पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२४३

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


बलनिस्तान २३७ हुए। नवराजाके लापट्य ओर स्वेच्छाचारितासे प्रजा भी मनोवाद घटना न घटी। शेषोक्त वर्ष में लार्ड डल- विशेष विरक्त हो गई थी। इसी समय उनके कनिष्ठ हौसीके शासन के समय खिलातराज्यके बलूच अधीश्वर भ्राता नाशिर खाँ नादिरशाहको संतुष्ट कर खिलातमें मीर नाशिर खाँके साथ अंग्रेज प्रतिनिधिको एक संधि लौट आये। पीछे प्रजावर्ग के अनुरोधसे निज भ्राताकी हुई । उसमें शर्त यह ठहरी, कि वे अप्रेजों को सीमान्त- हत्या कर उन्होंने राज्यपद प्राप्त किया । नादिरशाह रक्षा, स्वराज्यमें अंग्रेजी सेनाका समावेश और बणिक इस संवादसे बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने १७३६ ई०. प्रभृतिकी स्वार्थ रक्षाके सम्बन्धमें विशेष यत्नवान् रहेंगे में फर्मानके द्वारा उसको बलूचिस्तानका 'वेगलार्वि' बना और अंग्रेज-राज भी उन्हें वार्षिक १५ हजार मुद्रा देंगे। दिया। १८५६ ई० पर्यन्त नाशिरने विशेष राजभक्तिके साथ यह नाशिर खाँ योद्धा और राजनैतिक थे। वीरोचित शत पालन की थी। उनकी मृत्यु होने पर उनके भाई साहससे वे शासन कार्य सम्पन्न करने लगे । खिलात | मीर खुदाबाद खोने शासनभार ग्रहण किया । इस समय नगरमें राजदुर्ग बनाया गया और उन्हींके यत्नसे उक्त बलूचसर्दारोंने विद्रोहो हो कर उनके अन्यतम भाता शेर- नगरी नाना शोभासे शोभित होने लगी। १७४१ ईमें दिलखांको सिंहासन पर बिठानेकी चेष्टा की । किन्तु नादिर शाहको मृत्युके बाद उन्होंने काबुलराज अहमद- अंग्रेजोंकी सहायतासे वे कृतकार्य न हो सके।(१) पर शाह अबदालीको राजा स्वीकार किया । किन्तु १७५८ राज्यमें जो अराजकता फैल गयी थी उसकी गतिको ई०में नाशिर खांके अपनेको स्वाधीन नरपति घोषित कोई भी नहीं रोक सका । १८७४ ईमें अङ्ग्रेजोंके करने पर अहमद शाहने आँके विरुद्ध सेना भेजी । दो बलूचिस्तानके साथ राजनैतिक सम्बन्धमें छेड़छाड़ करने तीन युद्धोंके बाद अफगानसेनाके पराजित होने पर उभय पर राज्यमें और भी गड़बड़ी मच गई । अन्तमें बलूच- पक्षमें शान्ति स्थापित हो गयो और संधिकी शर्तके सर्दारके बुलानेसे बाध्य हो १८७६ ई में अंग्रेजोने सुशा- अनुसार काबुलपति खाँके भ्राताको कन्यादान करने और सनकी स्थापनाके लिये सेना भेजी। खिलातपति और खो स्वयं अहमदशाहको सैन्यद्वारा साहाय्य करनेके उनके सामन्तोंमें एक तरहसे मेल हो गया और उन्होंने लिये प्रतिज्ञावद्ध हुए । काबुलके कितने ही युद्धोंमें खाँने याकुवाबादमें अंग्रेज प्रतिनिधि लार्ड लिटनके साथ जा युद्धविद्याका अच्छा परिचय दिया था। वृद्धावस्थामें मुलाकात की। १८७७ ई०में विक्टोरियाके 'भारतसाम्राही' उन्होंने अपने भाई वहराम खाँके विद्रोहदमनसे अच्छी उपाधि ग्रहणके उपलक्षमें वे दिल्लीदरबारमें आ शामिल ख्याति पायी थी। १७९५ ई में उनकी मृत्युके बाद उनके हुए थे। खाँके स्वराज्यमें लौटने पर अंगरेज एजेएटने ज्येष्ठ पुत्र महमूदखों राजा हुये। उनके राजत्वकालमें राज्य- कोयटामें रहनेकी अनुमति पाई , परवती अंग्रेजोंके में ज्यादा गड़बड़ी मची। ११८३६ ई०में अंग्रेजोसेनाने अफगान-अभियानमें बलूच-सरदारोंने अंग्रेजोंको विशेष जब जेलान गिरिसङ्कटसे अफगानराज्यमें कृच किया, · सहायता पहुचायी थी। तब बलूच सर्दार मेहराव खाने अंग्रेजोंके साथ विश्वास- भभी बलूचिस्तानके अलावन, सरावन, खिलात, घातकता की। इसलिये अंग्रजी सेमाने बलुचिस्तानको मकाण, लुस, कच्छादावा और कोहि आदि विभाग हो आक्रमण करके खिल.त नगर पर अधिकार जमाया। गये हैं। खिलात इसकी राजधानी है । मस्तङ्ग ( सरा- इस युद्ध में स्वयं मेहराव खां मारे गये । अंगरेज-राजने ! वन ) कोजदार (झलावन ), बेला (बेला ), केज खिलात नगरमें अपना शासन फैलाया। १८४१ ई०में -- मेहरावके नबालिग पुत्र नाशिर खां अंग्रेजोंके अनुप्रहसे (१) १८६३ ई० में अगरेजप्रतिनिधिक बळे आने पर बलूचिस्तानके सिंहासन पर अभिषिक्त हुये। शेरदिल खाने सर्वारोंके आदेशानुसार खुदावादको आक्रमण कर १८४३ हमें नेपियरके सिंधु-अभियानसे ले कर सिंहासन पर अधिकार जमाया। किन्तु दक्षरे पाल ही में १८५४ ईतक अंग्रेज और बलच-सर्दारों के बीच कोई इनको मार दामाद राजा हुथे । Vol xv. 60