पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२५२

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२४६ बसनः सर्व नवीके बाएं किनारे नगरके जे-चौङ्ग विभागमें श्वे-मू- थैली जिसमें रुपया पैसा रखते हैं। वह कोठी जिसमें हनव पागोडा और अंगरेजोंका दुर्ग, विचारगृह तथा रुपयेका लेन देन होता हो। धमागार आदि हैं। बसन्तपुर--मुजफ्फर जिलेके अन्तर्गत एक प्रसिद्ध प्राम। अंगरेजोंके अधिकारमें यहाँके वाणिज्यको दिनों दिन यह लालगञ्जसे साहेबगञ्ज जानेके रास्ते पर अवस्थित उम्नति देखी जानी है। खैर, लाह, सीसक, चकोर- है। यहां पाणिज्यकी यथेष्ट उन्नति देखी जाती है। इसके काष्ठ और धान्यादिकी विभिन्न देशों में रानी होती है। उसर केवलपुरकी नीलकोठी अवस्थित है। ष्टोमर द्वारा यहांका अधिकांश पण्य द्रव्य रंगून भेजा | बसन्तपुर-विहारके पूर्णिया जिलान्तर्गत अररिया उप- जाता है। ग्रीष्मके समय नदीका जल घट जानेसे विभागका सदर। यह अक्षा० २६१४ उ० तथा देशा० टोमरोंको जाने आनेमें बड़ो दिक्कतें होती हैं। ८७°३३ पू० पतार नदीके दाहिने किनारे पर अवस्थित ब्रह्मराज अलौड़पायाके शासनकालमें यह नगर है। जनसंख्या तीन हजारके करीब है। बिलकुल जनहीन था। इस कारण कोई विशेष घटना न बसन्तर-पञ्जाबके गुरुदासपुर जिलेमें प्रवाहित एक नदी । घटी। सुना जाता है, कि तैलङ्ग राजकन्या उमत्मदनी- बहुतसे पार्वतीय स्रोतोंसे वर्द्धितकलेघर हो यह इरावती ने १२४६ ई०में इस नगरकी प्रतिष्ठा को। राल्फफिच | मदीमें मिली है। मादि पाश्चात्य भमणकारिगण इस स्थानका 'कस्मिन' बसन्तपुर--बङ्गालके खुलना जिलेके उत्तर एक प्रसिद्ध नामसे उल्लेख कर गये हैं। इसका प्राचीन नाम कुशीम प्राम। यह अक्षा० २२ २७३० उ० तथा देशा० ८६ मगर था। १२वीं सदीके प्रारम्भमें भी यहां वाणिज्य २१५० पू०के मध्य अवस्थित है। यहां चावलंका व्यवसाय जोरों चलता था। प्रथम ब्रह्मयुद्धके समय प्रचुर वाणिज्य होता है। यहांके शासनकर्ता नगरको अग्निदग्ध करके ले-मेतको बसर (फा० पु.) कालक्षेप, गुजर। नामक स्थानमें भाग गये। युद्धके बाद नगरवासिगण | बसव--दाक्षिणात्यवासी लिङ्गायत धर्मके प्रवर्तक । फिरसे नगरमें लौटे और बास करने लगे। द्वितीय ब्रह्म- इन्होंने प्राचीन लिङ्गायत मतका संस्कार करके अपने युखके बादसे अंगेरेजोंने इस स्थानको बहुत उन्नत कर मतकी प्रतिष्ठा की। ये हिङ्गलेश्वरके आराध्य ब्राह्मण- दिया। दरिद्र प्रजाकी भलाई के लिये अस्पताल खोले वंशमें उत्पन्न हुए थे (१)। इनके पिताका नाम मदेङ्ग गये। मदमन्त्री और माताका मदल अरसुर था (२)। बचपन- ___४ अंगरेजाधिकृत ब्रह्मराज्यके इरावतीविभागमें प्रवा- में उपनयन-संस्कार होते समय इन्होंने जब देखा, कि हित एक नदी । दगा और पन्मावती इसकी दो शाखाएँ गायत्री मन्त्र के जपनेमें किसी दूसरेकी उपासना करनी हैं। अलावा इसके समुद्रमुखमें और भी कितनी छोटी पड़ती है, तब झट गलेसे जनेऊ निकाल कर तोड़ डाला छोटी नदियां जा मिली हैं। नेप्रिसद्वीप इस नदीके और सबके सामने अपना अभिप्राय प्रकट किया, कि ये मुहाने पर अवस्थित है। उसका पश्चिम पार्श्व बन्दरके ईश्वर वा शिवके अतिरिक्त और किसी दूसरेको अपना लायक है, पर पूर्व दिशामें पर्वत रहनेके कारण जहाज आदि नहीं आ जा सकते। बसन (संपु०) वसन देखो। (१) ये लोग 'वीर शैव' ब्राह्मण नामसे भी परि- बसना (हिं० क्रि० ) १ स्थायीरूपसे स्थित होना, रहना । चित हैं। २ जनपूर्ण होना। ३ भवस्थान करना, ठहरना। ४ (२) उक्त दम्पती कायमनोवाक्यसे सदा शिवजीकी उपासना किया करते थे। इस प्रकार देवादिदेवने प्रसन सुगन्धसे पूर्ण हो जाना, बासा जाना। (पु.) ५ वह | हो कर अपने अनुचर नन्दीको उनके पुत्ररूपमें भेजा। कपड़ा जिसमें कोई वस्तु लपेट कर रखी जाय, बेठन। कणाड़ी भाषामें वसवका अर्थ है, शिवका सांढ़। शिव- ६ बरतन,, भांडा। ७ थैली। ८ वह लम्बी जालीदार दास होने के कारण ही इस पुलका बसव नाम रखा गया।