तजबलिके वण हस्तीके तालूके समान है। लक्षणोंसे विशिष्ट होती है। इसमें मल कठिन हो जानेसे गुह्यदेशजात रोमके अद्धभागसे ले कर यवके अर्ध- दुष्ट शोणित अधिक परिमाणमें निकलता है। अतिशय भाग परिमित स्थान तकको गुदौष्ठ कहते हैं। प्रथम शोणित निकलनेसे नाना प्रकारके उपदय होते हैं । बलि- बलिका स्थान गुदौष्ठसे दो अंगुल नीचे है। सान्निपातिक होनेसे उसमें सभी दोष और सब प्रकारके बलि होनेके पहिले अन्नमें अश्रद्धा, कष्टसे परिपाक, लक्षण होते हैं। उरुद्वयका भारीपन, उदरमें शब्द, कृशता, अतिशय उदार, ____ मलद्वारके वाह्यदेश तथा मध्य भागमें बलि होनेसे नेत्रोंका फूलना आदि लक्षण होते हैं। पांडु, प्रहणी अथवा चिकित्सा करावे ; किन्तु यदि अंतर्वलि होगी, तो शोष रोगीको बलि रोगकी संभावना होने पर कास, प्रत्याख्यान करना ही विधेय है । (सुश्रुत मुनि०२०) श्वास, भम, तदा, निद्रा और इद्रियोंमें दुर्बलता आ जाती ____अ देखो। है। इन लक्षणों के दिखाई देने पर जानना चाहिये, कि भावप्रकाशमें लिखा है-वातजन्य अर्शरोग होने पर Vol. xv. 50