पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/२५३

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गुरुनहीं मान सकते । पुसको इस प्रकार विदश भावा- हुई। राजा भी उनसे हार खा कर उन्हें फिर मली पद पं देख कर पिताने बहुत कुछ समझाया, पर इन्होंने एक पर रणनेको बाध्य हुए। भी न सुनी । इस अवाध्यताके कारण वे घरसे निकाल जैन आख्यायिकासे मालूम होता है, कि मली होनेके दिये गये। गुणवती बहन पद्मावती देवी भी इनके साथ बाद ही बसवने राजाको मारनेका संकल्प कर लिया था। हो ली। ये दोनों देश देशान्तरों में पर्यटन करते हुए ११५६ कोल्हापुरके राजा शिलाहारको जीत कर जिस समय ई०में कल्याण नगर पहुचे ।(३) विजल और बसव अपनी राजधानी लौट रहे थे उस इस राजधानीमें इनके मामा दण्डनायकके समय भीमानदीके किनारे विषके प्रयोगसे राजाकी मृत्यु पद पर अधिष्ठित थे। उन्होंने भांजेको आश्रय हो गयो। पिताकी मृत्युका समाचार पा कर राजपुत्र दिया और राज-कायमें नियुक्त कर इनकी उन्नति मुरारी राय बदला लेनेके लिये तैयार हुये। उनके आने- का पथ .ल दिया । धीरे धीरे बसबको था। पर पोका समाचार पा बसव उत्तर कर्नाटकके उली नगरको लक्ष्मीवान दे व उनके मामाने अपनी कन्या गंगादेवीका भागा और शत्रुसेनाके आनेके भयसे कुएं में डूब कर प्राण इनसे विवाह कर दिया। अपने व्याहके बाद इन्हें अपनी त्याग किया। बहन पद्मावतीकी शादी सूझी । यथासमय कल्याणके लिङ्गायत उपाख्यानसे जाना जाता है कि, भिन्न सम्प- राजा जैन बिजलके साथ वह ध्याही गई । राजाने दायवालोंका प्रभाव देख कर जैन राजा विजलने बसबके इन्हें अपना प्रधान सेनापति बना लिया । तबसे यही प्यारे दो अनुचरोंको आखें निकलया लों। बसव राजा- संपूर्ण राजकार्योकी देखरेख करने लगे। इन्होंने पुराने को अभिशाप दे कर संगमेश्वर तोथको चल दिये एवं कर्मचारी हटा दिये और उनकी जगह पर अपने संबंधी राजाका काम तमाम करनेका भार जगदेव पर सौंपा। जगदेवने दो नौकरोंके साश संन्यासीके भेषसे रणवासमें मनुष्य रख लिये। प्रजाको अपने अधीन करनेके लिये प्रवेश कर ११६८ इ०में राजाको मार डाला। राजाके वियोग इन्होंने बहुत धनका व्यय करना शरू कर दिया। उनके दानसे संतुष्ट हो सभी प्रजा इनके पक्ष में हो गई। से राज्य में बड़ी अशान्ति फैली जिससे कल्याणराजधानी धनहीन हो गयी। बसवने संगमेश्वरमें यह समाचार इस प्रकार राज्यभरमें अपना प्रभाव जमा कर इन्होंने | सना। जीवों के मर जानेसे उसे मर्मान्तिक पीडा हर्ष, जैन, स्मार्त, वैष्णवादि मतका खंडन किया और लिङ्गोपा.. जीना उसे बहत दुःखदायी प्रतीत होने लगा। बसवकी सना करना ही श्रेष्ठ है इसकी सर्वत्र घोषणा कर दी। प्रार्थना पर पार्वती देवी मुग्ध हो इन्हें स्वगमें ले गयो । इस धर्मके प्रचारसे ब्राह्मणोंमें विद्वषकी अग्नि धधक दूसरे लिङ्गायत ग्रंथों में लिखा है, कि बसवने अलौ- उठी। इनके मतमें बालक और वालिकाका-विवाह . किक कार्य दिखा कर सवसाधारणको मुग्ध किया था। करना अन्याय है एवं देवोपासनाके समय सभी : अत्यद्भत क्षमता देख कर सभी उनकी तरफ आकृष्ट होने पार्थिव किया कांड निर्मूल और अपवित्र हैं। मद्यपान ' लगे थे । दानमें वे मुक्तहस्त थे । एक समय किसी मन्त्री- और मांसादि भोजन भी इनके मतमें निषिद्ध था सा ने गजासे निवेदन किया, कि एक वर्षके दामसे सम्पूण बहतसे जैन लोग उनके मतके अनुयायी हो गये। जैन- राज्यकोष खाली हो गया है। राजाने बसवसे इसका संप्रदायको उत्तेजित अथवा बसवके निन्दित आचरण- कारण पूछा। इस पर इन्होंने बहुत सरल भावसे राज्यकोष- सोमला विजल उसको वंदी करनेके लिये की चाबो राजाको दे दी। राजा उनकी.सहास्यमूत्ति देखा अप्रसर हुए। राजाकी सेना बसवके शिष्योंसे पराजित अवाक् हो गये। फिर जब वे राज्यको देखने आये, तब


उनको अद्भुत क्षमताका परिचय पा चमत्कृत हो गये।

..... .(३) इस समय यहां कलचूरिवंशीय राजा राज्य बसवका धर्म इस प्रकार है- एकमात्र जगत्पति हो सम्पूर्ण जीवोंके रक्षक हैं। ईश्वरसे परिचित होने