पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२५०

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२४४ बसई (बेसिन ) . १ बम्बई जिलेके थाना जिलान्तर्गत एक महाराष्ट्रसिंहके तर्जन गर्न नसे भीत पुत्तं गीजदल अव- तालुक। यह अक्षा० १६१६ से १९३५/३० तथा सन्न होने लगा। १७३६ ई०में चिमनाजी अप्पाने दल- देशा० ७२ ४५ से ७३१ पू०के मध्य अवस्थित है। ! बलके साथ बसाईको घेर लिया। तीन मास तक भूपरिमाण २२३ वर्गमील है। इसमें वसाई नामका एक तुमुल संग्राम होते रहनेके बाद पुर्तगीजों ने मराठा- शहर और १० ग्राम लगते हैं। यहांकी जमीन बहुत सेनापतिके हाथ आत्मसमर्पण किया। बसाई नगर उर्वरा है। धान, केला, ईख और पान बहुतायतसे | और जिला पेशवाने अपने अधिकारमें कर लिया। महा- उत्पन्न होता है। तुङ्गल और कामन नामक पर्वतमाला राष्ट्र-अधिकारके समय यह स्थान वैङ्कटनदी और दमन- तालुककी शोभाको बढ़ाता है। कामन दुर्ग समुद्रपृष्ठसे के मध्यवर्ती भूभागका प्रधान वाणिज्यक्षेत्र बनाया गया। २१६० फुट ऊंचा है। जलवायु स्वास्थ्यकर है। १७८० ईमें अगरेजी सेनाने बसाँई पर अधिकार किया। २उक्त तालकका एक शहर। यह अक्षा०१६२० । १७८२ ई०में मलवाईकी सन्धिके अनुसार यह स्थान उ० तथा देशा० ७२.४६ पू० बसिन रोड स्टेशनसे ५ पुनः मराठों को लौटा दिया गया। १८१८ ई० में अन्तिम मोलकी दूरी पर अवस्थित है। जनसख्या १०७०२ है। पेशवाकी सिंहासनच्युतिके बाद यह अगरेजी शासना- यहां बम्बई, बड़ौदा और मध्यभारतीय रेल-पथका एक धीन हो कर थाना जिलेके अन्तर्भुक्त हुआ। स्टेशन है। पहले बसाई द्वीप और भारतीय विभागके प्राचीन बसाई नगरके प्राचीर और प्राकारादि आज मध्य जलनाली बहनेके कारण पुर्तगीजोंने जहाजादि भी विद्यमान हैं। उस प्राचीर परिवेष्टित स्थानके मध्य रखने के लिये इस स्थानको उपयुक्त समझा। इस कारण १५३७ ई०में प्रतिष्ठित सेण्ट एन्थोनी, सेण्टपाल और उन्होंने गुजरातपति बहादुरशाहसे १५३४ ई०में इसका डोमिनिकन कनभेण्ट आदि खुष्ट धर्ममन्दिरके ध्वंसाव- अधिकार प्रहण किया और उसके दो वर्ष बाद यहां एक शिष्ट निदर्शन आज भी देखनेमें आते हैं। दुर्ग बनवाया। प्रायः दो शताब्दी तक यह स्थान पुरी- बसई (बेसिन )-अंगरेजाधिकृत ब्रह्मके पेगू विभागके गीजोंके दखलमें रहा । उस समय शहरकी ऐसी श्रीवृद्धि अन्तर्गत एक जिला। यह अक्षा० १५५ से १७३० उ० हुई, कि यह Court of the North नामसे पुत्त गीजोंके ! तथा देशा०६४११ से १५२८ पू०के मध्य अवस्थित मध्य प्रसिद्ध हो गया। उस समय यहां सैकड़ों वणिक है। भूपरिमाण ४१२७ वर्गमील है। आराकन पर्वत- रहते थे। उनकी सुरम्य अट्टालिकासे नगरको शोभा मालाके मध्यदेशमें विलम्बित रहनेके कारण इसका निराली थी। हिदलगो नामक महाधनवान् व्यक्ति ही | पश्चिमाद्ध गण्डशैलसे समाकीर्ण है और पूर्वार्द्ध इरावती नगरमें अपना घर बना सकते थे, दूसरेको बसनेका हुकुम | नदीकी तीन प्रधान शाखा विस्तृत रहनेके कारण विशेष नहीं था। वे लोग शहरके बाहर घर बना कर रहते थे। उर्वरा है। १३वीं शताब्दीके शेष भागमें यहां महामारीका प्रकोप इस जिलेके वङ्गोपसागरकूल पर नेग्रिस तथा पगोडा हुआ। १६.५ ई० में यहांके प्रायः आधेसे अधिक अधि. नामक दो अन्तरोप हैं। उपकूल भागमेंसे कुछ तो वन- वासी कराल कालके गालमें फसे थे। मालासमाच्छादित है और कुछ बालुकामय भूमि दृष्टि- पुर्तगीजों का प्रभाव खर्व होने पर भी १७२० ई० गोचर होती है । पैमल, पिन्थामू, रघेदाभ्यू, बसाई, तक बसाई नगरकी श्रीपृद्धि नष्ट नहीं हुई। उस समय थेक्कय) आदि नदियाँ समुद्रगर्भ में आ कर मिल गई हैं। पश्चिम भारतमें केवल यही एक ऐसा शहर था जो | इस जिलेका प्राचीन इतिहास नहीं मिलता। टलेमी- अभिमानके साथ अपना मस्तक उठाए हुए था। उधर ने भारतीय नदीवर्णनस्थलमें गङ्गाके पूर्वदिगवत्ती जिन महाराष्ट्रीयगण भी भविष्य पथ धीरे धीरे साफ कर सब नदियों और पर्णतोका उल्लेख किया है, उनमेंसे रहे थे। अतएव एकके स्पर्धाशाली अभ्युदय पर दूसरे- बसाई नदीका नाम भी पाया जाता है। तैलङ्ग राजइति की क्षीणमुखज्योति और भी प्रभाशून्य हो रही थी। हासमें (६२६ ई में वसाईके ३२ नगरोंका नामोल्लेख है।