पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२४६

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२१० बबालराजवंश बालरायदुर्ग निदर्शन आज भी देखनेमें आता है। १८०० ई० में यहां तलगढ़ पर अधिकार जमाया। इन्हीं के अधिकारकाल- पत्थरका एक दुर्ग बनाया गया था। इसके उत्तरमें में बल्लालराजवंशकी ख्याति चारों ओर फैल गई थी। पुष्करिणी और पूर्वमें गोंडराजके समाधि-मन्दिरका जमसाधारणका विश्वास है, कि रामानुजाचार्यने उन्हें भग्नावशेष पड़ा है। यहां व नदीको एक प्रशाखाके वैष्णवधर्ममें दीक्षित किया था। उनके लड़के श्म नर- मध्य एक देवमन्दिर स्थापित है। नदीमें बाढ़ आनेसे : सिंहने ११४२-११९१ ई० तक राज्य किया। पोछे राजा यह मन्दिर कुछ समय तक जलमग्न रहता है। यहांको श्य बल्लाल सिंहासन पर बैठे । वे १९९२-१२११ ई० तक समुच्च पर्वतमालाके मध्य हो कर ब‘नदी बह गई है। राजा रहे। उन्होंने कलचूरीराजको परास्त कर राज- और इधर उधर वनराजि विराजित रहनेके कारण इस मुकुट धारण किया । पोछे पाण्ड्य, चोड़ आदि दाक्षिणात्य स्थानका प्राकृतिक सौन्दर्य सर्वापेक्षा मनोरम है। राजाओंको जीत कर अपना प्रभाव फैलाया। १३२३ बसलालराजवंश---दाक्षिणात्यके एक प्रसिद्ध राजवंश। ई०में देवगिरि यादवराजसे श्य नरसिंह परास्त हुए, यह वंश हयशाल बल्लाल नाममे प्रसिद्ध है। वर्तमान यह हमें शिलालिपिसे मालूम होता है। उसके बाद महिसुर-राज्यके समीपवत्तों स्थानोंमें इस शने १३वीं राजा सोमेश्वरने चोड़राज्यके अन्तर्गत विक्रमपुर जा कर शताब्दी तक राज्य किया था। पहले वे लोग कलचूरी राजधानी बसाई। (१२२५ ई० में ) राजा ३य नरसिंह वंशीय राजाओंके सामन्तरूपमें गिने जाते थे। आखिर द्वारसमुद्रमें राज्य करते थे।(४) राजा ३य बल्लाल वा उक्त राजवंशका अधःपतन होने पर उन्हीं लोगोंने इस वीर बल्लालदेवने दाक्षिणात्यमें मुसलमानी आक्रमण पर्यन्त प्रवेशका शासन-भार ग्रहण किया। (१३१० ई०) राज्य किया था । मालिक काफुर द्वारसमुद्रके बल्लालराजगण यादववंशके थे। दाक्षिणात्यमें | यादवराजाओंको जीतनेके लिये दाक्षिणात्य गये थे। युद्ध जब उन लोगोंका पूरा प्रभाव फैला हुआ था, उस समय में बल्लाल पकड़े गये और पराजित हुए । उनका राज. उन्होंने यादव राजाओंकी प्राचीन राजधानी द्वारसमुद्रमें। पाट मुसलमानोंके हाथ लगा, पर उन्हीं मुसलमानोंको ( वर्तमान नाम हलेबीड ) राज्य बसाया । शाल वा हय- कृपासे वे १३२७ ई० तक राज्यशासन करते रहे थे। पीछे शाल नामक कोई व्यक्ति इस वंशके प्रतिष्ठाता थे, ऐसा मुसलमानों के बार बार आक्रमणसे बल्लालराजवंश छार- बहुतेरोंका विश्वास है ।(१) किन्तु उसका कोई प्रमाण खार हो गया । १३३७ ई०में हम देखते हैं, कि दाक्षिणात्य नहीं मिलता । शिलालिपिसे बल्लाल वंशीय राजाओंकी के मुसलमान शासनकर्त्ताने तानुनगरके हयशालके यहां जो वंशतालिका पाई गई है, वह इस प्रकार है आश्रय ग्रहण किया था। १३४७ ई में द्वारसमुद्रके हय- १०४७ ई०में उत्कीर्ण शिलालिपि(२)से मालूम होता है, शालराज बल्लालदेवने अपरापर हिन्दूराजाओं के साथ कि राजा विनियादित्य त्रिभुवनमल्ल पश्चिम चालुक्य मिल कर मुसमानों को दाक्षिणात्यमें मस्तक उठानेका राज छठे विक्रमादित्य के सामन्त थे । उनके पुत्रका नाम अवसर नहीं दिया और प्रायः दो सदी तक मुसलमान- पड़गङ्ग था । एड़गङ्गके तीन पुत्र थे, बल्लाल, विष्णु- लोग हिन्दूराजाओं के पदानत रहे थे। पर्धन और उदयादित्य । बल्लालने निज भुजबलसे बल्लालरायदुर्ग-महिसुरराज्यके कदूर जिलान्तर्गत पश्चिम- शान्ताराराज जगद्देवको ११०३ ई०में परास्त किया था। घाट पर्वतमालाका एक पर्वत । यह समुद्रपृष्ठसे ४६४६ उनके छोटे भाई राजा विष्णुवर्धनने ।(३) गङ्गराजधानी फुट ऊंचा है। दाक्षिणात्यमें बल्लालवंशीय राजाओं के (१) चेन्न-वसवन्न-कालझान नामक पुस्तकमें हय शाल- का राज्यकाल ९८४से १०४३ ई० तक बतलाया गया है। गङ्ग, बीरगङ्ग, विक्रमगङ्ग कई एक विरुद (पदवी ) देखे .. (२) Mr. Rioeने १०३६ ई० में उत्कीर्ण उक्त राज्यकी। जाते हैं। एक और शिलालिपिका उल्लेख किया है। (४) उनके राज्यकालमें १२५४से १२८६० मध्य शिक- (३) वित्तिदेव, वित्तिग, त्रिभुवनमलदेव श्य, भुजबल- लिपि उत्तीर्ण देवी जाती है।